उत्तराखंड के चमोली में क्यों टूटा ग्लेशियर

उत्तराखंड: 20 साल में 4 आपदाएं, आखिर क्या है इसका कारण

आपदा, तबाही और बर्बादी...देवभूमि उत्तराखंड ने 20 सालों में विनाश के मंज़र को 4 बार देखा है। हर बार कुछ ऐसे घाव मिले हैं, जिसकी वजह केवल प्रकृति से खिलवाड़ है।

09 February 2021

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  • उत्तराखंड में आई आपदा के बाद अलकनंदा की सहायक नदियों में शामिल ऋषिगंगा पर बना पावर प्रोजेक्ट पूरी तरह तबाह हो चुका है। इस तबाही की वजह नंदादेवी ग्लेशियर के एक हिस्से का टूटना बताई जा रही है। दावा किया जा रहा है कि ग्लेशियर के टूटने से यहां जलप्रलय आया  है। 

     

    इन सारे दावों के बीच एक सच्चाई ये भी है कि सालों से ऋषिगंगा प्रोजेक्ट का विरोध होता रहा है। ऋषिगंगा पर बने इस प्रोजेक्ट को वहां के लोग ‘तबाही’ के रूप में देखते आए हैं। बरसों पहले की आशंका अब सच साबित हो चुकी है। तो आइए सबसे पहले समझिए ऋषिगंगा प्रोजेक्ट को…

     

    ऋषिगंगा प्रोजेक्ट को जानिए

     

    जोशीमठ जिले के चमोली में नंदा देवी पर्वत के पास ही ऋषिगंगा नदी, धौलीगंगा से मिल रही है। इस पूरे क्षेत्र को रैणी भी कहा जाती है। ऋषिगंगा नदी पर ही ये हाइड्रो प्रोजेक्ट बनाया गया था। 2008 में इसका काम शुरू हुआ था। ये एक निजी प्रोजेक्ट था।

     

     

    इस प्रोजेक्ट के ज़रिए ही पानी से बिजली बनाने का काम इस प्लांट पर चल रहा था। करीब 13 मेगावॉट का ये प्रोजेक्ट अब तबाह हो चुका है। इस प्रोजेक्ट का मकसद बिजली का प्रोडक्शन बढ़ाना था,  जिससे दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश को बिजली सप्लाई की जा सके। 

     

    NTPC का तपोवन पावर प्रोजेक्ट भी बर्बाद

     

    सरकारी कंपनी के एनटीपीसी का  तपोवन पावर प्रोजेक्ट 2006 में बनना शुरू हुआ था। इसका 70 फीसदी से ज़्यादा काम पूरा हो चुका था। इस साल इस प्रोजेक्ट का काम पूरा होने का अनुमान था, लेकिन इस तबाही से पावर प्रोजेक्ट को काफी नुकसान हुआ है।

     

    सालों से चल रहा है विरोध 

     

    ग्लेशियर के किनारे पर बांध बनाने की इस तरह की योजनाओं का लगातार विरोध हुआ है। रैणी गांव के ही कुछ लोग इस प्रोजेक्ट के खिलाफ हाई कोर्ट पहुंचे थे। लोगों ने इससे तबाही की आशंका जताई थी। रैणी गांव चिपको आंदोलन की जननी गौरा देवी की जन्मस्थली है। जिन्होंने पर्यावरण की रक्षा के लिए लंबी लड़ाई लड़ी है। गांव के लोगों ने हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट के विरोध में 2019 में चिपको आंदोलन की वर्षगांठ भी नहीं मनाई थी।

     

    1991 उत्तरकाशी भूकंप: उस वक्त उत्तराखंड उत्तर प्रदेश का हिस्सा था। अक्टूबर 1991 में 6.8 तीव्रता का भूकंप आया। 768 लोगों की मौत हुई, हजारों लोग हताहत हुए थे।

     

    1998 माल्पा भूस्खलन: पिथौरागढ़ में है माल्पा गांव, जहां भूस्खलन से 55 कैलाश मानसरोवर श्रद्धालुओं समेत करीब 255 लोगों की मौत हुई।

     

    1999 चमोली भूकंप: भूकंप ने 100 से ज्यादा लोगों की जान ले ली। रुद्रप्रयाग में भारी नुकसान हुआ था। 

     

    2013 केदारनाथ आपदा: जून में एक ही दिन में बादल फटने की कई घटनाओं के चलते भारी बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं हुईं थीं। 5,700 से ज्यादा लोग इस आपदा में जान गंवा बैठे थे। रुद्रप्रयाग, चमोली, उत्तरकाशी, बागेश्वर, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ जिलों में भारी तबाही हुई थी।

     

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    ✍️

    लेखक- नितिन गुप्ता 

     

     



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