भारत में फसलों के प्रकार

भारत में फसलों के प्रकार

हमारे देश में लगभग हर प्रकार की फसलें पाई जाती है। जिससे हमारे देश की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है। भारत में किसानों को कृषि पर ही निर्भर रहना पड़ता है।

07 August 2020

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  • हमारे देश में लगभग हर प्रकार की फसलें पाई जाती है। दिलचस्प है कि भारत में कश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात के पश्चिमी तट से अरूणाचल प्रदेश की पूर्वी तक सैकड़ों प्रकार की फसलें उगाई जाती है। 

     

    आईए, इस ब्लॉग में जानें कि भारत में कितने प्रकार की फसलें पाई जाती हैं।

     

    सबसे पहले शुरूआत करते हैं, फसल क्या है?

     

    फसल

    मनुष्य जो अपने लाभ के लिए जिन पौधों को किसी क्षेत्र में एक निश्चित कार्यक्रम और योजना के अनुसार उगाता है, उसे फसल कहते हैं। 

     

    दूसरे शब्दों में कहें तो फसल एक पौधा है जिसे लाभ के लिए बड़े पैमाने पर उगाया जाता है।

     

    भारत में फसलों के प्रमुख प्रकार

    भारत में फसल क्षेत्र, मौसम, आर्थिक मूल्यों आदि के आधार पर विभाजित करने के कई प्रकार हो सकते हैं, जो निम्नलिखित है।

     

    ऋतु आधारित फसलें

    फसलों की खेती मुख्य रूप से मौसम पर निर्भर करती है। भारत में तीनों मौसम (खरीफ रबी और जायद) में फसलें उगाई जाती हैं।

     

    खरीफ की फसलें

    भारत में खरीफ की फसलें बारिश के मौसम के दौरान जून-जुलाई के महीने में उगाई जाती है। इनको “वर्षा ऋतु की फसलें” भी कहते हैं। जिन्हें सर्दी के मौसम के शुरू होने से पहले काट लिया जाता है। 

     

    खरीफ के मौसम में उगाई जाने वाली फसलों के लिए अंकुरण के वक्त सामान्य तापमान और हवा में नमी की जरूरत होती है, जबकि फसल को पकने के लिए तेज धूप और अधिक तापमान की जरूरत होती है। 

     

    इस ऋतु में बोई जाने वाली प्रमुख फसलों में चावल, मक्का, ज्वार, बाजरा, अरहर, मूंग, उड़द, कपास, जूट, मूँगफली और सोयाबीन इत्यादि शामिल हैं। 

     

    रबी की फसलें

    रबी की फसलें सर्दी के मौसम में उगाई जाती है। इनको “शरद ऋतु की फसलें” भी कहते हैं। रबी की फसलों को बुवाई के समय ठंडे मौसम की जरूरत होती है, जबकि पकने के दौरान इन्हें भी अधिक तापमान और सूर्य के प्रकाश की ज्यादा जरूरत होती है। 

     

    इन फसलों को जाड़े के प्रारंभ होते ही बोई जाती हैं और गर्मी के प्रारंभ में अर्थात मार्च-अप्रैल में काट ली जाती है।

     

    इस ऋतु में बोई जाने वाली मुख्य फसलों में गेहूँ, जौ, चना, आलू, तम्‍बाकू, मसूर, सरसों और मटर जैसी फसलें शामिल हैं। 

     

    जायद

    इन फसलों को रबी की फसल कटने के तुरंत बाद मार्च के महीने में उगाया जाता है और खरीफ की फसलों के उगाने से पहले काट लिया जाता है। इनको “ग्रीष्म ऋतु की फसलें” भी कहते हैं। 

     

    जायद के मौसम में उगाई जाने वाली फसलें काफी कम समय में पककर तैयार हो जाती हैं। परन्तु इन फसलों को ज्यादा मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है।  

     

    इस ऋतु में बोई जाने वाली मुख्य फसलों में खरबूज, खीरा, तरबूज, लौकी, तोरई, मिर्च और टमाटर जैसी फसलें शामिल हैं। 

     

    भारत में फसलों के प्रकार

     

    जीवनचक्र पर आधारित फसलें

    जीवन चक्र के आधार पर फसलों को निम्न तीन वर्गों में बांटा जा सकता है।

     

    (1) एक वर्षीय फसलें (Annual crops)-

    जो फसलें अपना जीवन चक्र एक वर्ष के अन्दर पूरा कर लेती है। उन्हें एकवर्षीय फसल कहते हैं। जैसे- गेहूँ, चना, जौ, सोयाबीन आदि।

     

    (2) द्विवर्षीय फसलें (Biennial crops)-

    जो फसलें अपना जीवन चक्र दो वर्ष में पूरा करती हैं, अर्थात पहले वर्ष में वृद्धि करती है और दूसरे वर्ष में बीज उत्पादन करती है। द्विवर्षीय फसलें कहलाती है।  जैसे- चुकन्दर, प्याज, आदि।

     

    (3) बहुवर्षीय फसलें (Berennial crops)-

    इस वर्ग की फसलें अनेक वर्षों तक जीवित रहती है। इन फसलों को एक बार खेत में उगाने के बाद पौधों की बार-बार कटाई कर कई बार पैदावार ली जा सकती है। इस तरह की फसलों में नेपियर, नींबू घास और रिजका जैसी फसलें शामिल हैं। 

     

    उपयोगिता के आधार पर फसलों के प्रकार

    S.N.

    फसलों के प्रकार

    अर्थ

    प्रमुख फसलें

    1

    अनाज वाली फसलें

    फसल जो मानव उपभोग के लिए उपयोग की जाती है।

    चावल, गेहूं, मक्का, बाजरा, दाल,

    2

    वाणिज्यिक फसल/नकदी फसलें

    फसलें जो बिक्री के लिए या तो कच्चे माल के रूप में उगाई जाती है।

    कपास, जूट, गन्ना, तम्बाकू, तिलहन

    3

    वृक्षारोपण फसलें/नकदी

    ये फसलें  वृक्षारोपण के द्वारा बड़े क्षेत्रों पर लगाई जाती है। 

    चाय, कॉफी, नारियल और रबर

    4

    बागवानी फसलें

    कृषि की वे फसलें  जिसमें फल और सब्जियाँ उगाई जाती हैं।

    फल और सब्जियाँ

     

    अनाज वाली फसलें

    इस तरह की ज्यादातर फसलें एकवर्षीय होती हैं। इन फसलों का उपयोग आहार के रूप में किया जाता है। इस तरह की फसलों में धान, चना, मक्‍का, ज्‍वार, गेहूँ, जौं और बाजरा जैसी फसलें हैं, जिन्हें रबी और खरीफ मौसम के आधार पर उगाया जाता है। 

     

    तिलहनी फसलें

    तिलहनी फसलों में वो फसलें शामिल होती हैं जिनसे वनस्पति तेल का उत्पादन होता है। तिलहनी फसलों को व्यापारिक रूप से किसान उगाते हैं क्योंकि इन फसलों का बाज़ार भाव अच्छा मिलता है। इन फसलों से निकाले गए तेल का इस्तेमाल खाने और व्यापारिक चीजों को बनाने में किया जाता हैं।  तिलहन फसलों में सरसों, सूरजमुखी, अलसी, तिल, मूंगफली, सोयाबीन और राई जैसी और भी कई फसलें शामिल हैं। 

     

    दलहनी फसलें

    दलहनी फसलें ज्यादातर शुष्क प्रदेशों में उगाई जाती है। दलहनी फसलों को फसल चक्र में सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। दलहनी फसलें खेत की उर्वरक क्षमता को बढ़ाने का काम करती हैं। दलहनी फसलों की खेती मिश्रित खेती के रूप में भी की जा सकती है। दलहनी फसलों के अंतर्गत अरहर, चना, मटर, मसूर और सोयाबीन जैसी फसलें शामिल हैं। 

     

    मसाला फसलें

    मसाला फसलों की खेती खाने की चीजों को स्वादिष्ट बनाने के लिए किया जाता है। भोजन को स्वादिष्ट बनाने, रंगने या संरक्षित करने के उद्देश्य से उसमें मिलाए जाने वाले सूखे बीज, फल, जड़, छाल, को मसाला (spice) कहते हैं। बहुत से मसालों में सूक्ष्म जीवाणुओं को नष्ट करने की क्षमता पाई जाती है।

    आपको बता दें, भारत में मसाला फसलों की खेती ज्यादा दक्षिण भारत में की जाती है।  मसाला फसलों में अदरक, पुदीना, मिर्च, धनिया, अजवाइन, जीरा, सौंफ, लहसुन, हल्‍दी, काली मिर्च, ईलायची और तेज़पात जैसी फसलों को शामिल किया जाता है।

     

    रेशेदार फसलें

    भारत में उगाई जाने वाली प्रमुख चार फसलें कपास, जूट, पटसन और रेशम है।  कपास, जूट और पटसन को मिट्टी में फसल उगाने से प्राप्त होता है। जबकि रेशम प्राकृतिक रेशम की कीड़े कोकून से प्राप्त होता है जो मलबरी पेड़ की हरी पत्तियों पर पलता है। 

     

    बागबानी फसलें

    भारतीय अर्थव्यवस्था में बागवानी फसलों का भी बहुत महत्त्व है। बागबानी फसलों को फल वाली फसलें भी कहा जाता हैं। बागबानी फसलों के पौधे एक बार लगाने के बाद कई सालों तक पैदावार देते हैं।

     

    बागवानी फसलों में आम, अमरूद, लीची, केला, पपीता, सेब, नाशपाती और संतरा जैसी फसलें शामिल हैं।

     

    औषधीय फसलें

    औषधीय फसलें की खेती तीनों मौसम में की जाती है, क्योंकि ज्यादातर औषधीय फसलें पूरे साल उगाने के बाद पैदावार देती हैं। इन फसलों की खेती से किसानों की अच्छी खासी कमाई हो जाती है। 

     

    आजकल किसान ज्यादातर किसान कृषि में बेहतर लाभ के लिए औषधीय फसलों का उत्पादन कर रहे हैं क्योंकि कई आयुर्वेदिक कंपनियों में औषधीय उत्पादों की माँग बढ़ गई है। 

     

    नगदी फसलें

    नकदी फसलें वे फसल होती है, जिन्हें कटाई या तुड़ाई करने के बाद अधिक दिनों तक भंडारित नहीं किया जा सकता। नगदी फसलों की खेती से किसानों की अच्छी खासी कमाई भी होती है।

     

    नगदी फसल में जूट, कॉफी, कोको, गन्ना, टमाटर, केला, संतरा और कपास जैसे कई फसलें शामिल हैं।

     

    भारत की प्रमुख फसलें

    भारत के विभिन्न राज्य में अलग-अलग तरह की फसलें उगाई जाती है और हर एक राज्य की कुछ प्रमुख फसलें हैं।

     

    भारत में फसलों के प्रकार

     

    आईए जानें, भारत की कुछ प्रमुख फसलें, उनकी आवश्यक कृषि-जलवायु और प्रमुख उत्पादक राज्य 

     

    फसल का नाम

    आवश्यक कृषि-जलवायु

    प्रमुख उत्पादक राज्य

    धान

    तापमान:                22 -32 डिग्री सेल्सियस            

    वर्षा:                     150-300 सें.मी.

    मिट्टी का प्रकार:     गहरी मिट्टी और दोमट मिट्टी

    पं. बंगाल, उड़ीसा, बिहार

    गेहूं

    तापमान:               15-26 डिग्री सेल्सियस

    वर्षा:                     75-100 सें.मी.

    मृदा प्रकार:        अच्छी तरह से सूखा उपजाऊ दोमट और मिट्टी के दोमट

    उत्तर प्रदेश, पंजाब

    बाजरा

    तापमान:                   27-32 डिग्री सेल्सियस

    वर्षा:                         50-100 सें.मी.

    मृदा प्रकार:            जलोढ़ या दोमट मिट्टी में उगाए जा सकते हैं

    राजस्थान, गुजरात

    चना

    तापमान:           20-25 डिग्री सेल्सियस (हल्की ठंडी और शुष्क जलवायु)

    वर्षा:               40-45 सेमी

    मिट्टी का प्रकार:   दोमट मिट्टी

    मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश

    गन्ना

    तापमान:                     21-27 डिग्री सेल्सियस

    वर्षा:                               75-150 सेमी

    मिट्टी का प्रकार:           गहरी समृद्ध दोमट मिट्टी

    उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र

     

    कपास

    तापमान:               21-30 डिग्री सेल्सियस

    वर्षा                    : 50-100 सें.मी.

    मिट्टी का प्रकार:     दक्कन की काली मिट्टी और मालवा का पठार। 

    गुजरात, महाराष्ट्र

     

    तिलहन

    तापमान:               20-30 डिग्री सेल्सियस

    वर्षा:                     50-75 से.मी.

    मिट्टी का प्रकार:     अच्छी तरह से सूखा रेतीली दोमट, लाल, पीली और काली मिट्टी 

    मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान

    चाय

    तापमान:               20-30 डिग्री सेल्सियस

    वर्षा:                     150-300 सें.मी.

    मिट्टी का प्रकार:     अच्छी तरह से सूखा हुआ, गहरी भुरभुरी दोमट मिट्टी।

    आसाम, पं. बंगाल, 

    कॉफी

    तापमान:               15-28 डिग्री सेल्सियस

    वर्षा:                     150-250 सेमी

    मिट्टी का प्रकार:     अच्छी तरह से सूखा हुआ, गहरी भुरभुरी दोमट मिट्टी।

    कर्नाटक,

     

    संक्षेप में कहें तो फसलें स्थानीय मौसम, मिट्टी, वनस्पति और पानी की उपलब्धता के आधार पर ही बोई जाती है। किसी भी देश की जलवायु का वहां की फसलों पर भी व्यापक प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि जो फसलें ठंडे प्रदेशों में उगाई जाती है, वह शुष्क और गर्म प्रदेशों में नहीं उगाई जा सकती है।

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