फसलों की कटाई और भंडारण

फसल की कटाई व भंडारण का ज्ञान है जरूरी, आइए जानें

इस ब्लॉग को पढ़ने के बाद आप जानेंगे, कटाई में प्रयुक्त होने वाली प्रमुख यंत्रों और भंडारण के बारे में।

24 August 2020

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  • भारत में अलग-अलग समय के आधार पर कई तरह की फसलें उगाई जाती है और इन फसलों की कटाई त्योहारों के साथ की जाती है। बसंत पंचमी, होली, ओणम, बैसाखी कुछ ऐसे ही त्योहार हैं जब हमारे देश में कटाई की जाती है। किसान अपनी मेहनत से आई फसलों को देखकर खुश होते हैं। अच्छी फसल होने पर किसान इन मौकों पर खुशियाँ मनाते हैं। लेकिन इन दौरान किसानों को बड़ी जोखिम भी होती है।

     

    आइए इस ब्लॉग में जानें, फसल की कटाई, थ्रेसिंग और अनाज भंडारण के दौरान रखे जाने वाली सावधानियों के बारे में।

     

    कटाई

    'कटाई' या 'कटनी' वह कृषि कार्य है जिसमें तैयार फसल को खेतों से काटकर एकत्रित किया जाता है। इसके बाद उसकी मड़ाई, ओसनी एवं भंडारण किया जाता है। 

     

    दूसरे शब्दों में कहें तो फसल को काटने और इकट्ठा करने की प्रक्रिया को 'कटाई' कहा जाता है। प्रायः फसल की कटाई अन्न के परिपक्व या आर्थिक दृष्टि से लाभ होने की अवस्था में की जाती है। 

     

    आधुनिक समय में किसान प्रायः परम्परागत कटाई औजार को छोड़, नए औजारों का प्रयोग कर रहे हैं क्योंकि इन मशीनों से मानवश्रम और समय की बचत होती है।

     

    कटाई में प्रयुक्त होने वाले प्रमुख यंत्र

    फसल काटने के लिए इस्तेमाल होने वाला पारंपरिक औजार दरांती है, जबकि आधुनिक खेती में हार्वेस्टर का उपयोग किया जाता है। 

     

    आईए अब जानते हैं कुछ कटाई मशीनों के बारे में-

     

    फसलों की कटाई और भंडारण

     

    दरांती

    दरांती हाथ से पकड़कर फसल एवं घास आदि काटने के काम आने वाला एक सरल कृषि उपकरण है।  इसे हँसिया के नाम से भी जाना जाता है। इसे सब्जियों, अनाज फसलों और घास को काटने और अन्य वनस्पति मामलों की कटाई के लिए प्रयोग किया जाता है। हँसिया की आकृति अर्धचंद्राकार होती है। कुछ ऐसी हँसिया होती हैं जिनमें दाँतें बने रहते हैं और कुछ बिना दाँतों की बनी होती है। दाँतेदार हँसियों की कार्यक्षमता बिना दाँतों की हँसियों से अधिक होती है।

     

    रीपर

    यह मशीन धान-गेहूँ जैसी खड़ी फसलों को काटने लिए सबसे छोटी और सरल मशीन है। इस मशीन से एक घंटे में लगभग 1 एकड़ फसल की कटाई हो जाती है। इससे किसानों को मजदूर और समय की काफी बचत हो जाती है। रीपर में लगभग 4 फुट लंबी कटाई की पट्टी लगी रहती है, जिसमें लगभग 25 से 30 तक काटने वाले चाकू लगी रहती है। 

     

    फूस काटने वाली मशीन(चारा मशीन)

    गेहूं जैसे अनाज के साथ अन्य अखाद्य भागों को फूस के रूप में जाना जाता है। फूस काटने वाला यंत्र अनाज के बीज को पौधे के अन्य भाग से अलग करने के काम आता है। सूखी घास, पुआल आम तौर पर मवेशियों को खिलाया जाता है। 

     

    घास काटने की मशीन

    बड़ी लंबाई वाली घास के लिए और छोटी घास काटने के लिए इस्तेमाल साधन को घास काटने की मशीन कहा जाता है। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से खेल के मैदान और विशाल उद्यान पर लॉन की सफाई करने के लिए किया जाता है। घास काटने की मशीन का उपयोग करना, घास वर्दी की लंबाई बनाने का एक और अधिक कारगर तरीका है।


    कंबाइन- थ्रेसर

    अनाज या बीजों को अलग करने के लिए कंबाइन-थ्रेसर का इस्तेमाल किया जाता है। गेहूँ और जौ की फसल की कटाई करने के लिए अन्य विकसित देशों में तथा भारत में, बड़े विस्तार के फार्मों पर कंबाइन मशीन का प्रयोग किया जाता है। इस मशीन में ही इंजन लगा रहती है, जिसकी सहायता से मशीन चलती है।

     

    दूसरे शब्दों में कहें तो कंबाइन-थ्रेसर फसल को गाहने और काटने की संयुक्त मशीन है। यह खेत में घूमकर फसल काटती, गाहती तथा अनाज को साफ करती है। डंठल खेत में खड़ा छूट जाता है और फसल कटकर सीधे मशीन में चली जाती है। इसके साथ ही मशीन में ही मड़ाई, ओसाई और छनाई होकर साफ अनाज एक तरफ बोरों में भरता चला जाता है तथा भूसा एक तरफ गिरता चला जाता है। 

     

    यहाँ यह जानना आवश्यक है कि मड़ाई केवल अनाज की बालियों की ही होती है, शेष भाग की नहीं। अतः यह कंबाइन थ्रेसर उच्च कोटि की होते हुए भी भारत के किसानों के लिए, इसकी संस्तुति नहीं की जाती, क्योंकि इसमें भी काफी मात्रा में भूसे की हानि होती है। 

     

    थ्रेसिंग (मड़ाई)

    खलिहान में मड़ाई या 'दंवरी' या दौंरी कृषि की वह प्रक्रिया है जिसमें कटी फसल की फलियों से दाने को विमुक्त किया जाता है। यह कटाई एवं ओसौनी के बीच की प्रक्रिया है। इस क्रिया में कटी फसल को किसी प्रकार इतना झकझोरा जाता है कि उसके पके दाने अलग हो जाए।

     

    परम्परागत कृषि में यह प्रक्रिया पहले कटी फसल को किसी सख्त तल के ऊपर बिखेर कर बैल अथवा घोड़ों को वृत्तीय पथ पर उसके ऊपर बार-बार चलाया जाता था जिससे दाने अलग हो जाते थे। आजकल इस कार्य के लिये मशीनें भी आ गयीं हैं जिन्हे 'थ्रेशर' कहते हैं। 

     

     

    निष्पावन

    वह कृषि पद्धति जिसमें फसलों के दाने को भूसे से उनकी घनता के आधार पर वायु द्वारा अलग किया जाता है। उसे निष्पावन कहते हैं। अनाज से भूसा पृथक् करने के लिए निष्पावन विधि का प्रयोग किया जाता है। निष्पावन करते समय भूसे के हल्के कण पवन में उड़ कर दूर गिरते हैं जबकि भारी अन्न कण पृथक् होकर निकट एक ढेर बना लेते हैं किसी मिश्रण के अवयवों को इस प्रकार पृथक करने की विधि 'निष्पावन' कहलाती है।

     

    थ्रेशिंग की प्रक्रिया के बाद अनाज को भूसी से अलग करने के लिए इस विधि का उपयोग किया जाता है।

     

    अनाज भंडारण की आवश्यकता

    फसल कटाई के बाद बाजार में अनाज की उपलब्धता बनाए रखना दिन-प्रतिदिन की आवश्यकता है। इसके अलावा बीज के लिए अनाज को संग्रहित करना भी आवश्यक होता है। 

     

    आधुनिक किसान ने उन्नत बीज, महंगे उर्वरक तथा फसल सुरक्षा के उपायों के साथ उपज बढ़ाने की नई-नई तकनीकें अपनाकर उत्पादन बढ़ा लिया है। परंतु जब किसान की सालभर की कमाई को भंडारित किया जाता है, तब अनेक तरह के कीट और बीमारियां 10 से 15 प्रतिशत तक की क्षति पहुंचाते हैं। ऐसे में किसानों के लिए सुरक्षित भंडारण की आवश्यकता है। 

     

    अनाज भंडारण के दौरान रखे जाने वाली सावधानियाँ

     

    • अनाज भंडार के लिए पक्के भंडार गृह बनाए जाने चाहिए।
    • अनाज रखने से पहले भंडार गृहों एवं कीटों की दीवारों पर दरारों को सीमेंट से बंद कर देना चाहिए। 
    • पुराने बोरों के प्रयोग से पूर्व तेज धूप में सुखाएं या उबलते पानी में डालकर धूप में रखें और एक प्रतिशत मैलाथियान के घोल में 10 मिनट तक डुबोकर फिर धूप में रखें।
    • नए बोरे ही प्रयोग में लें।
    • अनाज ढोने के बर्तन, गाड़ी व अन्य सामान को धूप में सूखा लें।
    • भंडार से पूर्व अनाज में 10-20 प्रतिशत से अधिक नमी नहीं होनी चाहिए।
    • यदि अनाज को बोरो में भरकर रखना हो तो गोदाम के फर्श पर लकड़ी का तख्ता, खजूर की चटाई, पॉलीथिन, तिरपाल या फिर गेहूं के भूसे की परत बिछा दें। जिससे नमी बोरे तक नहीं पहुँचे।
    • अनाज के बोरों को दीवार से कम से कम आधा मीटर की दूरी पर रखें।
    • अनाज की सुरक्षा के लिए जहरीले रसायन का प्रयोग नहीं करें।
    • अनाज को गोदाम में रखने से पूर्व 1 क्विंटल अनाज में 1 किलो नीम की निंबोली का पाउडर मिलाकर रखें जिससे कीटों की क्षति कम होती है।
    • यदि अनाज को ढेरों में रखना हो तो उसमें नीम की पत्तियाँ मिला दें।
    • पहाड़ी इलाकों और छोटे किसानों तथा निजी प्रयोग के लिए घरों में जीआई शीट की चादर से बने कोठों का प्रयोग करें।
    • यदि अनाज को बीज हेतु सुरक्षित रखने के लिए अनाज पॉलीथिन शीट पर फैलाकर मैलाथियान 5 प्रतिशत चूर्ण की 250 ग्राम की मात्रा प्रति क्विंटल बीज में अच्छी तरह से मिलाकर भंडारित करें।

     

    संक्षेप में कहें तो कृषि पद्धति में फसलों की उचित कटाई और उसका भंडारण प्रबंधन अति आवश्यक है।



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