एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में ऐसे बनाएं करियर

एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में साइंस स्टूडेंट्स के लिए हैं शानदार मौके

एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के बाद स्पेस रिसर्च की फील्ड में बेहतरीन करियर के मौके मिलते हैं। आइए जानते हैं इस फील्ड से जुड़ीं बातें।

17 February 2021

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  • इस समय कुल 2,787 सैटेलाइट हमारी पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगा रहे हैं। अंतरिक्ष में भारत मंगल तक पहुंच चुका है और हम दूसरे ग्रहों पर मानव को बसाने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। हाल ही में कई स्पेस कंपनियों द्वारा स्पेस टूरिज़्म पर भी काम किया जा रहा है। स्पेस में लगातार बढ़ रहे ट्रैवल और रिसर्च के चलते इस क्षेत्र में करियर की संभावनाएं भी बढ़ रही हैं। 

     

    करियर बनाने के लिए एयरोस्पेस इंजीनियरिंग बेहतर ऑप्शन हो सकता है। एक एयरोस्पेस इंजीनियर स्पेस क्राफ्ट की डिज़ाइनिंग, फंक्शनिंग के साथ-साथ स्पेस में होने वाली रिसर्च पर भी काम करता है। मंगलयान जैसे सभी स्पेस मिशन इन्हीं इंजीनियर्स द्वारा डिज़ाइन किए जाते हैं। है न एक्साइटिंग? तो चलिए अब जानते हैं कि एयरोस्पेस इंजीनियर कैसे बना जा सकता है? इसमें करियर की क्या-क्या संभावनाएं हैं?

     

    एयरोस्पेस इंजीनियरिंग

     

    इंजीनियरिंग की इस ब्रांच में एयरक्राफ्ट, स्पेस क्राफ्ट, मिसाइल, रॉकेट की डिज़ाइनिंग और उनका निर्माण करना सिखाया जाता है। एयरोस्पेस इंजीनियर स्पेस क्राफ्ट के इंजन, पंखों के आकार/डिज़ाइन, कंट्रोल सिस्टम आदि पर भी काम करते हैं। किसी सैटेलाइट या स्पेस रॉकेट के प्रोटो टाइप की जांच और उसके लिए प्लान भी इन्हीं इंजीनियर्स द्वारा तैयार की जाती है।

     

    एयरोस्पेस इंजीनियरिंग और एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में अंतर

     

    छात्र इंजीनियरिंग की इन दोनों शाखाओं में अक्सर कन्फ्यूज़ हो जाते हैं। एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग और एयरोस्पेस इंजीनियरिंग साधारण  अंतर ये है कि एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में स्पेस (अंतरिक्ष) आता है। यानी एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में अंतरिक्ष में जाने वाले यानों, उपग्रहों आदि की पढ़ाई होती है। जबकि एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में ज़मीन से ज़मीन तक उड़ने वाले  विमानों के निर्माण और रिसर्च पर काम किया जाता है। यानी एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में आसमान सीमा है, जबकि एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में आसमान शुरुआत।

     

    एयरोस्पेस इंजीनियर बनने के लिए तैयारी

     

    इस फील्ड में रुचि रखने वाले छात्रों को 11वीं और 12वीं में विज्ञान की पढ़ाई करना ज़रूरी है जैसा कि सभी इंजीनियरिंग कोर्सेज के लिए ज़रूरी होता है। लेकिन, एयरोस्पेस इंजीनियर बनने के लिए ज़रूरी है कि आपकी फिज़िक्स और मैथ्स विषयों में अच्छी पकड़ हो। 

     

    कोर्स और कॉलेज

     

    एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के लिए विज्ञान में 12वीं करने के बाद बीटेक (B.Tech) ग्रेजुएशन कोर्स में दाखिला ले सकते हैं, जो कि चार साल का होता है। भारत में कई सरकारी और प्राइवेट कॉलेजों में इंजीनियरिंग की ये ब्रांच है, जिनमें से टॉप के पांच कॉलेज हैं-

     

    • भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान(IIT), बॉम्बे
    • भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान(IIT), कानपुर 
    • भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान(IIT), मद्रास
    • भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान(IIT), खड़गपुर
    • भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान (IIST), तिरुवनंतपुरम

     

    एग्ज़ाम 

     

    जॉइंट एंट्रेंस एग्ज़ाम (JEE)- संयुक्त प्रवेश परीक्षा (JEE) भारत के कई इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश के लिए आयोजित की जाने वाली परीक्षा है। इसमें अच्छी रैंक लाकर आपको आईआईटी जैसे संस्थानों में एडमिशन मिल सकता है।

     

    IIA एंट्रेंस एग्ज़ाम- ये प्रवेश परीक्षा इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ एयरोनॉटिक्स (IIA), दिल्ली के द्वारा आयोजित करवाई जाती है। ये कॉलेज भारत में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के सबसे पुराने कॉलेजों में से एक है।

     

    IIST एंट्रेंस एग्ज़ाम- इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ स्पेस साइंस एंड टेक्नॉलॉजी (IIST ) एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के टॉप कॉलेजों में एक है। यहां पर प्रवेश पाने के लिए आपको IIST एंट्रेंस एग्ज़ाम की मेरिट लिस्ट में अपनी जगह बनानी होगी।

     

    कोर्स का खर्च

     

    एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के कोर्स में बीटेक कोर्स जितना ही खर्च आता है। सरकारी और सामान्य निजी कॉलेजों में सालाना फीस 1 से 2 लाख रुपये के बीच होती है। 

     

    नौकरी की संभावनाएं

     

    एयरोस्पेस इंजीनियरिंग करने बाद स्पेस रिसर्च एजेंसियों, एयरलाइन कंपनियों, डिफेंस, रिसर्च सेक्टर, विमान कंपनियों में करियर की अपार संभावनाएं हैं। वहीं,आपको विदेश में नौकरी करने का मौका भी आसानी से मिल जाता है। एयरोस्पेस के क्षेत्र में टॉप कंपनियां हैं-

     

    • ISRO (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन)
    • HAL (हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड)
    • DRDO (रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन)
    • NASA(नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन)
    • एयरबस
    • बोइंग
    • इंडियन एयर फोर्स
    • स्पेस एक्स

     

    छूना है आसमान तो करें एयरोस्पेस इंजीनियरिंग

     

     

    सैलरी

    एयरोस्पेस इंजीनियर को शुरुआती दौर में 3 लाख रु. सालाना तक सैलरी आराम से मिल जाती है। वहीं, अधिकतम सैलरी 18-20 लाख रुपये सालाना तक हो सकती है।

     

    उम्मीद है कि एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की फील्ड से जुड़े सभी सवालों के जवाब आपको मिल पाए होंगे। यदि आप भी इस फील्ड में जाकर आसमान छूना चाहते हैं, तो आज ही तैयारियां शुरू कर लें।

     

     

    लेखक- मोहित वर्मा

     

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