थाई एप्पल की बागवानी कैसे करें? यहां जानें

बेर की खेती को बना सकते हैं मुनाफे का सौदा, जानें ऐसे

थाई एप्पल (बेर) की बागवानी कम लागत में अधिक मुनाफे वाला व्यवसाय है। आजकल कई किसान पारंपरिक खेती छोड़कर इस बेर की खेती कर रहे हैं। आइए, इसे यहां जानें।

24 March 2021

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  • किसान अक्सर अच्छी उपज नहीं होने पर निराश हो जाते हैं। लेकिन, पारंपरिक खेती के साथ-साथ बागवानी (Horticulture) करें तो उन्हें अच्छी आमदनी हो सकती है। इसमें बेर की बागवानी (Plum farming) सबसे अच्छा विकल्प है। 

     

    आजकल बाज़ार में बेर की कई वैरायटी उपलब्ध है, जिनमें थाई एप्पल बेर और कश्मीरी बेर की मांग सबसे ज़्यादा है। बेर की ये किस्में दिखने में कच्चे सेब जैसी होती  हैं जो स्वाद में खट्टे-मीठे होते हैं। इसे ‘किसान का सेब’ भी कहते है। इसमें कई पोषक तत्व पाए जाते हैं, जिसके कारण बाजार में इसकी भारी मांग है। 

     

    यही कारण है कि छोटे किसान, जिनके पास छोटे खेत हैं, वे भी अच्छी आमदनी के लिए थाई एप्पल और कश्मीरी बेर की खेती कर रहे हैं। 

     

    आज हम आपको Knitter के इस ब्लॉग में बेर की बागवानी (Plum cultivation)  की जानकारी देंगे। इससे आप बेर की खेती को आसान भाषा में जान सकेंगे।

     

    यहां आप जानेंगे-

     

    • थाई एप्पल (बेर) की बागवानी पर एक नज़र 
    • इसके लिए ज़रूरी जलवायु
    • इसकी खेती के लिए उपयोगी मिट्टी
    • इस बेर की खेती का सही समय
    • खेती की तैयारी कैसे करें?
    • इस बेर की उन्नत किस्में
    • बेर की फसल में लगने वाले रोग और इलाज
    • बेर की खेती से कमाई
    • एक्सपर्ट की सलाह

     

    थाई एप्पल (बेर) की बागवानी

     

    थाई एप्पल (बेर) एक मौसमी फल है, जो थाईलैंड की किस्म है। यह भारत की जलवायु के लिए काफी अनुकूल है। वैसे यह फल भारतीय बेर से कुछ बड़ा होता है। बेर की थाई और कश्मीरी किस्में आने के कारण किसानों का रुझान इस ओर बढ़ रहा है। भारत में इसकी खेती जम्मू-कश्मीर से कन्याकुमारी तक खूब हो रही है। यह अब तक का सबसे तेजी से बढ़ने वाला पौधा है।  इसके एक पेड़ से प्रतिवर्ष 40-50  किलो फल का उत्पादन हो जाता है। 

     

    एप्पल बेर की बागवानी कैसे करें? यहां जानें

     

    जलवायु

     

    बेर एक गर्म जलवायु का पौधा है। इसे शुष्क इलाकों में भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। गौरतलब है कि बेर के पौधों में पाला (Frost) और अधिक गर्मी सहन करने की क्षमता होती है। लेकिन, अधिक नमी वाले स्थानों में इसकी बागवानी नहीं करनी चाहिए।

     

    मिट्टी

     

    बेर की खेती सभी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन जलभराव वाले क्षेत्रों में इसकी खेती उपयुक्त नहीं होती है। इसकी खेती बंजर इलाकों में भी आसानी से की जा सकती है। बलुई दोमट और पथरीली मिट्टी में इसका उत्पादन अच्छा होता है। इसके लिए मिट्टी का पीएच मान 7 से अधिक नहीं होना चाहिए। 

     

    खेती का सही समय

     

    बेर के पौधों को साल में दो बार लगा सकते हैं। 

    पहला- जुलाई और अगस्त के महीने में

    दूसरा- फरवरी और मार्च के महीने में

     

     

    खेत की तैयारी

     

    • बेर की बागवानी से पहले खेत की अच्छे से सफाई करें, पुरानी फसलों के अवशेष नष्ट कर दें 
    • मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करके खेत को कुछ दिन के लिए खुला छोड़ दें 
    • खेत में गोबर की खाद डालकर मिट्टी में मिला लें 
    • रोटावेटर चलाकर मिट्टी को भुरभुरा बना लें   
    • पौध से पौध की दूरी कम से कम 12 फीट रखें
    • गड्ढों की खुदाई 3x3 फीट करें 
    • खोदे गए गड्ढे में 50 से 60 किलो गोबर की खाद भर दें 
    • खाद को भरने के 20 से 25 दिनों बाद पौधारोपण कर दें  

     

     उन्नत किस्में

     

    हमारे देश में थाई एप्पल और कश्मीरी बेर ही पॉपुलर है। इसके अलावा जलवायु और क्षेत्र के अनुसार बेर की कई देसी किस्में हैं। 

     

    राज्य 

    किस्में

    उत्तर प्रदेश

    बनारसी कडाका, बनारसी, पैवन्दी, नरमा, अलीगंज

    पंजाब, हरियाणा

    उमरान, कैथली, गोला, सफेदा, सोनोर-2

    बिहार

    बनारसी, नागपुरी, पैवन्दी, थर्नलैस

    राजस्थान

    सौनोर, थोर्नलैस

    महाराष्ट्र

    कोथो, महरूम, उमरान

     

    रोग प्रबंधन

     

    यदि बेहतर तरीके से खरपतवार प्रबंधन कर लिया  जाए तो बेर की बागवानी में रोग लगने की आशंका  नहीं होती है। बेर में लगने वाले रोगों में फल बेधक, फल मक्खी और चूर्णित आसिता प्रमुख है। पौधों की समय-समय पर छंटाई ज़रूर करें। इससे उत्पादन में बढ़ोतरी होती है। 

     

    लागत और कमाई

     

    बेर की बागवानी की शुरुआत में लागत अधिक लगती है, लेकिन बागान लगाने के एक साल बाद लागत कम हो जाती है। एक साल बाद इससे फलों का उत्पादन शुरू हो जाता है। थाई एप्पल का पेड़ एक बार लगाने के बाद 20 सालों तक फल देता है। शुरुआत में एक पेड़ से 30 से 40 किलो तक उत्पादन मिलता है, जो आगे चलकर 100 किलो तक पहुंच जाता है। 

     

     

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    ✍️

    लेखक- दीपक गुप्ता

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