आइए जानें, कैसे करें खरपतवार प्रबंधन

खेत में खरपतवारों की भरमार : खरपतवार नियंत्रण कैसे करें, आइए जानें

फ़सलों के विकास और वृद्धि के दौरान खरपतवारों को नियंत्रण करना बहुत आवश्यक होता है क्योंकि फ़सलों को सर्वाधिक हानि खरपतवारों से ही होती है।

18 September 2020

  • 2163 Views
  • 6 Min Read

  • हमारे देश की कृषि अर्थव्यवस्था फ़सलों के उत्पादन पर निर्भर है। फ़सलों के उत्पादन में बुआई से लेकर भंडारण तक किसानों को विशेष सावधानियाँ बरतनी पड़ती है। फ़सलों की विकास के लिए खरपतवारों(weeds) का नियंत्रण अत्यंत आवश्यक होता है, क्योंकि फ़सलों में सर्वाधिक हानि खरपतवारों से होती है। 

     

    लेकिन खरपतवारों का नियंत्रण(Weeds control) कैसे करें यह जानना अति आवश्यक हो जाता है। इन खरपतरों की जानकारी होने पर ही हम अपने फसलों का बचा सकते हैं। 

     

    तो आइए ब्लॉग में जानते हैं कि खरपतवार क्या होता है और इसका नियंत्रण कैसे कर सकते हैं। 

     

    खरपतवार किसे कहते हैं? (What is Weed?)

     

    खरपतवार वे पौधे होते हैं, जो बिना चाहे खेत में फसल के साथ उग जाते हैं। हो सकता है इनका उपयोग दूसरे खाद्य फसल या दवा के रूप में हो, लेकिन ये भी सच है कि खरपतवार फ़सलों के लिए हानिकारक है।

     

    दूसरे शब्दों में कहें तो खरपतवार अवांछित पौधे या घास होते हैं जो खेत में फ़सलों के लिए उपलब्ध पोषक तत्व, स्थान, नमी, एवं प्रकाश को रोक देते  हैं। जिससे फसल की पैदावार एवं गुणवत्ता में भारी कमी हो जाती है। 

     

    एक अनुमान के अनुसार खरपतवारों से फसल उत्पादन में औसतन 30 से 40 प्रतिशत तक का नुकसान हो जाता है। इसका अनुमानित मूल्य लगभग एक लाख करोड़ रूपए प्रति वर्ष आँका गया है। 

     

    कुछ फ़सलों में तो यह नुकसान कभी-कभी शत-प्रतिशत तक होने की संभावना रहती है। 

     

    इसके अलावा खरपतवार फसल में लगने वाले रोगों के जीवाणुओं एवं कीटों को भी आश्रय देते हैं। 

     

    खरपतवारों का फ़सलों पर प्रभाव (Effects of weeds on crops)

     

    • खरपतवारों की वजह से पौधों का उचित विकास नहीं हो पाता है। जिसके फलस्वरूप फ़सलों के उत्पादन में भारी गिरावट आती है।
    • खरपतवारों की वजह से खेतों में कीट एवं रोग कारक जीवाणुओं की भरमार हो जाती है। जिससे फसल उत्पादन में ज्यादा लागत एवं उत्पादन कम हो जाती है। 
    • फ़सलों की कटाई के समय बाधा उत्पन्न होती है। 
    • खरपतवारों की वजह से उपज की गुणवत्ता घट जाती है, जिससे किसान को अपेक्षाकृत कम आय होती है।
    • जलीय-खरपतवार सिंचाई व्यवस्था को रोक देते हैं, जिससे सिंचाई लागत बढ़ जाती है।
    • मिट्टी में उपस्थित पोषक तत्वों जैसे- नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश इत्यादि को खरपतवार अवशोषित कर लेते हैं, जिससे फ़सलों को उचित मात्रा में पोषक तत्व प्राप्त नहीं हो पाते। 
    • खरपतवार आमतौर पर फ़सलों की तुलना में अधिक पानी को अवशोषित कर लेते हैं। जिससे फ़सलों को पर्याप्त नमी नहीं मिल पाती है। 
    • पौधों के तेजी से विकास के लिए सूर्य की रोशनी एक महत्वपूर्ण कारक है। खरपतवार की वजह से पौधे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया नहीं कर पाते हैं, जिसका प्रभाव फ़सलों के दानों पर भी पड़ता है।  
    • खरपतवार की वजह से फसल के पौधों के विकास के लिए प्रर्याप्त स्थान नहीं मिल पाता है। जिससे पौधों की बढ़वार के लिए जगह की कमी हो जाती है। 

     

    खरपतवार नियंत्रण कैसे करें (How to control weeds)

     

    निवारण विधि (Prevention method)

     

    इस विधि में वे सभी क्रियाएं शामिल होती हैं जिनके द्वारा खेतों में खरपतवारों के प्रवेश को ही रोक दिया जाता है। 

    जैसे- प्रमाणित बीजों का प्रयोग, सिंचाई की नालियों की सफाई, खेत की तैयारी और बुआई हेतु प्रयोग में ली जाने वाली मशीनों के प्रयोग से पहले अच्छी तरह साफ-सफाई इत्यादि। 

     

    यांत्रिक विधि (Mechanical method)

     

    खरपतवारों पर काबू पाने की यह एक सरल और प्रभावी विधि है। किसी भी फसल को लगाने के 3 से 5 सप्ताह के बाद किसानों को निराई-गुड़ाई जरूर करनी चाहिए। यदि फ़सलों की क्रांतिक समय(बढ़वार के समय) पर निराई-गुड़ाई कर दी जाए तो फसल की बढ़वार अच्छी हो जाती है। 

     

    सामान्यतः दो निराई-गुड़ाई की क्रिया होती है- पहली 20-25 दिन के बाद और दूसरी 45 दिन के बाद, इससे खरपतवारों पर नियंत्रण प्रभावी ढंग से होता है। 

     

    प्रायः निराई-गुड़ाई दो प्रकार से की जा सकती है।

     

     1. हस्तचालित मशीनों से निराई-गुड़ाई करना। 

     2. हाथों से निराई गुड़ाई करना। 

     

    रासायनिक विधि (Chemical method)

     

    जैसा कि हम सभी जानते हैं आधुनिक कृषि में खरपतवार नियंत्रण के लिए किसान रासायनिक दवाइयों का बहुत अधिक प्रयोग करते हैं क्योंकि रसायनों के प्रयोग से बहुत कम समय में खरपतवारों का नाश हो जाता है। भले ही रासायनिक दवाओं का इस्तेमाल करने में किसानों को आसानी होती है लेकिन इन रसायनों से पर्यावरण पर बुरा असर पड़ता है। 

    खरपतवारों को नष्ट करने के लिए उपयोग में लाई जाने वाली कुछ रसायनों के नाम निम्नलिखित हैं। 

    एट्राजीन, पेंडिमेथालिन, सिमाजीन, फ्लूकलोरेलिन, ट्ररेफ्लान, बूटाक्लोर, पेराक्वाट, डाईक्वाट इत्यादि।

     

    जुताई विधि (Tillage method)

     

    जुताई विधि से खरपतवार के बीज मिट्टी के अंदर चले जाते हैं जिससे मिट्टी की ऊपरी सतह पर खरपतवारों का दबाव कम हो जाता है। इसके अलावा जुताई करने से खरपतवार उखड़ जाते हैं, जिससे उसे अलग करने में आसानी हो जाती है। 

     

    यहाँ यह भी जिक्र करना आवश्यक है कि गर्मियों के दिनों में जुताई करने से बहुवर्षीय खरपतवार जड़ सहित भूमि की सतह पर आ जाते हैं, जो सूर्य की तेज रोशनी से सूखकर मर जाते हैं।

     

    अन्तरवर्ती खेती विधि (Intercropping method)

     

    अन्तरवर्ती खेती में मुख्य फसल की दो कतारों के बीच में ऐसी फसल लगा देनी चाहिए जो कि खरपतवारों की वृद्धि को नष्ट कर दें। अन्तरवर्ती फ़सलों के लिए फसल का चुनाव इस प्रकार करना चाहिए जिनसे खरपतवारों की रोकथाम की जा सके, किन्तु ये मुख्य फसल से पोषक तत्वों के लिए होड़ न करें। खाद्यान्न फ़सलों के साथ दलहनी फ़सलों की अन्तरवर्ती खेती लाभदायक होती है। 

     

    जैसे- मक्का या ज्वार के साथ सोयाबीन, उर्द, या मूँगफली की अन्तरवर्ती खेती खरपतवारों को अंकुरण एवं उनके विकास को रोक देती है तथा मुख्य फ़सलों को भी प्रभावित नहीं करती है।

     

    फसल-चक्र विधि (Crop cycle method)

     

    फसल चक्र लम्बे समय के लिए खरपतवार नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण होता है।  किसी खेत में एक ही प्रकार की फसल को उगाते रहने से उस फसल में होने वाले खरपतवारों का दबाव उसमें बढ़ जाता है क्योंकि उनकी उगने तथा वृद्धि की दशाएं अनुकूल होती हैं।

     

    जैसे- बहुवर्षीय खरपतवारों के नियंत्रण के लिए धान-बरसीम फसल चक्र अच्छी होती है। इसी तरह गेहूं की खेती के बाद दूसरे साल सरसों की फसल उगाना उचित होता है। 

     

    संक्षेप में कहें तो फ़सलों में खरपतवार प्रबंधन(Weed management) एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। खरपतवारों के निवारण के लिए आज एक ऐसी प्रभावशाली वैज्ञानिक पद्धतियों और तकनीकों की जरूरत है जिससे प्रति इकाई क्षेत्रफल से फसल उत्पादन अधिक हो और साथ ही साथ पर्यावरण भी सुरक्षित रहे।

    कृषि की अन्य ब्लॉग