जानिए नागा साधुओं की रहस्यमयी दुनिया, रोचक है ये कहानी

बहुत कठोर है इनका जीवन, जानिए नागा साधु बनने की प्रक्रिया

कुंभ में दिखने वाले नागा साधुओं का जीवन रहस्यमयी होता है। नागा साधु बनने के लिए कठोर तप करना पड़ता है। आइए जानें नागाओं से जुड़े रहस्य की कहानियां।

16 March 2021

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  • 12 सालों में सिर्फ कुंभ में दिखाई देने वाले नागा साधुओं का जीवन रहस्यों से भरा है। देखने में जितने रहस्यमयी लगते हैं ये साधु, वास्तव में भी उतनी ही कठोर साधना और तपस्या कर इस उपाधि को धारण करते हैं। नागाओं का संसार और गृहस्थ जीवन से कोई लेना-देना नहीं होता। ये अपना पूरा जीवन शिव की कठोर साधना में  गुज़ार देते हैं।

     

    आम जीवन की तुलना से 100 गुना ज़्यादा कठोर जीवन नागा साधु बिताते हैं। नागाओं का रहन-सहन, श्रंगार और पूजा पाठ सब कुछ आम जीवन से अलग होता है। सिर्फ कुंभ के समय ही आम लोग इन नागाओं को देख पाते हैं। 

     

    कैसे बनते हैं नागा साधु?

     

    नागा साधु बनने के लिए 12 साल कठोर तप करना पड़ता है। साधु बनने की प्रक्रिया की शुरुआत अखाड़े में प्रवेश करने से होती है। अखाड़े वाले व्यक्ति विशेष के बारे में पूरी जानकारी अपने स्तर पर हासिल करते हैं। घर-परिवार में भी संपर्क किया जाता है। इसके बावजूद भी अखाड़े के साधुओं के पैमाने पर खरा उतरना होता है। अखाड़े में प्रवेश की अनुमति योग्यता के आधार पर मिलती है, जिसे वहां के साधु तय करते हैं। संतों के 13 अखाड़ों में 7 संन्यासी अखाड़े ही नागा साधु बनाते हैं। ये हैं- जूना, महानिर्वाणी, निरंजनी, अटल, अग्नि, आनंद और आवाहन अखाड़ा।

     

     

    ब्रह्मचर्य की परीक्षा

     

    नागा साधुओं के ब्रह्मचर्य की परीक्षा बहुत कठिन होती है। इसमें बहुत वक्त भी लगता है। ब्रह्मचारी को महापुरुष कहा जाता है। महापुरुष के बाद व्यक्ति को अवधूत कहा जाता है। अवधूत बनने के बाद व्यक्ति को खुद का पिंडदान करना होता है। अखाड़े के झंडे के नीचे नग्न अवस्था में खड़ा किया जाता है। इस तरह व्यक्ति नागा दिगंबर साधु बन जाता है।

     

    धर्म का सुरक्षा कवच कहलाते हैं ये साधु

     

    नागा साधुओं को धार्मिक रक्षक भी माना जाता है। धर्म की रक्षा से इनके जन्म की कहानी जुड़ी है। ऐसा कहा जाता है कि सनातन धर्म की रक्षा के लिए कई सशस्त्र अखाड़ों की स्थापना की गई थी। नागा साधु व्यायाम के ज़रिए अपने शरीर को बलशाली बनाते हैं। अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान भी इन साधुओं को दिया जाता है। इसी वजह से इनके मठों को अखाड़ा कहा जाता है। 

    पहला अखाड़ा अखंड आह्वान अखाड़ा साल 547 में बनाया गया था। अखाड़ों को मठ, मंदिरों और श्रद्धालुओं की रक्षा के लिए शंकराचार्य ने सृजित किया था। उस दौर में यही अखाड़े धर्म का सुरक्षा कवच बने थे।

     

    नागा साधुओं की दिनचर्या

     

    सूर्योदय के पहले ही नागा साधुओं की आंख खुल जाती है।  ये साधु ब्रह्म मुहूर्त में स्नान और श्रृंगार करते हैं। नागा साधु 17 श्रृंगार करते हैं। इन कामों के बाद हवन, ध्यान, वज्रोली, प्राणायाम, कपाल क्रिया और नौली क्रिया को किया जाता है। नागा साधु केवल शाम को ही भोजन करते हैं । 

     

    कुंभ में मिलती है उपाधि

     

    सभी जानते हैं कि 12 वर्षों के अंतराल में कुंभ का आयोजन किया जाता है। कुंभ में ही साधुओं को नागा बनाया जाता है। 4 जगह पर होने वाले कुंभ में इन नागाओं को भी अलग-अलग उपाधि के ज़रिए नाम दिए जाते हैं, जिससे पता चलता है कि साधु कौन सा नागा है?

     

    • इलाहाबाद- नागा
    • उज्जैन- खूनी नागा
    • हरिद्वार- बर्फानी नागा 
    • नासिक- खिचडिया नागा 

     

    कहां रहते हैं नागा साधु?

     

    नागा साधु आश्रम और मठों के अलावा ऊंचे पहाड़ों की गुफाओं में भी तपस्या के लिए जाते हैं। कुछ नागा साधु मंदिरों में अपना जीवन बिताते हैं। अखाड़े के नियम के मुताबिक, ये पैदल ही घूमते हैं। 

     

    महिला नागा साधु

     

    महिला नागा साधु एक पदवी बनाई गई है। महिलाएं वस्त्रधारी नागा साधु होती हैं। माई बाड़ा को दशनाम संन्यासिनी अखाड़ा बनाया गया था। ये साधु 'माई', 'अवधूतानी' या 'नागिन' कहलाती हैं। कई जगह पर 'श्रीमहंत' का पद दिया जाता है।

     

    ये तो थी नागा साधुओं की बात। इसके अलावा Knitter पर आपको कृषि एवं मशीनीकरण, एजुकेशन और करियर, सरकारी योजनाओं और ग्रामीण विकास जैसे मुद्दों पर भी कई महत्वपूर्ण ब्लॉग्स मिलेंगे, जिनको पढ़कर अपना ज्ञान बढ़ा सकते हैं और दूसरों को भी इन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

     

     

    ✍️ लेखक- नितिन गुप्ता

     



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