परंपरागत कृषि विकास योजना : जैविक खेती को बढ़ावा

परंपरागत कृषि विकास योजना : जैविक खेती को बढ़ावा

‘हरित क्रांति’ के तर्ज पर ‘जैविक कृषि क्रांति’ सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार की परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) एक महत्वपूर्ण योजना है। आइए जानें...


भारत में जैविक खेती(organic farming) की बहुत पुरानी परंपरा रही है। जैविक खेती कृषि की वह पद्धति है जिसमें मिट्टी, जल और वायु को प्रदूषित किए बिना भी फसलों का उत्पादन किया जा सकता है। 

 

इस पद्धति में रसायनों का उपयोग नहीं किया जाता है। जैविक खादों पर आधारित फसलों का उत्पादन करना ही जैविक खेती कहलाता है। यह पद्धति रासायनिक खेती की अपेक्षा सस्ती और स्थाई है। परंपरागत कृषि (Traditional farming) रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग के बिना पारम्परिक कृषि की पद्धति है।

 

जैविक खेती(organic farming) को बढ़ावा देने के लिए सरकार भी लगातार प्रयास कर रही है। इसी क्रम में जैविक खेती के विकास के लिए परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) की शुरूआत की गई है। 

 

आइए जानें क्या है परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) 

 

‘हरित क्रांति’ के तर्ज पर भारत में सफल ‘जैविक कृषि क्रांति’ सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई यह एक महत्वपूर्ण योजना है। यह योजना राष्ट्रीय कृषि मिशन के अंतर्गत है जो सामूहिक जैविक खेती को बढ़ावा देती है। जिसे अप्रैल, 2015 में शुरू किया गया था। 

 

इस योजना के तहत किसानों को जैविक खेती के लिए सरकार द्वारा वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। वित्तीय अनुदान किसानों को सामूहिक और 'पीजीएस प्रमाणन प्रणाली' के आधार पर दिया जाता है। 

 

भागीदारी गारंटी प्रणाली (PGS) के माध्यम से फसलों के जैविक होने की जाँच की जाती है। किसानों को जैविक खेती के लिए वित्तीय सहायता प्राप्त करने के लिए 500 से 1000 हेक्टेअर भूमि पर 20 से 50 किसान सदस्यों का एक समूह बनाना होता है। किसानों के एक समूह को अधिकतम 10 लाख रूपए का वित्तीय अनुदान दी जाती है। इसके अतिरिक्त पीजीएस सर्टिफिकेशन के लिए 4.95 लाख रूपए की धनराशि प्रदान की जाती है। 

 

पीजीएस प्रमाणन प्रणाली क्या है

 

सहभागिता गारंटी प्रणाली (पीजीएस) जैविक उत्पादों के प्रमाणन की एक प्रक्रिया है, जो जैविक उत्पादों के लिए निर्धारित मानकों के अनुसार कृषि उत्पाादन की प्रक्रिया और वांछित गुणवत्ता  को बनाए रखना सुनिश्चित करती है।  इसे जैविक खेती की विवरण के रूप में प्रदर्शित किया जाता है।

 

परंपरागत कृषि विकास योजना का क्रियान्वयन

 

इस योजना के अंतर्गत कार्यक्रम कार्यान्वयन निम्नलिखित प्रारूप में किया जाता है। 

  • परंपरागत कृषि विकास योजना के अंतर्गत जैविक खेती का काम शुरू करने के लिए 50 या उससे अधिक किसानों के ग्रुप बनाए जाते हैं। एक ग्रुप में 50 एकड़ की भूमि होती है। इसे तीन वर्षों के लिए परंपरागत कृषि विकास योजना में शामिल किया जाता है। 
  • इस योजना के लिए कुल 10 हजार ग्रुप बनाए जाने का लक्ष्य है, जिसमें 5 लाख एकड़ क्षेत्र को कवर किया जा रहा है। 
  • जैविक उत्पादों के प्रमाणीकरण के खर्च के लिए किसानों पर कोई भार नहीं डाला जाता है। 
  • फसलों की पैदावार के लिए, बीज खरीदने और उपज को बाजार में पहुँचाने के लिए हर किसान को 3 वर्षों में प्रति एकड़ 20 हजार रूपए दिए जाएंगे। 
  • परंपरागत संसाधनों का उपयोग करके जैविक खेती को प्रोत्साहित किया जाएगा और जैविक उत्पादों को बाजार से जोड़ा जाएगा। 
  • परंपरागत कृषि विकास योजना में किसानों का ऑनलाइन पंजीकरण किया जाता है। जिससे जैविक किसान में उनका नाम दर्ज हो सके। 
  • किसानों को इस योजना के तहत सीधे भुगतान नहीं किया जाता है। इस योजना के आयोजक ही किसानों की जैविक खेती में मदद करते हैं। यदि आवश्यक हो तो समस्त भुगतान डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के तहत उनके बैंक खाते में दिया जाता है। 

 

परंपरागत कृषि विकास योजना का उद्देश्य

 

  • जैविक कृषि को बढ़ावा देना है। जिससे रासायनिक खाद्य, कीटनाशक से होने वाले बीमारियों और किसानो की सेहत की सुरक्षा हो सके। इसके साथ ही  मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को नष्ट होने से बचाया जा सके।
  • परंपरागत और वैज्ञानिक विधि के मिश्रण से तैयार कृषि मॉडल पर आधारित खेती की जानकारी से किसानों को अवगत करवाना है। जिससे किसान कम कृषि लागत में ज्यादा फसल पैदा करके अपनी आय को बढ़ाने में सफल हो सके।
  • मानव उपभोग के लिए रसायन मुक्त एवं पौष्टिक फसल का उत्पादन हो सके।
  • पर्यावरण को हानिकारक कार्बनिक रसायनों से मुक्त करने के लिए जैविक खेती को प्रोत्साहन देना है।
  • किसानों को समूह आधार पर स्थानीय और राष्ट्रीय बाजार से जोड़कर किसानों को उद्यमी बनाना।
  • पीजीएस प्रणाली के माध्यम से फसलों की प्रमाणीकरण की सुविधा किसानों को उपलब्ध करवाना है।

 

परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) की विशेषताएं

 

इस योजना का लक्ष्य (10,000 एकड़) के 10,000 समूहों को तैयार करना है और 2017-18 तक जैविक खेती के तहत लगभग दो लाख हेक्टेयर कृषि क्षेत्र को लाना है।

 

केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा योजना के तहत फंडिंग पैटर्न क्रमशः 60:40 के अनुपात में है। उत्तर पूर्वी और हिमालयी राज्यों के मामले में, केंद्रीय सहायता 90:10 (केंद्र: राज्य) के अनुपात में प्रदान की जाती है और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए सहायता 100% है। 

 

परंपरागत कृषि विकास योजना के प्रमुख घटक

 

  1.  किसानों को संगठित करना : किसानों के जैविक खेती के विकास हेतु प्रशिक्षण।
  2.  गुणवत्ता नियंत्रण : मृदा नमूना विश्लेषण, प्रक्रिया का विस्तृत लेखन, समूह के सदस्यों के खेतों की जाँच।
  3.  जैविक कृषि का रूपांतरण : जैविक कृषि को बढ़ावा देना जिसमें जैविक चीजों जैसे- जैविक बीजों की खरीद और पारम्परिक जैविक बीज,जैविक नाइट्रोजन, हार्वेस्ट प्लांटिंग आदि शामिल हैं। 
  4.  समेकित खाद प्रबंधन : तरल कार्बनिक उर्वरक मिश्रण/कार्बनिक कीटनाश, नीमकेक (नीम की खली), फास्फेट युक्त जैविक खाद तथा कंपोस्ट की खरीद। 
  5.  कस्टम हायरिंग केंद्र शुल्क : योजना के अनुसार कृषि उपकरणों को किराए पर लेना।
  6.  जैविक मेलों के माध्यम से उत्पादों का विपणन

 

हाल के दिनों में जैविक खाद्य पदार्थों की माँग में काफी वृद्धि हुई है। यदि सरकार के साथ किसान भी परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) के लिए आगे आएं तो वो दिन दूर नहीं जब भारत पुनः जैविक खेती (organic farming) में अग्रणी देश बनेगा।

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