उत्तराखंड में प्रकृति की विनाशलीला, जानिए इसकी वजह

उत्तराखंड में फिर तबाही, जानिए कैसे आई आफत

उत्तराखंड के चमोली में एक बार फिर प्रकृति ने विनाशलीला दिखाई है। एक बार फिर आपदा की मार देवभूमि पर पड़ी है।

08 February 2021

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  • उत्तराखंड में 2013 में आई तबाही के घाव अभी भरे भी नहीं थे, कि इस साल 7 फरवरी को एक बार फिर तबाही का मंजर देखने को मिला। चमोली के ऋषि गंगा के पास ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटा और अलकनंदा और धौली नदी में जा गिरा, जिसके बाद की तस्वीरें भयावह हैं। नदियों में जल स्तर बढ़ने और अचानक आई  बाढ़ से  सैकड़ों की मौत होने की आशंका जताई जा रही है।

     

    दरअसल, ग्लेशियर टूटने की जगह से कुछ दूर स्थित ऋषि गंगा पावर प्रोजेक्ट चल रहा था, जो अब तबाह हो चुका है। वहीं, एनटीपीसी का पावर प्रोजेक्ट पूरी तरह बर्बाद हो चुका है। 

     

     

    हिमालय रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों के मुताबिक, ये तबाही केदारनाथ से भी बड़ी है। अगर ये घटना रात के वक्त होती, जैसी 2013 में हुई थी, उससे भी बड़ी तबाही होती। गनीमत ये रही कि घटना सुबह  करीब साढ़े 10 बजे हुई। जिससे निचले इलाकों को  तबाही से बचने के लिए पहले से ही अलर्ट कर दिया गया। 

     

    ऐसे आई तबाही

     

    जोशीमठ में ग्लेशियर टूटने से हिमस्खलन हुआ और अलकनंदा नदी में बाढ़ का पानी बढ़ने लगा, जिससे पावर प्रोजेक्ट बह गया। पानी का प्रवाह इतना तेज़ हो चुका था कि इस पानी के बहाव में सैकड़ों लोग बह गए। अब लापता लोगों की तलाश में टीमें लगी हुई हैं। 

     

    2013 की बाढ़ से ज़्यादा था जलस्तर

     

    साल 2013 में उत्तराखंड में बाढ़ के दौरान, जोशीमठ में जल का उच्चतम स्तर (एचएफएल) 1,385.54 मीटर था। जबकि इस बार जोशीमठ में जल स्तर 1,388.58 मीटर था।

     

    क्या होते हैं ग्लेशियर

     

    99 फीसदी ग्लेशियर शीट के जैसे होते हैं। आसान भाषा में कहें तो बर्फ की एक मोटी परत होते हैं। ये कई सालों तक भारी मात्रा में बर्फ जमा होने की वजह से बनते हैं।

     

     

    ग्लेशियर टूटने के कई कारण हो सकते हैं जैसे- गुरुत्वाकर्षण, वायुमंडल प्लेटों के नज़दीक आने, या दूर जाने, ग्लोबल वार्मिंग। ग्लेशियर टूटने की प्रक्रिया को काल्विंग या ग्लेशियर आउटबर्स्ट कहते हैं।

     

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    लेखक- नितिन गुप्ता        

     

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