कृषि की वर्तमान स्थिति और अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान

कृषि की वर्तमान स्थिति और योगदान

भारत में कृषि का महत्त्वपूर्ण स्थान है और खाद्यान्न की आपूर्ति कृषि द्वारा ही होती है। ऐसे में देश की खुशहाली के लिए कृषि व्यवस्था का मजबूत होना अति आवश्यक है।

07 August 2020

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  • भारत वर्ष में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है और किसानों की मुख्य आय का साधन खेती है। आवश्यक खाद्यान्नों की आपूर्ति के लिए हम कृषि पर ही निर्भर हैं। भारत की एक बड़ी आबादी को रोज़गार कृषि से प्राप्त होता है। ऐसे में  किसी भी कृषि प्रधान देश की खुशहाली के लिए कृषि व्यवस्था का मजबूत होना आवश्यक हो जाता है। 

     

    आईए जानते हैं, भारत की कृषि के स्वरूप और इतिहास के बारे में।

     

    भारतीय कृषि का इतिहास

     

    हमारे देश में कृषि की गौरवशाली परम्परा रही है।  पौराणिक ग्रन्थों की श्लोकों और इतिहासकारों द्वारा किया गया शोध यह बताता है कि भारतीय सभ्यता सदा से ही कृषि प्रधान रही है। प्राचीन भारत में कृषि ही अर्थव्यवस्था की रीढ़ थी। 

     

    इतिहास में विभिन्न कालखंडों का अध्ययन भी इस तथ्य को पुष्ट करता है कि भारत में कृषि सिंधु घाटी सभ्यता के दौर से की जाती रही है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर इतिहासकारों का कहना है कि वैदिक काल में जुताई, बुवाई, कटाई आदि क्रियाएं होती थी। खेती में हल, हंसिया, कुदाल आदि उपकरणों का प्रयोग किया जाता था।  इन्हीं उपकरणों की सहायता से गेहूं, धान, जौ आदि फसलों की खेती की जाती थी। 

     

    इसके अलावा चक्रीय परती पद्धति के द्वारा मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाने का उल्लेख भी विश्व के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद के श्लोकों में है।

     

    भारत में कृषि की वर्तमान स्थिति

     

    हम सभी जानते हैं, भारत में कृषि मानसून पर निर्भर है। यदि हमारे देश में बारिश सही समय पर नहीं होती है, तो देश में सूखे की स्थिति बन जाती है। यदि मानसून सही समय और बारिश पर्याप्त मात्रा में होती है तो कृषि उत्पादन भी ठीक होता है। जिससे खाद्यान्नों की पूर्ति और उद्योगों को भी पर्याप्त मात्रा में कच्चा माल प्राप्त हो जाता है।

     

    हमारे देश में कृषि लंबे समय से पूर्ण रूप से विकसित नहीं थी। आज़ादी के पहले हमारी कृषि बारिश पर निर्भर थी और हम अपने देश के लोगों के लिए ही पर्याप्त अन्न उत्पन्न नहीं कर पाते थे। जिससे भारत को अन्य देशों से अनाज खरीदने की आवश्यकता होती थी, लेकिन अब चीजें बदल रही है।

     

    भारत में कृषि का स्वरूप

     

    वर्तमान समय में भारत अपनी आवश्यकताओं के मुकाबले अधिक अनाज का उत्पादन कर पा रहा है। कुछ खाद्यान्नों को तो अन्य देशों में निर्यात किया जा रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में कृषि क्षेत्र में बहुत से सुधार किए गए हैं। आज हम खाद्यान्नों के मामले में आत्मनिर्भर हो चुके हैं और शेष अनाज व अन्य कृषि उत्पादों को दूसरे देशों में निर्यात करने में भी सक्षम हैं।

     

    भारत में चावल, गन्ना, गेहूं और तम्बाकू आदि प्रमुख फसलें हैं, तो वहीं दूसरी ओर कपास और तिलहन की भी फसलें भारत में पैदा की जाती है। हमारे देश की भौतिक संरचना, जलवायु और मृदा जैसे कई कारक कृषि के अनुकूल है, जिसके कारण हमारे देश में अनेक प्रकार की फसलें पैदा की जा सकती है। 

     

    आपको बता दें, हमारे देश में सभी मौसम में किसी न किसी प्रकार की फसलें उगाई जाती है। वर्तमान में भारत चाय और मूंगफली के उत्पादन में पहले जबकि चावल, गन्ना, जूट और तिलहन के उत्पादन में दुनिया में दूसरे नंबर पर है।

     

    भारतीय कृषि की विशेषताएं

     

    मानसून पर निर्भरता- हमारे देश की खेती मुख्यतः मानसून पर निर्भर है। इसीलिए भारतीय कृषि को ‘मानसून का जुआ’ भी कहा जाता है। यदि बारिश अच्छी होती है तो कृषि भी अच्छी होती है अन्यथा देश में सूखे  के हालात हो जाते हैं।

     

    आजीविका का स्रोत- जैसा कि हम पहले भी जिक्र कर चुके हैं कि हमारे देश की लगभग आधी आबादी कृषि पर निर्भर है। लगभग 52% लोगों को रोजगार कृषि से मिलता है, लेकिन जीडीपी में कृषि का योगदान केवल 14% ही है।

     

    जोत का छोटा आकार- भारत में छोटे-छोटे खेत हैं। खंडित कृषि भूमि के कारण हमारे देश में मशीनीकरण का लाभ नहीं मिल पाता है। छोटे जोत आकार के कारण उच्च स्तर की कृषि नहीं हो पाती है। 

     

    श्रम की अधिकता- भारत में जनसंख्या वृद्धि के कारण भूमि पर दबाव बढ़ गया है और भूमि जोत के आकार छोटे-छोटे हो गए हैं। जिसके कारण ऐसे खेतों पर आधुनिक मशीनों का उपयोग नहीं हो पा रहा है। जिससे आज भी खेती में श्रम की अधिकता बनी हुई है। 

     

    बेरोजगारी- पर्याप्त सिंचाई साधनों के अभाव और अपर्याप्त वर्षा के कारण किसान साल के कुछ ही महीने कृषि-कार्य कर पाते हैं। जिसके कारण लोगों को सालभर रोजगार नहीं मिल पाता है। इसे छिपी बेरोजगारी या मौसमी बेरोजगारी भी कहा जाता है।

     

    उत्पादन के पारंपरिक तरीके- हमारे देश में आज भी पारंपरिक खेती का चलन है। केवल खेती ही नहीं इसमें प्रयुक्त होने वाले उपकरण भी परम्परागत हैं, जिससे उन्नत खेती नहीं हो पाती है।

     

    खाद्य फसलों का प्रभुत्व- भारत में फसलों के कुल उत्पादन में करीब 75% हिस्सा  गेहूं, चावल और बाजरा जैसी खाद्य फसलों का है, जबकि केवल 25% हिस्सा ही वाणिज्यिक फसलों का है। वाणिज्यिक खेती का कम होना हमारे देश में पिछड़ी कृषि का कारण है।

     

    कम कृषि उत्पादन- भारत में कृषि उत्पादन कम है। गेहूं का उत्पादन भारत में लगभग 27 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, फ्रांस में 71 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और ब्रिटेन में 80 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। एक कृषि मजदूर की औसत वार्षिक उत्पादकता भारत में 162 डॉलर, नॉर्वे में 973 डॉलर और यूएसए में 2408 डॉलर आंकी गई है।

     

    भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान

     

    कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। अधिकांश भारतीय परिवारों के लिए कृषि एक महत्वपूर्ण व्यवसाय है। देश की लगभग 52% जनसंख्या इस क्षेत्र में कार्यरत है। जबकि कृषि का भारत के सकल घरेलू उत्पाद(जीडीपी) में लगभग 14% योगदान है, जोकि लगातार घटती ही जा रही है। इसके अलावा देश के कुल निर्यात में कृषि का योगदान घटकर 18% रह गया  है।

     

    औद्योगिक क्षेत्र को कच्चे माल की आपूर्ति- कई उद्योग जैसे कपास उद्योग, चीनी उद्योग, जूट उद्योग आदि अपने कच्चे माल की आवश्यकताओं के लिए कृषि पर निर्भर हैं। इसके अलावा, विभिन्न उद्योगों में लगे श्रमिक भी अपनी खाद्य आवश्यकताओं के लिए कृषि पर निर्भर हैं।

     

    औद्योगिक उत्पाद के लिए बाजार- कृषि बड़ी संख्या में औद्योगिक उत्पादों के लिए बाजार उपलब्ध कराती है। चूंकि भारत का लगभग दो-तिहाई हिस्सा ग्रामीण क्षेत्र में रहता है, इसलिए एक बड़ी ग्रामीण क्रय शक्ति है जहाँ सभी प्रकार के औद्योगिक उत्पादों की बड़ी मांग पैदा की है।

     

    विदेशी मुद्रा का स्रोत- चाय, कपास, कॉफी, जूट, फल, सब्जियां, मसाले, चीनी तेल इत्यादि जैसे कृषि वस्तुओं के निर्यात से हमारे देश में विदेशी मुद्रा अर्जित की जाती है। कृषि उत्पादों के निर्यात में वृद्धि होने से हमारे देश का आर्थिक विकास भी हो रहा है। 

     

    भारत में कृषि की ताकत, कमजोरी, अवसर और जोखिम(SWOT) का विश्लेषण

     

    भारतीय कृषि का मजबूत पहलू (Strength)

    • लगभग 51% भारतीय भूमि में कृषि भूमि शामिल है।

    • जलवायु कृषि के लिए उपयुक्त है।

    • उर्वरक, कीटनाशकों और एग्रोकेमिकल्स की आपूर्ति के लिए आपूर्ति प्रणाली मजबूत है।

    • देश में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सिंचाई प्रणाली है जिसकी अनुमानित क्षमता 156 मिलियन हेक्टेयर है।

    • देश की आधी से अधिक श्रमशक्ति (52%), लगभग 243 मिलियन लोग कृषि क्षेत्र में कार्यरत हैं।


    भारतीय कृषि का कमजोर पहलू (Weakness)

    • भारत में कृषि तकनीकी रूप से विकसित नहीं है।

    • भारत में औसत उपज दुनिया की औसत उपज का सिर्फ 30% से 50% है।

    • भारत में छोटे व खंडित कृषि भूमि है।

    • गरीब बुनियादी ढांचे के कारण कुछ किसानों को आधुनिक सुविधाओं की अनुपलब्धता है।

    • सिंचाई की सुविधा अपर्याप्त है, जिसके परिणामस्वरूप किसान अभी भी बारिश पर निर्भर है।

     

    भारतीय कृषि में अवसर(Opportunity)

    • कृषि आधारित उद्योग-मशीनरी की अपार संभावनाएं।

    • भारतीय कृषि उत्पादों की अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में विस्तार की क्षमता।

    • कृषि आधारित उत्पाद एवं उद्योग की अपार संभावनाएं।

    • कृषि क्षेत्र में रोजगार और व्यवसाय के व्यापक अवसर।

    • खेती को कुटीर उद्योग से जोड़कर व्यापक रूप से प्रोत्साहन दिया जा सकता है।

    • किसानों को ई-मंडियों से जोड़कर उनके भविष्य को काफी बेहतर बनाया जा सकता है।


    भारतीय कृषि में जोखिम(Threats)

    • भारतीय कृषि में जोखिम का मुख्य कारण पारिश्रमिक लागत से भी कम आय।

    • बाजार की अनुपस्थिति और बिचौलियों द्वारा अत्यधिक मुनाफा कमाना।

    • कृषि बाजार की भारी कमी।

    • मौसम की अनिश्चितता।

    • फसलों की घटिया गुणवत्ता (खराब बीज गुणवत्ता) का उत्पादन।

     

    निष्कर्ष

    उपरोक्त से स्पष्ट है कि भारत में कृषि क्षेत्र की सरंचनात्मक रूप से परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। जिसके परिणाम स्वरूप इसके समक्ष नई चुनौतियाँ और अवसर उत्पन्न हो रहे हैं। सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र में अनेक सुधार किए गए हैं और  कृषि तकनीकी के उपयोग को व्यापक रूप से प्रोत्साहन दिया गया है।

     

    हालाँकि, कृषि क्षेत्र की चुनौतियों का समाधान केवल सरकार द्वारा ही नहीं किया जा सकता है। भारत के प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन ने कहा है कि- “यदि कृषि विफल हो जाती है, तो अन्य सब कुछ विफल हो जाएगा।“ यह हम पर निर्भर करता है कि हम क्या चुनते हैं।

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