रोहू मछली पालन और उसके फायदे समझें

रोहू मछली कैसे पाल सकते हैं किसान?

मछली पालन में ‘रोहू मछली’ का नाम किसानों की टॉप लिस्ट में आता है। मुनाफ़े की दृष्टि से रोहू को पालना एक बेहतर विकल्प है। जिससे किसानों की आमदनी बढ़ सकती है।

05 February 2021

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  • मछली पालन (Fish Farming) के प्रति भारतीय किसानों की दिलचस्पी लगातार बढ़ रही है। मछली पालन से होने वाला मुनाफा और आसान तकनीक इसकी एक बड़ी वजह है। भारत में विदेशी और देशी मछलियों की कई प्रजातियों का उत्पादन किया जा रहा है। लेकिन, इनमें रोहू मछली का उत्पादन करना बेहद आसान है और इसकी बाज़ार में अच्छी डिमांड भी है। तो चलिए, आज इस मछली की प्रजाति के पालन के बारे में समझने की कोशिश करते हैं।

     

    किसी भी बिज़नेस को शुरू करने से पहले हमें उससे संबंधित तीन सवालों के जवाब ज़रूर पता होना चाहिए, वो हैं- क्या करें, क्यों करें और कब करें। आपको इन सारे सवालों के जवाब आज निटर से मिलेंगे।

     

    रोहू मछली और इसकी विशेषताएं

     

    रोहू मछली को अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है जैसे रोहू, रुई, रोहो, रोहिता आदि। ये भारतीय मूल की ही प्रजाति है, जो गंगा और सहायक नदियों में पाई जाती है। इस प्रजाति की खास बात ये है कि ये एक साल में एक से डेढ़ किलो तक वज़न की हो जाती हैं और इसका अधिकतम वज़न 4 से 5 किलो हो सकता है। वहीं, आकार में यह 1 मीटर तक लंबी हो सकती है।

     

    रोहू का शरीर काफी मोटा होता है और सिर उसके मुकाबले काफ़ी छोटा। पेट का हिस्सा चांदी के रंग का नज़र आता है। यदि, इसके पंख और सिर को छोड़ दिया जाए, तो शरीर के ज़्यादातर हिस्से में स्केलिंग (मछली की स्किन के बाहर ठोस कवर) नज़र आती है।

     

    रोहू मछली को पालने की प्रक्रिया:

     

    तालाब का चयन

     

    मछली पालन के लिए सबसे पहले एक तालाब की आवश्यकता होती है। तालाब खोदने से पहले मिट्टी की जल धारण करने की क्षमता ज़रूर जांच लें। क्षमता जितनी अच्छी होगी, मछली पालन उतना आसान होगा। इसके अतिरिक्त पानी के स्रोत की व्यवस्था भी करनी होगी।

     

    रोहू मछली पालन और उसके फायदे  समझें

     

     

    प्री-स्टॉकिंग

     

    यह मछलियों को तालाब में डालने से पहले की प्रक्रिया होती है। इसमें तालाब को पूरी तरह से साफ किया जाता है। यदि उसमें मलबा है, तो उसे निकाला जाता है। वहीं, खरपतवारों और कीटों से मछलियों को नुकसान न पहुंचे, इसके लिए शाकनाशी (herbicide) आदि का छिड़काव भी किया जाता है।

     

    मछलियों की स्टॉकिंग

     

    इस स्टेज में मछलियों के बच्चे (fingerlings) तालाब में डाले जाते हैं। रोहू मछली को तालाब में डालने का सही समय फरवरी-मार्च है। रोहू मछली पालने के मामले में वैज्ञानिक मानते हैं कि कम से कम चार इंच के बच्चे को ही तालाब में डालें ताकि उसकी प्रजाति की अच्छे से पहचान हो पाए। बिना गिने मछलियों को तालाब में न डालें। एक हेक्टेयर में कुल 10 से 12 हज़ार मछली के बच्चों का संचय करें।

     

    रोहू मछली को ग्रुप में पालें

     

    रोहू को मुख्यतः पॉलीकल्चर सिस्टम के तहत पाला जाता है। इसका मुख्य कारण है कि रोहू मछलियां केवल पानी की बीच की सतह पर चारा खाती हैं। इससे पानी की ऊपरी और निचली सतह पर रहने वाला चारा बर्बाद हो जाता है। इसलिए रोहू मछली को भारतीय मेजर कॉर्प्स की कतला (भाकोर) और नैन मछलियों की प्रजाति के साथ एक तालाब में पालें। क्योंकि कतला पानी की ऊपरी सतह पर भोजन ग्रहण करती है और नैन निचली में भोजन ग्रहण करती है। अच्छे उत्पादन के लिए एक तालाब में कतला, रोहू और नैन मछली का सही अनुपात 30:40:30 माना जाता है।

     

    भोजन और देखभाल

     

    रोहू मछली का उत्पादन करना तकनीकी तौर पर काफी आसान प्रक्रिया है, इन पर बहुत ज़्यादा  ध्यान न रखने पर भी ये आराम से बढ़ती रहती हैं। लेकिन, अच्छे उत्पादन के लिए आपको अतिरिक्त चारा देना ज़रूरी हो जाता है। सामान्यतः तिलहन फसलों की खली, राइस ब्रान और बाज़ार में मिलने वाला फिश फीड मछलियों को चारे के तौर पर डाला जाता है। लेकिन, किसानों को वैज्ञानिकों कि सलाह के हिसाब से फीडिंग करवानी  चाहिए। इसके लिए स्थानीय फिशरी डिपार्टमेंट के विशेषज्ञों से समय-समय पर तालाब की जांच करवाते रहें।

     

    हार्वेस्टिंग का सही समय

     

    बेहतर देखभाल और पोषण के साथ रोहू मछली का बच्चा 7 से 8 महीनों में एक से डेढ़ किलो तक का हो जाता है। वहीं, सर्दियों में इनकी ग्रोथ रुक जाती है। यदि आप फरवरी-मार्च में इन्हें तालाब में डालते हैं तो अक्टूबर-नवंबर में ये मार्केट में बेचने के लिए तैयार हो जाती हैं। लेकिन, विशेषज्ञों की मानें तो इस दौरान बाज़ार में दूसरी प्रजातियों की मछलियों की भरमार रहती है जो ठंड में ज़िंदा नहीं रह पातीं, जिससे इस समय अच्छे दाम नहीं मिल पाते। इसलिए रोहू मछलियों की हार्वेस्टिंग अक्तूबर से पहले या फिर मध्य जनवरी के बाद करें।

     

    लागत और कमाई

     

    मछली उत्पादन के लिए एक हेक्टेयर के तालाब की खुदाई, लेबर कॉस्ट, जाल आदि का खर्च करीब 3 लाख तक आ जाता है। लेकिन, ये एक ही बार लगने वाला पैसा है। बाकी दूसरे रख-रखाव और चारे का खर्च आपके उत्पादन पर निर्भर करता है। 

     

    इस बिज़नेस का साधारण गणित समझने की कोशिश करें तो एक रोहू मछली और दूसरी भारतीय क्रॉप्स की प्रजातियों की एक मछली के पालन में करीब 50 रुपये का खर्च आता है और ये बाज़ार में औसतन 150-200 रुपये में आराम से बिक जाती है। एक हेक्टेयर के तालाब में कम से कम 8 से 10 हज़ार मछलियों का उत्पादन हो सकता है। इस हिसाब से एक हेक्टेयर के तालाब में 4-5 लाख तक का सालाना मुनाफा आराम से कमाया जा सकता है। 

     

     

    रोहू मछली पालन और उसके फायदे  समझें


     

    उम्मीद है कि रोहू मछली पर लिखा यह ब्लॉग आपको पसंद आया होगा। यदि आप मछली पालन के आसान तरीकों (fish farming methods) को समझना चाहते हैं तो यहां क्लिक करें

     

    ✍️

    लेखक- मोहित वर्मा     



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