जानिए कुंभ मेले से जुड़ी समुद्र मंथन की कहानी

कुंभ मेले के पीछे क्या है कहानी, कैसे हुई इसकी शुरुआत?

कुंभ मेला दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन है। 12 साल में कुंभ का आयोजन पवित्र नदियों के किनारे किया जाता है। क्या है इसकी पौराणिक मान्यता, आइए जानते हैं...

10 March 2021

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  • कुंभ मेले का आयोजन इस बार हरिद्वार में गंगा के किनारे किया जा रहा है। हर 12 साल के अंतराल में कुंभ का आयोजन किया जाता है। हरिद्वार में गंगा, उज्जैन में शिप्रा, नासिक में गोदावरी और प्रयागराज में त्रिवेणी संगम पर कुंभ मेला लगता है। 

     

    12 साल में एक बार होने वाले इतने बड़े आयोजन के पीछे कई मान्यताएं हैं। कई पौराणिक कथाओं में इसका वर्णन किया गया है। तो आइए, आपको बताते हैं कुंभ से जुड़ा इतिहास और वेद, पुराणों की कुछ अनसुनी कहानियां....

     

    कुंभ का अर्थ 

     

    कुंभ का शाब्दिक अर्थ कलश होता है। राशियों में कुंभ राशि का चिह्न भी कलश ही है। ज्योतिष के अनुसार बृहस्पति के कुंभ राशि और सूर्य के मेष राशि में आने पर कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है। प्रयागराज का कुंभ मेला सबसे महत्वपूर्ण माना गया है क्योंकि वहां तीन नदियों का संगम होता है। 

     

     

    समुद्र मंथन से जुड़ी कथा

     

    पौराणिक कथाओं में कुंभ समुद्र मंथन से जुड़ा विषय बताया गया है। कहा जाता है कि देवताओं और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन से कई रत्न, विष और अप्सराओं के अलावा अमृत भी निकला था। अमृत की चाह में देवासुर संग्राम हुआ। दोनों के बीच हुए इस युद्ध में अमृत कलश की कुछ बूंदें पृथ्वी पर भी गिरीं। ये अमृत की बूंदें जहां-जहां गिरीं, वहां-वहां कुंभ का आयोजन किया जाता है। कथाओं के मुताबिक अमृत की बूंद प्रयाग, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में गिरी थीं।

     

    12 स्थानों पर गिरा था अमृत

     

    शास्त्रों के अनुसार 12 दिन तक 12 स्थानों में देवासुर संग्राम चला जिसमें कुल 12 जगह अमृत कलश से छलका था। इन 12 स्थानों में से चार स्थान मृत्यु लोक में बताए गए हैं। बाकी के 8 स्थान अन्य लोकों में बताए जाते हैं। सामान्यतः 12वें वर्ष ही प्रत्येक स्थान में कुंभ पर्व की स्थिति बनती है।

     

    स्वर्ग में भी होता है कुंभ

     

    शास्त्रों के अनुसार पृथ्वी का एक साल देवताओं के एक दिन के बराबर होता है। इसलिए हर बारह साल पर एक स्थान पर पुनः कुंभ का आयोजन होता है। ऐसा कहा जाता है कि 144 साल के बाद स्वर्ग में भी कुंभ का आयोजन किया जाता है। जिस साल स्वर्ग में कुंभ का आयोजन होता है, उस साल पृथ्वी पर महाकुंभ का आयोजन किया जाता है।

     

    दो तरह का होता है कुंभ 

     

    अर्धकुंभ और पूर्ण कुंभ या महाकुंभ। अर्धकुंभ का आयोजन हर 6 साल में होता है। वहीं, पूर्ण कुंभ का आयोजन हर 12 साल में किया जाता है। अर्धकुंभ चारों जगह नहीं लगता, केवल हरिद्वार और प्रयागराज में ही इसका आयोजन होता है। उज्जैन और नासिक में जो कुंभ लगता है उसे 'सिंहस्थ' भी कहा जाता है।

     

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    ✍️ लेखक- नितिन गुप्ता

     



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