भारतीय अर्थव्यवस्था में किसानों की स्थिति एवं समस्याएं

किसानों की वर्तमान स्थिति और समस्याएं

भारत की अर्थव्यवस्था में किसान एक मजबूत कड़ी हैं, जो हमारे देश की ताकत हैं। किसान ग्रामीण भारत का सबसे महत्वपूर्ण सदस्यों में से एक हैं।

07 August 2020

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  • हमारा देश एक कृषि प्रधान देश है। देश की अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यहाँ कुल आबादी का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा गाँवों में निवास करती है। जिसमें अधिकांश लोग किसान हैं। जिनका प्रमुख व्यवसाय कृषि है। यही वजह है कि भारत को “कृषि प्रधान” देश के रूप में जाना जाता है। 

     

    हमारे देश में किसानों पर अर्थव्यवस्था की प्रमुख ज़िम्मेदारी है। 

     

    आइए, इस ब्लॉग में जानें, भारत में किसानों की भूमिका और स्थिति क्या है?

     

    भारतीय अर्थव्यवस्था में किसान की भूमिका

     

    जैसा कि हमने ब्लॉग के शुरूआत में ही बताया कि हमारी आबादी का एक बड़ा प्रतिशत प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। शास्त्रों में भी किसानों को अन्नदाता का दर्जा दिया गया है। वास्तविक रूप से कहा जाए तो किसान हमारे राष्ट्र की रीढ़ हैं और भारतीय अर्थव्यवस्था की ताकत भी।

     

    फिर भी भारत में किसानों की स्थिति ठीक नहीं है। अगस्त 2018 में राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 10.07 करोड़ किसानों में से 52.5 प्रतिशत किसान कर्जे में दबे हुए हैं। वे गरीबी और बदहाली का जीवन का जीवन जी रहे हैं। जबकि राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका हैं। 

     

    किसान कौन हैं

     

    आजकल अधिकांश ग्रामीण लोग अपने आप को किसान की श्रेणी में रखते हैं। परन्तु किसान की असली परिभाषा क्या है, हम आपको यहाँ दे रहे हैं। 

     

    किसान उन्हें कहा जा सकता है, जो खेती का काम करते हैं। किसान अपने देश के उपभोक्ताओं के लिए ही नहीं, अपितु दूसरे देशों के लोगों के लिए भी खाद्य सामग्री का उत्पादन करता है। इस वर्ग के लोगों को कृषक या खेतिहर के नाम से भी जाना जाता है। 

     

    अब नई परिभाषा के अनुसार कृषक वर्ग में पशुपालक, बागवानी की देखभाल करने और मछली पालन करने जैसे प्राथमिक क्षेत्र में शामिल लोगों को भी किसान कहा जाता है।

     

    हालांकि इससे पहले तक केवल वही किसान होता था, जो खेत में फसल उगाता था और पशुओं, मछलियों आदि की देखभाल कर उन्हें बढ़ाता था। 

     

    यहाँ यह जिक्र करना आवश्यक है कि किसान या तो खेत का मालिक हो सकता है या उस कृषि भूमि के मालिक द्वारा काम पर रखा गया मजदूर हो सकता है। 

     

    भारत में किसानों का वर्गीकरण प्रायः जमीनों के मालिकाना हक के आधार पर किया गया है, जो निम्नलिखित है।-

     

    भारतीय अर्थव्यवस्था में किसान

    1. सीमांत किसान, 2. छोटे किसान, 3.अर्द्ध-मध्यम, 4. मध्यम किसान, 5. वृहत किसान

     

    सीमांत किसान

     

    सीमांत किसान से तात्पर्य उन किसानों से है जिनके पास खेत की जोत का आकार एक हेक्टेयर तक है। यहाँ यह भी बता दें कि एक हेक्टेयर में करीब ढ़ाई एकड़ जमीन होती है। यदि आपके पास ढ़ाई एकड़ से जमीन कम है तो आप भी सीमान्त किसानों की श्रेणी में आते हैं। 

     

    वर्ष 2010-11 की कृषि जनगणना के अनुसार भारत में किसानों की कुल जनसंख्या में 67% सीमान्त किसान परिवार है जिनके पास एक हेक्टेयर से कम कृषि योग्य भूमि हैl 

     

    छोटे किसान(लघु किसान)

     

    लघु किसान वह किसान होते हैं जिनके पास खेती करने योग्य भूमि केवल एक हेक्टेयर से ज्यादा और 2 हेक्टेयर से कम होती है। जिन किसानों के पास 5 एकड़ से कम जमीन है उन्हे ही लघु या छोटे किसान कहा जाता है।

     

    वर्ष 2010-11 की कृषि जनगणना के अनुसार भारत में किसानों की कुल जनसंख्या में 18 प्रतिशत लघु किसान(छोटे किसान) परिवार है जिनके पास 1 हेक्टेयर से 2 हेक्टेयर के बीच कृषि योग्य भूमि हैl

     

    अर्द्ध-मध्यम 

     

    अर्द्ध-मध्यम किसान वह किसान होते हैं, जिनके पास खेती करने योग्य भूमि केवल 2 हेक्टेयर से ज्यादा और 4 हेक्टेयर से कम होती है। 

     

    वर्ष 2010-11 की कृषि जनगणना के अनुसार भारत में 10 % किसानों के पास 2 हेक्टेयर से 4 हेक्टेयर के बीच कृषि योग्य भूमि है।

     

    मध्यम किसान

     

    मध्यम किसान का आशय उन कृषक वर्ग से है जिनके पास जोत का आकार 4 से 10 हेक्टेयर के बीच हो। इस तरह के किसानों की संख्या भारत में लगभग 4 % है। 

     

    वृहत किसान

     

    वृहद किसानों को जमींदार भी कहा जाता है। बड़े किसानों के पास 10  हेक्टेयर या उससे अधिक जमीन कृषि योग्य होती है। इस प्रकार के किसानों का उत्पादन भी बड़े पैमाने पर होता है। 

     

    हमारे देश में बड़े किसान (10 हेक्टेयर से अधिक कृषि योग्य भूमि वाले) का केवल एक प्रतिशत हैl 

     

    भारत में किसान की समस्याएं

     

    भारत की पहचान हमेशा एक कृषि प्रधान देश के रूप में रही है परन्तु वर्तमान में कृषि क्षेत्र काफी बदहाल स्थिति में है। जहाँ अधिकतर किसानों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है।

     

    भारतीय कृषि कई समस्याओं से त्रस्त है, उनमें से कुछ प्राकृतिक हैं और कुछ अन्य मानव निर्मित हैं जो निम्न है। 

     

    छोटे और खंडित भूस्खलन: भारत देश में अत्यधिक जनसंख्या होने के कारण खेतों के जोतों के आकार काफी छोटे-छोटे हैं। छोटे आकार के खेतों पर आधुनिक कृषि तकनीकी को अपनाने में काफी कठिनाई होती है। छोटे खेत वाले किसान उत्तम बीज, उर्वरक, आधुनिक कृषि उपकरण आदि का प्रयोग करने में असमर्थ होता है। 

     

    बीज की समस्या: उच्च फसल पैदावार प्राप्त करने और कृषि उत्पादन में निरंतर वृद्धि के लिए बीज एक महत्वपूर्ण और बुनियादी जरूरत है। लेकिन दुर्भाग्यवश अच्छी गुणवत्ता के बीज किसानों के पहुँच से बाहर है, विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसान मुख्य रूप से बेहतर बीजों की अत्यधिक कीमतों के कारण बेहतर खेती नहीं कर पाते हैं।

     

    खाद एवं उर्वरक का अत्यधिक प्रयोग:  भारतीय मिट्टी का उपयोग हजारों वर्षों से अधिक फसलों को उगाने के लिए किया जाता है। देश में हरित क्रांति के कारण मृदा की गुणवत्ता निरंतर कम होती जा रही है जिसके परिणामस्वरूप उत्पादकता कम हो गई है। 

    आपको बता दें, भारत में लगभग सभी फसलों की औसत पैदावार दुनिया में सबसे कम है जोकि चिंताजनक है। 

     

    सिंचाई: हालांकि भारत चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सिंचित देश है, लेकिन केवल एक तिहाई फसली क्षेत्र सिंचाई के अधीन है। भारत जैसे उष्णकटिबंधीय मानसून देश में सिंचाई का मुख्य स्रोत आज भी मानसूनी बारिश है। जहाँ वर्षा अनिश्चित, अविश्वसनीय और अनियमित होती है।

     

    मशीनीकरण का अभाव: देश के कुछ हिस्सों में कृषि के बड़े पैमाने पर मशीनीकरण के बावजूद, बड़े हिस्सों में अधिकांश कृषि कार्यों को सरल और पारंपरिक साधनों और लकड़ी के हल, दरांती, आदि जैसे उपकरणों का उपयोग करके मानव हाथ द्वारा किया जाता है। इसके परिणामस्वरूप मानव श्रम का भारी अपव्यय होता है और प्रति व्यक्ति श्रम शक्ति में कम पैदावार होती है।

     

    अशिक्षा- अशिक्षा, अंधविश्वास तथा समाज में व्याप्त कुरीतियां कृषक परिवार के साथी हैं। सरकारी कर्मचारी, बड़े जमीदार, बिचौलिया तथा व्यापारी ऐसे दुश्मन हैं, जो जीवनभर उनका शोषण करते रहते हैं। 

    स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जमीदारों के शोषण से तो उसे मुक्ति मिल ही चुकी है परन्तु वह आज भी पूर्ण रूप से सुखी नहीं हैं।

     

    कृषि विपणन: ग्रामीण भारत में कृषि विपणन का बुरा हाल है। कृषि विपणन सुविधाएं नहीं मिलने के कारण किसानों को अपने खेत की उपज के निपटान के लिए स्थानीय व्यापारियों और बिचौलियों पर निर्भर होना पड़ता है। ज्यादातर मामलों में, इन किसानों को मजबूर किया जाता है। अधिकांश छोटे गाँवों में, किसान अपनी उपज को उस ऋणदाता को बेचते हैं, जिनसे वे आमतौर पर पैसा उधार लेते हैं।

     

    अपर्याप्त भंडारण सुविधाएं: ग्रामीण क्षेत्रों में भंडारण सुविधाएं या तो पूरी तरह से नहीं है या भारी कमी है। ऐसी परिस्थितियों में किसान अपनी उपज कम दाम में बेचने के लिए मजबूर होते हैं, जोकि बाजार की मौजूदा कीमतों पर फसल होने के तुरंत बाद दाम कम होता है। 

     

    अपर्याप्त परिवहन: भारतीय कृषि के साथ एक मुख्य बाधा परिवहन के सस्ते और कुशल साधनों की कमी है। वर्तमान में भी लाखों गाँव ऐसे हैं जो मुख्य सड़कों और मंडियों से अच्छी तरह से नहीं जुड़े हैं।


     

    पूँजी की कमी: कृषि एक महत्वपूर्ण उद्योग है और अन्य सभी उद्योगों की तरह इसमें भी पूंजी की आवश्यकता होती है। कृषि प्रौद्योगिकी की उन्नति के साथ पूंजी इनपुट की भूमिका महत्वपूर्ण होती जा रही है। किसान को पैसे के मुख्य आपूर्तिकर्ता साहूकार, व्यापारी और कमीशन एजेंट होते हैं जो उच्च ब्याज दर लेते हैं और बहुत कम कीमत पर कृषि उपज की खरीद करते हैं।

     

    किसानों के बारे में हमें क्यों सोचना चाहिए

     

    वर्तमान परिस्थितियों में किसानों के कल्याण के लिए हम सभी को सोचना और अमल करना चाहिए, क्योंकि भारत में कृषि का एक बड़ा योगदान है। जिसके बिना खाद्य आपूर्ति संभव नहीं है। 

     

    आज भी किसानों को वरियता नहीं दी जाती है। जबकि देश की अर्थव्यवस्था में किसानों का अहम योगदान है। 

     

    हमें यह भी सोचना चाहिए कि आजकल लोग कृषि पर ज्यादा ध्यान नहीं देते हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा तो हो सकता है, एक दिन खेती से लोग मुंह मोड़ लेंगे और कृषि करने वाले लोग बहुत ही कम हो जाएंगे। कृषि का योगदान धीरे-धीरे और कम हो जाएगा जिससे लोगों को बेरोज़गारी का सामना करना पड़ सकता है।

     

    संक्षेप में कहें तो किसान हमारे देश का महत्वपूर्ण अंग हैं। हमें किसानों के परिश्रम का मूल्य समझना चाहिए और हर संभव किसानों की समस्या के निवारण के लिए निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए। किसान खुशहाल होगा तभी हमारा भारत आत्मनिर्भर भारत बन सकेगा। 

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