मछली पालन के प्रचलित तरीकों (fish farming methods)पर एक नज़र

मछली पालन के आसान तरीकों(fish farming methods)को समझें

मछली पालन के कई तरीके हैं। किसान अपनी आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर मछली पालन के सही तरीकों (methods of fish farming) को अपना सकते हैं। आइए, उन्हें जानते हैं।

25 October 2020

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  • मौजूदा दौर कृषि क्षेत्र में बदलावों की दृष्टि से बेहद अहम है। ख़ास बात यह है कि हमारे किसान भी इन बदलावों को ध्यान में रखकर ही अपने कदम आगे बढ़ा रहे हैं। जिस तर्ज पर मछली पालन और उससे जुड़ी तकनीकों में बदलाव हुए हैं, हमारे किसानों को उनका भरपूर लाभ मिला है। तो चलिए, आज इस ब्लॉग के ज़रिए मछली पालन के उन तरीकों और तकनीकों को समझ लेते हैं, जिनसे किसान आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं।

     

    एक्सटेंसिव प्रक्रिया (Extensive process):

    इस प्रक्रिया के तहत मछली पालन के लिए एक ऐसे प्राकृतिक वातावरण को चुना जाता है, जिसमें बदलावों की गुंजाइश हो। मतलब, अगर किसान चाहें, तो मछली की किसी विशेष प्रजाति या किसी उपकरण की मदद से तालाब के वातावरण को नियंत्रित कर सकते हैं। इससे यह फ़ायदा होता है कि मछलियों को प्राकृतिक स्रोत से आहार मिल जाता है। साथ ही किसान उन्हें आवश्यकता अनुसार कुछ अतिरिक्त पोषण भी दे पाते हैं। ऐसे वातावरण में तिलपिया (tilapia) व कैटफिश जैसी मछलियां पाली जातीं हैं।

     

    इन्टेंसिव प्रक्रिया (Intensive process):

    इस तरह के मछली पालन को बहुत ही सीमित दायरे में अंजाम दिया जाता है। इसमें पानी की टंकियां महत्वपूर्ण भूमिका निभातीं हैं। यह प्रक्रिया थोड़ी महंगी होती है क्योंकि इसमें वॉटर प्योरिफिकेशन सिस्टम का उपयोग होता है। भले ही इसमें आहार और उपकरण दोनों ही महंगे होते हैं, लेकिन उत्पादन भी उसके अनुरूप ही मिलता है। हालांकि कभी-कभी मछलियों की संख्या में असंतुलन के चलते बीमारी का खतरा बना रहता है। इसलिए बहुत ही सावधानी के साथ इस प्रक्रिया को अपनाया जाता है। इसमें ट्राउट, ट्यूना तथा तिलपिया जैसी मछलियां पाली जातीं हैं। 

     

    सेमी- इन्टेंसिव प्रक्रिया (Semi-intensive process):

    यह प्रक्रिया ख़ास तौर पर उत्पादन बढ़ाने के लिए अपनाई जाती है। इसमें प्राकृतिक आहार के अलावा अतिरिक्त पोषण पर ज़ोर दिया जाता है। मछलियों को आहार के रूप में अनाज, केंचुए, घोंघा तथा खाद आदि दिए जाते हैं। इनके ज़रिए मछलियों को कुछ अन्य पोषक तत्व भी मिल जाते हैं। वहीं, मछलियों की स्टॉकिंग डेंसिटी यानी सघनता भी अधिक होती है। अमूमन 0.5 से 1 हेक्टेयर के तालाबों में इस प्रक्रिया को अपनाया जाता है।

    यहां तक हमने मछली पालन की प्रक्रिया तो समझ ली, आइए अब उन तकनीकों पर भी एक नज़र डाल लेते हैं, जो मछली पालन का भविष्य तय करतीं हैं।

     

     

     

    केज सिस्टम (Cage system)

    मछली पालन की इस तकनीक में पिंजरे नुमा जाल का इस्तेमाल किया जाता है। यह तकनीक हमारे देश में काफी प्रचलित है। इसके तहत जलाशयों में कुछ स्थान निर्धारित किए जाते हैं और वहां तैरने वाले ब्लॉक्स का इस्तेमाल किया जाता है। सभी एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। इन ब्लॉक्स का कुछ हिस्सा पानी के अंदर डूबा होता है, लेकिन एक छोटा हिस्सा बाहर तैरता नज़र आता है। इनमें छोटी-छोटी मछलियों को छोड़ा जाता है, जो बेहतर आहार व पोषण के बूते कुछ ही महीनों में अच्छा आकार व वज़न हासिल कर लेतीं हैं। इस तकनीक के ज़रिए पंगेसियस (पंगास) मछली पाली जाती है।

     

    पॉन्ड सिस्टम (Pond system)

    यह मछली पालन की सबसे प्रचलित तकनीक है। इसमें तालाब तैयार कर मछलियां पाली जातीं हैं। बरसात के पानी, बोरवेल या फिर नहर आदि के पानी से इन तालाबों को भरा जाता है। हालांकि तालाब के निर्धारण से पहले किसानों को मिट्टी की गुणवत्ता का ख़याल रखना होता है। इससे उत्पादन बेहतर होता है और मछली पालन से जुड़ी समस्याएं दूर रहतीं हैं।

     

    कम्पोज़िट सिस्टम (Composite System)

    यह मछली पालन की एक अन्य तकनीक है, जिसके तहत देशी व विदेशी प्रजातियों की मछली को एक साथ पाला जाता है। इसमें ऐसी प्रजातियों का चयन किया जाता है जो सह-अस्तित्व (co-existence) के लिहाज़ से उपयुक्त हों। मछली पालन का यह तरीका कई किसान उपयोग में लाते हैं।  

     

    हम उम्मीद करते हैं कि मछली पालन व उसके तरीकों पर लिखा हमारा यह ब्लॉग आपको पसंद आया होगा। यदि आप मछली पालन के बारे में और अधिक जानना चाहते हैं, तो बायोफ्लॉक तकनीक पर लिखा हमारा ब्लॉग ज़रूर पढ़ें। इससे आप मछली पालन को और भी बेहतर तरीके से समझ पाएंगे। 

     



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