भारत में पाई जाने वाली अलग-अलग मिट्टी (Types of Soil)

भारत में पाई जाने वाली अलग-अलग मिट्टी (Types of Soil)

कृषि क्षेत्र में बीज और खाद से कहीं ज़्यादा अहमियत मिट्टी की है क्योंकि मिट्टी ही उपज का निर्धारण करती है। मिट्टी के अनुरूप फसल का चुनाव बेहतर परिणाम देता है।

30 September 2020

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  • ‘मिट्टी’ (Soil)… इस शब्द की अहमियत हमारे जीवन में इतनी अधिक है कि हमारे पैदा होने से लेकर आख़िरी सांस लेने तक हम इसकी बात करते हैं। ‘मिट्टी का तन है, मिट्टी में ही मिल जाना है’...‘इन्सान तो बस माटी का पुतला है’... ‘मुझे इस मिट्टी की सौगंध है!’ इस जैसे न जाने कितनी कहावतें, फिल्मी डायलॉग और कसमें हैं, जिनमें कहीं न कहीं मिट्टी का ज़िक्र मिल जाता है। लेकिन कम ही लोग ऐसे हैं, जो इस मिट्टी के महत्व को करीब से जानते हैं। अगर किसी के जीवन में मिट्टी सबसे ज़्यादा मायने रखती है, तो वो हैं हमारे किसान भाई। तो चलिए, आज हम हमारे देश की मिट्टी को जानने की कोशिश करते हैं, ताकि किसान अपने क्षेत्र में पाई जाने वाली मिट्टी को ध्यान में रखकर सही फसल का चुनाव कर सकें।  

     

    मिट्टी (Soil) क्या है:

    वैज्ञानिक दृष्टि से देखें, तो मिट्टी कैल्शियम, एल्युमिनियम, आयरन, मैग्नीशियम, क्ले, सोडियम और मिनरल ऑक्साइड जैसे तत्वों का मिश्रण है।

     

    मिट्टी (Soil) क्यों ज़रूरी है:

    मिट्टी इसलिए ज़रूरी है क्योंकि खेतों का भविष्य यही तय करती है। सामान्य शब्दों में कहें, तो मिट्टी है, तो देश में कृषि है क्योंकि कौन सी फसल (crop) होगी, कितनी फसल होगी या कोई विशेष फसल होगी या नहीं, यह सब कुछ मिट्टी पर ही निर्भर करता है। यहां तक कि वातावरण में आप जितने भी पेड़-पौधे और लहलहाती फसलें देखते हैं, उन सभी के अस्तित्व के पीछे मिट्टी ही है।

    आइए, अब हम क्षेत्रीय आधार पर देश में पाई जाने वाली अलग-अलग प्रकार की मिट्टी पर प्रकाश डालते हैं।

     

    मिट्टी (Soil) के प्रकार:

    हमारे देश में मूलतः 6 प्रकार की मिट्टी पाई जाती हैं, जो अलग-अलग क्षेत्र के इकोसिस्टम तथा वहां उगाई जाने वाली फसलों (crops) के लिहाज़ से अहम हैं।

     

     

    1. जलोढ़ मिट्टी (alluvial soil): भारत में जलोढ़ मिट्टी (alluvial soil) का क्षेत्रफल सर्वाधिक है। देश के करीब 35 से 40 प्रतिशत क्षेत्र में यह मिट्टी पाई जाती है और ज़्यादातर किसान अपनी उपज के लिए इसी मिट्टी पर ही निर्भर हैं।

     

    विशेषताएं (Characteristics): बेहतर उपजाऊ क्षमता व अच्छी उपज

     

    कौन-सी फसलों के लिए उपयुक्त: गेहूं, चावल, बाजरा, चना, सरसों, मक्का, मूंगफली तथा तिलहनों के अलावा फलों व सब्ज़ियों के लिए भी यह बेहतर विकल्प है।

     

    कहां पाई जाती है: पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, असम तथा गुजरात जैसे राज्यों में यह मिट्टी आसानी से मिल जाती है।

     

    2. काली मिट्टी (Black soil): भारत में फसलों के लिहाज़ से काली मिट्टी (Black soil) भी बेहद अहम है। ज्वालामुखीय चट्टान जब टूटकर बिखरते हैं और उनसे जो लावा निकलता है, उससे इस मिट्टी का निर्माण होता है।

     

    विशेषताएं (Characteristics): यह मिट्टी बहुत ही उपजाऊ होती है। इसमें लंबे समय तक नमी बनी रहती है। कैल्शियम, मैग्नीशियम, लाइम और पोटाश जैसे गुणकारी तत्व इसमें भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं।

     

    कौन-सी फसलों के लिए उपयुक्त: कपास, गेहूं, जौ, गन्ना, अलसी, तंबाखू तथा तिलहन आदि के लिए यह सबसे उपयुक्त है। साथ ही कुछ खट्टे फलों व सब्ज़ियों की पैदावार भी इस मिट्टी में अच्छी होती है।

     

    कहां पाई जाती है: महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, तमिलनाडु तथा आंध्र प्रदेश में इसकी अच्छी उपलब्धता है।  

     

    3. लाल मिट्टी (Red Soil): यह मेटामॉर्फिक चट्टानों के टूटने से बनती है। इसमें लोहा, ऐल्युमिनियम तथा लाइम की अधिकता होती है। इसमें मौजूद आयरन ऑक्साइड के चलते इसका रंग लाल होता है।

     

    विशेषताएं (Characteristics): यह मिट्टी दरदरी होती है। यह पानी व नमी को ज़्यादा वक्त तक कायम नहीं रख पाती है। इसमें लोहे की अधिकता होती है।

     

    कौन-सी फसलों के लिए उपयुक्त: गेहूं, बाजरा, मक्का, चावल, गन्ना, मूंगफली आदि के अतिरिक्त दलहनों के लिए भी यह मिट्टी उपयुक्त है। वहीं इसमें खट्टे फल व सब्ज़ियां भी उगाई जा सकती हैं।

     

    कहां पाई जाती है:  झारखंड, ओडिशा, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों तथा कर्नाटक में इसकी अच्छी उपलब्धता है। इसके अतिरिक्त नागालैंड तथा राजस्थान के अरावली क्षेत्र में इसे देखा जा  सकता है।

     

    4. पर्वतीय मिट्टी (Mountain Soil): यह मिट्टी देश के पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है। पहाड़ों की ऊंचाई के अनुरूप इसमें थोड़े-बहुत बदलाव देखने को भी मिलते हैं। कार्बनिक पदार्थों का जमाव इसका प्रमुख कारण है।

     

    विशेषताएं (Characteristics): इसमें पोटाश व फॉस्फोरस जैसे पोषक तत्वों की कमी होती है। बेहतर खाद का उपयोग इस मिट्टी को उपजाऊ बनाने में मदद करता है। साथ ही इसकी प्रकृति अम्लीय(acidic) होती है।

     

    कौन-सी फसलों के लिए उपयुक्त:  चाय, कॉफी, मसालों तथा औषधीय गुणों वाले पौधों के अलावा यह आलू और कुछ चुनिंदा फलों की उपज के लिए बेहतर विकल्प है।  

     

    कहां पाई जाती है: हिमालयी क्षेत्र, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, उत्तराखंड, असम तथा जम्मू- कश्मीर में यह मिट्टी पाई जाती है।  

     

    5. लैटराइट मिट्टी (Laterite soil): ऊंची पहाड़ियों पर इस मिट्टी का निर्माण होता है। जलवायु में मौजूद नमी व सूखापन इसके बनने में अहम भूमिका निभाते हैं।

     

    विशेषताएं (Characteristics): इसमें ऐसिड व लोहे (iron) की अधिकता होती है। गीली होने पर यह मिट्टी नरम रहती है और सूखने पर सख़्त हो जाती है।

     

    कौन-सी फसलों के लिए उपयुक्त:  रागी, चावल, रबर, गन्ना, नारियल, चाय व कॉफी तथा काजू आदि के लिए यह मिट्टी अच्छी मानी जाती है।

     

    कहां पाई जाती है:  पश्चिमी घाट, केरल, कर्नाटक, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, बिहार मेघालय तथा तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में यह आसानी से मिल जाती है।

     

    6. सूखी मिट्टी (Desert Soil): यह मिट्टी मूलतः अरावली क्षेत्र में पाई जाती है। यह खेती करने के लिए उपयुक्त नहीं होती है। इसमें रेत की भी अधिकता होती है।

     

    विशेषताएं (Characteristics):  यह मिट्टी सूखी (dry) होती है। साथ ही यह क्षारीय (alkaline) प्रकृति की होती है।

     

    कौन-सी फसलों के लिए उपयुक्त:  इसमें गेहूं, बाजरा, जौ व मक्का आदि की फसल की जा सकती है।

     

    कहां पाई जाती है:  राजस्थान, गुजरात, पंजाब तथा हरियाणा। 


    तो अब, जब आप मिट्टी को इतने करीब से जान चुके हैं, बेहतर होगा कि आप किसी भी फसल (crop) के चयन से पूर्व उस मिट्टी की उत्पादकता व गुण को अवश्य भांपें। मिट्टी का सही चयन आपको बेहतर फसल देने के साथ-साथ बेहतर भविष्य भी प्रदान करेगा। इसके लिए आप मिट्टी परीक्षण से जुड़े हमारे अगले ब्लॉग "जांच के लिए खेतों से मिट्टी (soil) लेने की प्रक्रिया" को अवश्य पढ़ें।   



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