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जानिए, ग्राम पंचायत और ग्रामसभा में अंतर और इनके अधिकार

ग्रामसभा और ग्राम पंचायत क्या है, जानिए क्या है ग्रामसभा और ग्राम पंचायत में अंतर।

26 June 2020

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  • अभी तक हम लोंगों ने पिछले ब्लॉग में पढ़ा कि ग्रामसभा गाँव में वयस्क मतदातों की एक आमसभा होती है, जहाँ गाँव की मुद्दों पर चर्चा की जाती है। अब हम जानेंगे कि ग्राम पंचायत का गठन कैसे होता है। 

    ग्राम पंचायत का गठन

    ग्रामसभा के वयस्क मतदाता ही ग्राम पंचायत के सदस्यों का चुनाव करते है। यह चुनाव प्रत्येक 5 वर्ष के बाद राज्य चुनाव आयोग द्वारा आयोजित किये जाते है। जिसमें ग्राम पंचायत के सभी वयस्क मतदाता मतदान कर अपने पंसदीदा वार्ड पंच और सरपंच का चुनाव करते हैं।

     

    इस प्रकार हम देखते हैं कि ग्राम पंचायत हमारे देश की लोकतंत्र का महत्वपूर्ण इकाई है। जिसे हम लोग आज पंचायती राज अधिनियम की तहत ‘गाँव की सरकार’ कहते हैं। ग्राम पंचायत के सदस्य ग्रामसभा के उत्तरदायी होते हैं। इन्हें ग्रामसभा के आमने-सामने हो कर जवाब देना पड़ता है और ग्राम पंचायत को अधिकांश कार्यों के लिए ग्रामसभा की सहमति भी लेनी होती है।

    ग्राम पंचायत हमारे देश में चली आ रही सदियों पुरानी ‘स्वशासन’ प्रणाली का ही संस्थागत एवं विकसित रूप है। ग्राम पंचायत’ हमारे गणतंत्र की सबसे अनोखी संस्था है जो अपने आप में विधायिक भी है, कार्यपालिका भी और न्यायपालिका भी। जिसे ‘स्वशासन’ के अंतर्गत 'ग्रामसभा’ के लिए काम करना होता है। 

    ग्राम पंचायत गठन की प्रक्रिया

    जैसा कि हम सभी जानते हैं  ग्राम पंचायत का प्रमुख सरपंच होता है। सरपंच के अलावा प्रत्येक वार्ड से वार्ड पंच चुने जाते होते हैं। आजकल पंचायतों में सदस्यों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ उन्हें चुनने का तरीका बदल गया है। 

     

    वार्ड पंचों की संख्या गाँव की जनसंख्या के आधार पर निर्धारित किया जाता है। वर्तमान में लगभग पाँच सौ की आबादी पर एक वार्ड के गठन का प्रावधान है और इन्हीं वार्ड से एक पंचायत सदस्य(वार्डपंच) निर्वाचित किया जाता है। सरपंच और इसके वार्ड सदस्यों के निर्वाचन के बाद राज्य निर्वाचन आयोग  ग्राम पंचायत को गठित घोषित कर देता है। इस प्रकार सरपंच, उपसरपंच और सभी वार्ड पंचों को मिलाकर ग्राम पंचायत का गठन होता है। 

     

     

    महत्वपूर्ण बिन्दु- ग्राम पंचायत अधिकारी/पंचायत सचिव ग्राम पंचायत का सचिव होता है जो ग्राम पंचायत के सभी कार्यों का लेखा-जोखा और रिपोर्ट सरकार तक पहुँचाने का काम करता है। अब जानिए कैसे है ग्राम पंचायत ग्रामसभा से अलग

     

    ग्रामसभा और ग्राम पंचायत में अंतर

    ग्रामसभा

    ग्राम पंचायत

    ग्रामसभा पंचायती राज की मूल संस्था है। जिसमें 18 वर्ष पूरी कर चुके सभी मतदाता ग्राम सभा से सदस्य होते हैं।

    ग्राम पंचायत पंचायती राज की निर्वाचित संस्था है। जिसका निर्वाचन ग्राम सभा के सदस्यों द्वारा किया जाता है।

    ग्रामसभा में स्वयं जनता की उपस्थिति होती है।

    ग्राम पंचायत निर्वाचित प्रतिनिधियों को जनता के आमने-सामने होकर, जवाब देना होता है।

    ग्रामसभा कभी विघटित नहीं होती है। इसकी अवधि का कोई परिसीमन नहीं है, यह अखंड और स्थाई है।

    ग्राम पंचायत का कार्यकाल 5 वर्ष की अवधि के लिए होता है।

    ग्रामसभा के सदस्यों का चुनाव नहीं होता है। 18 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद ग्रामवासियों को ग्राम सभा की सदस्यता और पंचायत चुनाव में हिस्सा लेने का अधिकार दिया जाता है।

    ग्राम पंचायत को सदस्यों का चुनाव प्रत्येक 5 वर्ष के बाद किया जाता है। ग्राम पंचायत में केवल निर्वाचित सदस्य ही होते हैं।

    ग्रामसभा एक निगरानी निकाय है, जो  ग्राम पंचायत के कामों पर नज़र रखता है और मूल्यांकन करता है।

    ग्राम पंचायत ग्राम सभा का एक कार्यकारी अंग है। जो गाँव के विकास की योजनाओं को क्रियान्वयन करता है।

    ग्रामसभा के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा ग्राम विकास अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं। जो ग्राम सभा के सदस्यों के प्रति उत्तरदायी होता है।

    ग्राम पंचायत के लिए पंचायती राज विभाग द्वारा ग्राम पंचायत अधिकारी/पंचायत सचिव नियुक्त किए जाते हैं। जो ग्राम पंचायत के प्रति जवाबदेह होता है।

    ग्राम पंचायत का कार्य

    ग्राम पंचायतों का कार्य ग्रामसभा के कार्य से अलग होता है क्योंकि पंचायतों को गाँव का विकास कराने के लिए सरकार द्वारा वित्तीय सहायता और कई प्रकार के अनुदान दिए जाते हैं। पंचायती राज अधिनियम-1992 के तहत पंचायतों को 29 कार्य सौपें गए हैं। जिसे संविधान के अनुच्छेद 243 (छ) में अंकित किया गया है।

     

    पंचायतों को सौपें गए 29 कार्यों में से वार्षिक बजट बनाना ग्राम पंचायत का  एक प्रमुख काम है। जबकि  वार्षिक बजट पर विचार-विमर्श कर सिफारिश करना ग्रामसभा की जिम्मेदारी है। 

    ग्राम पंचायत के प्रमुख कार्य निम्नलिखित है

    •   गाँव के सड़को को  पक्का करना, उनका रख-रखाव करना और गंदे पानी की नालियों की व्यवस्था करना
    •   घरेलू उपयोग के लिए पानी और पशुओं के पीने के पानी की व्यवस्था करना और तालाबों का रख-रखाव करना
    •   सिचाई के साधन की व्यवस्था करने में ग्रामीणों की मदद करना
    •   गाँव में मेले, दंगल, कबड्डी, व बाजार के लिए सार्वजनिक जगहों की व्यवस्था करना
    •  पशु पालन व्यवसाय को बढ़ावा देना, दूध बिक्री केंद्र की व्यवस्था करना और पशुओं को बीमारी से बचाव के उपाय करना व फैलने वाली बीमारी से बचाना
    •  गाँव के सार्वजनिक जगहों जैसे- ग्राम-चौपाल, गली व अन्य सार्वजनिक स्थानों पर प्रकाश का प्रबंध करना
    •  दाह-संस्कार और कब्रिस्तान का रख-रखाव करना
    •  गाँव में सार्वजनिक पुस्तकालय की स्थापना करना
    •  प्राथमिक शिक्षा को बढ़ावा देना और जरुरी हो तो उच्च स्तर के स्कूल की स्थापना के लिए जरुरी कार्यवाही करना
    •  बच्चों और युवाओं के लिए खेल के मैदान का इंतजाम करना व खेल कूद से सम्बंधित सामान की व्यवस्था करना
    •  गाँव में सार्वजनिक शौचालय बनवाना व शौचालय बनाने के लिए ग्रामीणों को प्रोत्साहित करना
    •  जन्म-मृत्यु, विवाह आदि का रिकॉर्ड रखना
    •  गाँव की भलाई के लिए सरकार से अनुदान और गरीबों के मदद के रास्ते तलाशना
    • आँगनवाड़ी केंद्र को सुचारू रूप से चलाने में मदद करना
    • गरीबों के लिए ग्राम पंचायत की जमीन को पट्टे पर देना

    ग्राम सभा और ग्राम पंचायत में संबंध

    ग्रामसभा और ग्राम पंचायत में तमाम अंतर होने के बावजूद पंचायती राज प्रणाली में ग्रामसभा और ग्राम पंचायत में अटूट संबंध हैं। दोनों संस्थाएं एक सिक्के के दो पहलू की तरह काम करती है।  जहाँ एक ओर ग्रामसभा निगरानी की भूमिका में होती है तो वहीं दूसरी ओर ग्राम पंचायत कार्यपालिका की भूमिका में होती है।

     

    अतः ग्राम पंचायत की सफलता के लिए आवश्यक है कि पंचायतें ग्रामसभा के साथ मिलकर काम करें। ग्रामवासियों की भी जिम्मेदारी है कि ग्रामसभा की सभी बैठकों में सक्रिय रूप से हिस्सा लें और अपनी बातों और मुद्दों को रखें। पंचायत के निर्वाचित प्रतिनिधि के माध्यम से उनके कामों पर नजर रखें और गाँव में आने वाली सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में सहायता कर उसको ठीक ढंग से लागू करवाएं।

     

    उपरोक्त से स्पष्ट है,आपके गाँव में ग्रामसभा की निगरानी समितियाँ जितनी सक्रिय होंगी उतनी ही अधिक और अच्छी तरह से ग्राम पंचायत के कार्य कलापों पर नजर रखी जा सकेगी।

     

    संक्षेप में कहें तो  ग्रामसभा और ग्राम पंचायत दोनों गाँव के विकास के रीढ़ है। ग्राम पंचायतें ही मूलरूप से प्रजातांत्रिक स्वरूप की परिचायक हैं। अतः दोनों में परस्पर समन्वय और सहयोग अति आवश्यक है।



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