स्वतंत्र भारत में पंचायती राज की विकास यात्रा

स्वतंत्र भारत में पंचायती राज की विकास यात्रा

आजादी के बाद देश को प्रगति के रास्ते पर ले जाने के लिए कई कानून बने। जिसके आधार पर ही पंचायती राज अधिनियम-1992 बन सका।

26 June 2020

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  • अभी तक आप लोगों ने हमारे ब्लॉग भारत में स्वशासन का इतिहास में पढ़ा कि प्राचीन समय से ही भारत में स्वशासन का अपना एक इतिहास रहा है। समय-समय पर भले ही पंचायती राज संस्थाओं का स्वरूप बदलता रहा हो, लेकिन इसने कभी अपना अस्तित्व नहीं खोया। आईए, अब इस ब्लॉग में जानें कि आजादी के बाद पंचायती राज व्यवस्था की क्या स्थिति थी और पंचायतों के संवैधानिक विकास के लिए क्या-क्या कदम उठाए गए।

     

    1947 में देश में स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही ग्रामीण विकास एवं किसानों के कल्याण हेतु अनेक कदम उठाए गए। जिन राज्यों में पूर्व से जमींदारी प्रथा प्रचलित थी, उसको भी समाप्त करने का प्रयास किया गया। 

     

    प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू जी ने पंचायती राज व्यवस्था को और आधिक विकसित करने की ठानी और सामुदायिक विकास केंद्रों की स्थापना की। सामुदायिक क्रार्यक्रमों द्वारा ग्रामीण विकास को हर प्रकार से बढ़ावा दिया गया। 

     

    आजादी के बाद ग्रामीण विकास कार्यक्रम

    सन् 1952 में भारत सरकार ने ग्रामीण विकास पर विशेष ध्यान दिया और इसके लिए केन्द्र में पंचायती राज एवं सामुदायिक विकास मंत्रालय की स्थापना की गई। 2 अक्टूबर, 1952 को इस उद्देश्य के साथ 'सामुदायिक विकास कार्यक्रम' प्रारम्भ किया गया। इस कार्यक्रम के अधीन खण्ड(ब्लॉक) को इकाई मानकर इसके विकास हेतु सरकारी कर्मचारियों के साथ सामान्य जनता को विकास की प्रक्रिया से जोड़ने का प्रयास तो किया, लेकिन जनता को अधिकार नहीं दिया गया। जिससे यह सरकारी अधिकारियों तक ही सीमित रह गया।

     

    2 अक्टूबर, 1953 को ‘राष्ट्रीय प्रसार सेवा’ को प्रारम्भ किया गया। यह कार्यक्रम भी असफल रहा जिसके बाद समय-समय पर पंचायतों के विकास के लिए विभिन्न समितियों का गठन किया गया।

     

    इसके बाद 1957 में निर्वाचित प्रतिनिधियों को भागीदारी देने तथा प्रशासन की भूमिका केवल कानूनी सलाह देने तक सीमित रखने से सम्बन्धित सुझाव दिए। पंचायती राज का शुभारम्भ भी यहीं से माना जाता है जब लोगों को स्थानीय शासन में भागीदारी देने की बात की गई। 

     

    इसी क्रम में पंचायती राज व्यवस्था का उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 2 अक्टूबर 1959 को नागौर जिले के बगदरी गाँव से किया।

     

    आधुनिक भारत में राजस्थान को पहला राज्य होने का गौरव है, जहाँ पहली बार पंचायती राज की स्थापना की गई। 2 सितंबर 1959 को राजस्थान सरकार ने ‘पंचायत समिति एवं जिला परिषद अधिनियम-1959’ पारित कर पंचायती राज व्यवस्था की शुरूआत की।

     

    भारत में केवल नागालैंड को छोड़कर लगभग सभी राज्यों में पंचायती राज प्रणाली सुचारू रुप से चल रही है, कहीं एकस्तरीय, कहीं द्विस्तरीय, तो कहीं त्रिस्तरीय। जैसे- आंध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, इत्यादि राज्यों में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था संचालित की जा रही है। हरियाणा, तमिलनाडु में द्विस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू है। जबकि केरल, मणिपुर, सिक्किम, त्रिपुरा जैसे राज्यों में एक स्तरीय ग्राम पंचायतें लागू है। इसके अलावा पेसा कानून-1996 के अंतर्गत मेघालय, नागालैंड और मिजोरम जैसे राज्यों में एक स्तरीय जनजातीय परिषद् लागू है। 

     

    नीति-निर्देशक तत्व में पंचायती राज

    दिलचस्प है कि भारतीय संविधान में देश को प्रगति के रास्ते पर ले जाने के लिए कई कानून बने। परन्तु गाँधी जी के स्वराज के सपने को संविधान निर्माताओं ने केवल राज्य के नीति-निर्देशक तत्व-(अनुच्छेद-40) में स्थान देकर खानापूर्ति कर ली। गाँधीवाद के प्रति अपनी निष्ठा तो जताई लेकिन ग्राम-स्वराज को कानूनी मान्यता नहीं मिल सकी, जिससे स्वशासन की मूलभावना स्थापित नहीं हो सकी।

     

    समितियों का गठन और उनकी भूमिका

    इसके बाद देश में पंचायती राज को सशक्त बनाने, व्यवस्थित विकास की जिम्मेदारी देने और इसे लोकप्रिय बनाने के लिए कई समितियों का गठन किया गया। इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण बलवंत राय मेहता समिति, अशोक मेहता समिति, सिंधवी समिति और वी.एन गाडगिल समिति थी, इन्हीं की सिफारिशों के आधार पर पंचायती राज अधिनियम-1992 बन सका। सबसे पहले वर्ष 1957 में योजना आयोग के द्वारा ‘सामुदायिक विकास कार्यक्रम’ और ‘राष्ट्रीय विस्तार सेवा कार्यक्रम’ के अध्ययन के लिए ‘बलवंत राय मेहता समिति’ का गठन किया गया।

     

    बलवंत राय मेहता समिति

    सामुदायिक विकास कार्यक्रम के क्रियान्वयन हेतु बलवंत राय मेहता की अध्यक्षता में 1957 ई. में एक समिति का गठन किया गया, इस समिति ने सामुदायिक विकास कार्यक्रम और सत्ता की विकेंद्रीकरण का अध्ययन कर पंचायती राज के त्रिस्तरीय मॉडल को पेश किया।

     

    मेहता समिति की सिफारिशों के अनुसार-

    सत्ता में समान भागीदारी और सामुदायिक विकास कार्यक्रम को सफल बनाने हेतु पंचायती राज व्यवस्था की शुरुआत की जानी चाहिए।

    इस समिति ने ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, खंड (ब्लॉक) स्तर पर पंचायत समिति और जिला स्तर पर ज़िला परिषद् बनाने का सुझाव दिया।

     

    इस समिति की सिफारिशों को 1 अप्रैल 1958 को मान्यता दी गई और इसी के आधार पर 2 अक्टूबर 1959 में राजस्थान के नागौर जिले से पंचायती राज व्यवस्था का शुभारंभ किया गया। इसके बाद 1959 में ही आंध्र प्रदेश ने पंचायती राज अधिनियम को पारित किया। परन्तु वित्तीय व्यवस्थाओं और चुनाव में एकरुपता न होने के कारण यह असफल रहा।

     

    अशोक मेहता समिति

    बलवंत राय मेहता समिति की कमियों को दूर करने और एक सुव्यवस्थित पंचायती राज स्थापित करने के लिए सरकार ने अशोक मेहता समिति का गठन 1977 में किया। इस समिति ने 1978 में 132 सिफारिशें प्रस्तुत की।

     

    इस समिति ने त्रिस्तरीय पंचायती राज प्रणाली को द्विस्तरीय स्तर करने का सुझाव दिया। 

    1.    जिला परिषद,         2. मंडल पंचायत

    मेहता समिति ने अपनी सिफारिशों में ग्राम पंचायतों की जगह मंडल पंचायत की स्थापना की सिफारिश की।

     

    इस समिति की कुछ महत्वपूर्ण सिफारिशें निम्नलिखित हैं-

    •  त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था को समाप्त कर द्विस्तरीय प्रणाली अपनाई जाए।
    •  15000-20000 की जनसंख्या पर मंडल पंचायत का गठन किया जाए तथा ग्राम पंचायतों को समाप्त किया जाए।
    •  जिले को विकेंद्रीकरण का प्रथम स्थान माना जाए।
    •  पंचायत चुनाव राजनीतिक दल के आधार पर होने चाहिए।
    •  पंचायतों को कर लगाने की शक्ति दी जाए जिससे धन जुटाया जा सके।
    •  जिला स्तर के नियोजन के लिए जिले को ही जवाबदेही बनाया जाए तथा जिला परिषद एक कार्यकारी निकाय हो।

     

    जी.वी.के. राव समिति

    जी.वी.के. राव की अध्यक्षता में 1985 में ग्रामीण विकास और गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों के लिए प्रशासनिक प्रबंधन विषय पर एक समिति का गठन किया गया। इस समिति ने भी सत्ता की विकेंद्रीकरण की बात की। राज्य स्तर पर राज्य विकास परिषद, जिला स्तर पर जिला विकास परिषद, मंडल स्तर पर मंडल पंचायत तथा ग्राम स्तर पर ग्रामसभा की सिफारिश की।

     

    इस समिति ने कहा कि-

    पंचायतों का चुनाव नियमित हो, समिति ने विकेंद्रीकरण के तहत नियोजन एवं विकास कार्य में पंचायतों की भूमिका पर बल दिया। इस समिति ने विभिन्न स्तरों पर अनुसूचित जाति तथा जनजाति एवं महिलाओं के लिए आरक्षण की भी सिफ़ारिश की, लेकिन समिति की सिफ़ारिश को अमान्य कर दिया गया।

     

    एल. एम. सिंघवी समिति

    राजीव गाँधी सरकार ने 1986 में एल. एम. सिंघवी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया, जिसका मुख्य उद्देश्य प्रजातांत्रिक विकेंद्रीकरण में वृद्धि और पंचायतों का फिर से सशक्तिकरण करना था। 

     

    सर्वप्रथम एल. एम. सिंघवी ने ही पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा देने का सुझाव दिया।

    •  इस समिति ने ग्राम पंचायतों को सक्षम बनाने के लिए गाँवों के पुनर्गठन की सिफारिश की। इसके साथ-साथ यह भी सुझाव दिया कि ग्राम पंचायतों को अधिक वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराया जाए।
    •  पंचायती राज संस्थानों के चुनाव, उन्हें भंग करने और उनकी कार्यप्रणाली से जुड़े विवादों के न्यायिक समाधान के लिए प्रत्येक राज्य में न्यायिक संस्थाओं की स्थापना की जानी चाहिए।
    •  पंचायतराज के निर्वाचित प्रतिनिधियों को सभी विकास कार्यों की जिम्मेदारी सौंपी जाए ताकि ग्रामीण स्तर के सभी कार्यों पर पंचायती राज संस्थाओं का पूर्ण नियन्त्रण हो सके।

     

    वी.एन. गाडगिल समिति

    वर्ष 1988 में वी.एन. गाडगिल की अध्यक्षता में पंचायतों को और बेहतर बनाने के लिए इस समिति का गठन किया गया।

    इस समिति की प्रमुख सिफारशें निम्नलिखित हैं-

    •  पंचायती राज संस्थाओं को कानूनी मान्यता दी जाए।
    •  पंचायतों को अपने क्षेत्र में कर लगाने व वसूलने का अधिकार होना चाहिए।
    •  पंचायतों में सभी तीन स्तरों पर जनसंख्या के अनुसार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं के लिए भी आरक्षण होना चाहिए।
    •  त्रिस्तरीय पंचायती राज संस्थाओं का गठन कम-से-कम 5 वर्ष के लिए होना चाहिए।
    •  पंचायतों के लिए वित्त आयोग का गठन होना चाहिए जिससे पंचायतें आर्थिक रूप से सुदृढ़ हो सकें।

     

    64वाँ संशोधन विधेयक

    आपको बता दें,  गाडगिल और एल.एम.सिंघवी समितियों की सिफारिशों के फलस्वरूप ही तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने जुलाई 1989 में 64वाँ संविधान (संशोधन) विधेयक संसद में पेश किया ताकि पंचायती राज संस्थानों को और अधिक सशक्त बनाया जा सके। लोकसभा ने इस विधेयक को अगस्त 1989 में पारित कर दिया, लेकिन कांग्रेस के पास राज्यसभा में बहुमत नहीं होने के कारण यहाँ विधेयक पास नहीं हो सका।

     

    यहाँ यह भी जिक्र करना आवश्यक है कि वर्ष 1989 में 64वां संविधान संशोधन विधेयक राज्यसभा में असफल होने के बाद पीवी नरसिम्हा राव सरकार के दौरान 1992 के 73वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायतों को संवैधानिक दर्जा मिला। 

     

    अब हम अगले ब्लॉग में 73वें संविधान संशोधन अधिनियम और आधुनिक पंचायती राज व्यवस्था की विस्तृत चर्चा करेंगे।

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