कामकाजी महिलाओं (Women) के अधिकार (Rights) और कानून (Law)

कामकाजी महिलाओं (Women) के अधिकार (Rights) और कानून (Law)

महिलाओं (Women) के सशक्तिकरण के लिए आवश्यक है महिलाओं को उनके अधिकारों (Rights) और कानूनों (Law) के बारे में पता हो। इस ब्लॉग में इसी बारे में बात होगी।

07 January 2021

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  • बीते कुछ दशकों में महिलाओं (women) के काम करने को लेकर हमारे समाज का नज़रिया बदला है। जहां एक ज़माने में महिलाओं को चूल्हे-चौके तक ही सीमित रखा जाता था, आज वे हर क्षेत्र में अपनी मौजूदगी दर्ज करवा रही हैं। मल्टीनेशनल कंपनियों से लेकर राजनीति में बड़े-बड़े पदों पर महिलाएं अपनी काबिलियत साबित कर रही हैं। 

     

    महिलाओं को काम करने के लिए प्रेरित करने और कार्य स्थल (Work place) पर उनकी सुरक्षा (safety) तथा सुविधाओं (facility) के लिए सरकार (Government) द्वारा कई कानून (Law) बनाए गए हैं। ताकि वो अपने खिलाफ होने वाले भेदभाव के खिलाफ आवाज़ उठा सकें। लेकिन इसके लिए ज़रूरी है कि महिलाओं को इनके बारे में जानकारी हो। इस ब्लॉग में आज हम ऐसे ही कानूनों और अधिकारों (Rights) की चर्चा करेंगे।

     

    समान वेतन का अधिकार

     

    समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976 के मुताबिक, एक समान काम के लिए महिला (women) और पुरुष (man) को समान वेतन देना होगा। वेतन (salary) और मज़दूरी के लिए लिंग (Gender) के आधार पर भेदभाव करना कानूनन अपराध है। वहीं इसी अधिनियम के मुताबिक, कंपनी (Company) किसी पद (Post) पर भर्ती करते समय महिला और पुरुष में भेदभाव नहीं कर सकती। यदि कोई कंपनी प्रमोशन के समय किसी महिला से लिंग के आधार पर भेदभाव करती है तो समान पारिश्रमिक अधिनियम के तहत उस पर कार्रवाई की जा सकती है।

     

    मातृत्व लाभ के लिए कानून (Law)

     

    काम करने वाली गर्भवती महिलाओं को भारतीय संविधान में कुछ खास अधिकार मिलते हैं। मातृत्व लाभ संशोधन अधिनियम 2017 में कामकाजी महिलाओं को पूरे वेतन के साथ प्रसूति अवकाश (Paid Maternity Leave) दिए जाने की सुविधा मिलती है। महिला को प्रसव से पहले 8 हफ्ते और प्रसव के बाद 18 हफ्ते तक वेतन सहित अवकाश लेने का अधिकार है। कुल 26 सप्ताह के अवकाश के बाद महिला ‘वर्क फ्रॉम होम’ की भी मांग कर सकती है। वहीं 50 से ज़्यादा कर्मचारियों वाले संस्थान को शिशु गृह (क्रेच) की सुविधा देना भी अनिवार्य है। यदि कोई कंपनी इन नियमों के मुताबिक, गर्भवती महिला को सुविधाएं नहीं देती तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है। वहीं, गर्भवती महिला को किसी बहाने से काम से निकाले जाने पर पीड़ित महिला कोर्ट में केस कर सकती है। ऐसे मामलों में दोषी को एक साल की कैद तक हो सकती है।

     

    नाइट शिफ्ट के लिए कानून

     

    भारत में बहुत सारी महिलाएं कॉल सेंटर्स, मीडिया, स्वास्थ्य जैसे संस्थानों में कार्यरत हैं, जहां पर नाइट शिफ्ट में काम करना पड़ता है। हाल ही में पारित द अक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशन्स कोड, 2019 के मुताबिक अब कंपनी को किसी महिला से नाइट शिफ्ट में काम करवाने से पहले उसकी रज़ामंदी ज़रूर लेनी होगी। वहीं नाइट शिफ्ट में आने वाली महिला की सुरक्षा की पूरी ज़िम्मेदारी भी कंपनी की होगी।

     

    फैक्ट्री में महिलाओं के लिए कानून

     

    फैक्ट्री में ज़्यादातर काम शारीरिक श्रम से किया जाता है, यहां पर काम करने वाली महिलाओं को कुछ विशेष अधिकार और सुविधाएं मिलती हैं। फैक्ट्री अधिनियम 1948 के मुताबिक फैक्ट्री में काम करने वाली महिला से एक सप्ताह में 48 घंटों से ज़्यादा काम नहीं लिया जा सकता। काम करने का समय सुबह 7 से शाम 6 होना चाहिए और लगातार 5 घंटे से ज़्यादा काम नहीं करवाया जा सकता। महिलाओं से एक निश्चित सीमा से ज़्यादा वज़न नहीं उठवाया जा सकता।

     

    कार्य स्थल पर छेड़छाड़ या यौन उत्पीड़न

     

    महिलाओं को अक्सर छेड़छाड़ का सामना करना पड़ता है। कई बार कार्य स्थल (Work Place) पर महिलाएं इस तरह के अपराधों के खिलाफ आवाज़ उठाने में असहज महसूस करती हैं। चूंकि ऐसे करने वाले कभी उनके सहकर्मी तो कभी उनके सीनियर हो सकते हैं। महिलाओं को ऐसे में यदि अपनी सुरक्षा के लिए बने कानूनों की जानकारी हो तो वो ऐसे अपराधियों के खिलाफ एक्शन ले सकती हैं। 

     

    कार्य स्थल पर यौन उत्पीड़न क्या है?

     

    कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से संबंधी मामलों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 1997 में विशाखा जजमेंट के तहत प्राइवेट और सरकारी दफ्तरों के लिए गाइडलाइंस तय की हैं। इसके तहत हर ऑफिस में एक कमेटी बनानी अनिवार्य है जो महिलाओं से छेड़छाड़ की शिकायतों को नियमित आधार पर सुने और कार्रवाई करे।  इसकी जानकारी हर साल सरकार को देना भी ज़रूरी है। इसके अलावा गंभीर अपराधों की स्थिति में कमेटी को तुरंत इसकी जानकारी पुलिस को देना होगी, जिसमें आईपीसी के नियमों के तहत कार्रवाई होगी। यदि कोई कंपनी महिला की शिकायत पर कार्रवाई नहीं करती है तो ऐसी स्थिति में पीड़ित महिला सीधे थाने में जा सकती है। ऐसे मामलों में अपराधी के साथ-साथ कंपनी पर भी कार्रवाई की जाएगी।

     

    भेदभाव या छेड़छाड़ होने पर कहां करें शिकायत

     

    जॉब करने वाली महिलाएं अपने साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ या भेदभाव होने पर अपने बॉस या ऑफिस में बनी संबंधित कमेटी से शिकायत कर सकती हैं। ऑफिस द्वारा कार्रवाई ना किए जाने पर आपके पास ढेरों विकल्प हैं। नज़दीकी थाने/महिला थाने में जाकर आप शिकायत कर सकती हैं। इसे अलावा महिला आयोग या महिला हेल्पलाइन पर भी भेदभाव और छेड़छाड़ संबंधी शिकायत की जा सकती है।

     

    कामकाजी महिलाओं से जुड़े अधिकार और कानून

     

     

    हमें उम्मीद है कि आपको Knitter का यह ब्लॉग पसंद आया होगा। यहां आपको ट्रेंडिंग टॉपिक्स के अलावा बिज़नेस, कृषि एवं मशीनीकरण, एजुकेशन और करियर, सरकारी योजनाओं और ग्रामीण विकास जैसे मुद्दों पर भी कई महत्वपूर्ण ब्लॉग्स मिलेंगे। आप इनको पढ़कर अपना ज्ञान बढ़ा सकते हैं और दूसरों को भी इन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

    लेखक- मोहित वर्मा 

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