राधा-कृष्ण के रंग में रंगा बरसाना, प्रसिद्ध है लट्ठमार होली

बरसाने में लाठियों से खेली जाती है होली

बरसाने की लट्ठमार होली के बारे में किसने नहीं सुना? लेकिन, क्या आप इस होली के पौराणिक महत्व को जानते हैं? अगर नहीं, तो बने रहिए हमारे साथ...

26 March 2021

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  • ब्रज की होली बेहद खास है। बसंत पंचमी के दिन से ही इसकी शुरुआत हो जाती है। ब्रज यानी मथुरा-वृंदावन में होली का त्यौहार सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। बरसाने की लट्ठमार होली, राधा-कृष्ण के प्रेम का प्रतीक मानी जाती है। करीब एक महीने तक चलने वाले इस महोत्सव में अलग-अलग खेली जाने वाली होली में लट्ठमार होली का खास  महत्व है।

     

    ये है लट्ठमार होली की कहानी

     

    कथाओं में वर्णन है कि मथुरा से कुछ दूरी पर स्थित बरसाने में राधा रानी का जन्म हुआ था। फिलहाल बरसाना का मंदिर आधा उत्तर प्रदेश और आधा राजस्थान में मौजूद है। मान्यता के अनुसार, श्रीकृष्ण और राधा रानी के प्रेम की कहानी बरसाने से ही शुरू हुई थी। कहा जाता है कि श्रीकृष्ण नंदगांव से बरसाने राधा जी से मिलने आते थे। 

     

    अद्भुत है बरसाने की लट्ठमार होली, जानिए खासियत

     

    पुरातन कथाओं के मुताबिक, एक बार श्रीकृष्ण होली के वक्त बरसाने आए, यहीं उन्होंने राधा और उनकी सहेलियों के साथ होली खेलने की कोशिश की थी। कृष्ण की लीला से तंग आकर राधा रानी ने अपनी सखियों के साथ लाठी लेकर कृष्ण जी को खूब दौड़ाया। बस, तभी से बरसाने में लट्ठमार होली की शुरुआत हो गई।

     

    इस दिन मनाई जाती है लट्ठमार होली

     

    वैसे तो ब्रज में बसंत पंचमी के दिन से ही होली की शुरुआत हो जाती है। लेकिन, लट्ठमार होली फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाई जाती है। इस दिन महिलाएं अपने पतियों पर लट्ठ मारती हैं, तो प्रेमिकाएं अपने प्रेमियों पर लाठियां बरसाती हैं। इन लट्ठों से बचने के लिए पति या प्रेमी एक ढाल का इस्तेमाल करते हैं। ऐसा माना जाता है कि महिलाएं अपने पति या प्रेमी के साथ लट्ठमार होली खेल कर प्यार जताती हैं।

     

    ये भी है परंपरा

     

    कहा जाता है कि लट्ठमार होली के दिन बरसाने में सभी महिलाओं में राधा रानी की आत्मा बसती है, इसलिए पुरुष भी शौक से लाठियों के तौर पर राधा जी के प्रसाद को ग्रहण करते हैं। 

     

    नंदगांव के पुरुषों को गोप कहा जाता है, जो राधा मंदिर यानी ‘लाडली जी’ पर झंडा फहराने जाते हैं तो उन्हें महिलाओं की लाठियों से बचना होता है। एक-दूसरे से बातचीत के लिए इस दिन ‘होरी’ गाई जाती है, जो श्रीकृष्ण और राधा के बीच वार्तालाप पर आधारित होती है। 

     

    नंदगांव में भी मचती है धूम

     

    लट्ठमार होली के दिन नंदगांव के लोग राधा रानी के गांव जाते हैं और बरसाना गांव के लोग नंदगांव में जाते हैं। इन पुरुषों को होरियारे कहा जाता है। बरसाना की लट्ठमार होली के अगले दिन बरसाना के हुरियार नंदगांव की हुरियारिनों से होली खेलते हैं। इस दिन नंदगांव के नंद भवन में धूम मचती है। 

     

    करीब 2 हफ्ते चलने वाली होली में ब्रज का माहौल रंगभरा हो जाता है। लोग यहां मस्ती के साथ इस उत्सव को मनाते हैं। प्राकृतिक रंग-गुलाल का इस्तेमाल होली के दौरान किया जाता है। 

     

    ये तो थी बरसाने की लट्ठमार होली की बात। लेकिन, Knitter पर आपको कृषि एवं मशीनीकरण, एजुकेशन और करियर, सरकारी योजनाओं और ग्रामीण विकास जैसे मुद्दों पर भी कई महत्वपूर्ण ब्लॉग्स मिलेंगे, जिनको पढ़कर अपना ज्ञान बढ़ा सकते हैं और दूसरों को भी इन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।   

     

     

    ✍️ लेखक- नितिन गुप्ता 

     



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