जानिए, क्या है ग्राम सभा और इसके अधिकार

जानिए, क्या है ग्राम सभा और इसके अधिकार

ग्राम विकास के लिए ग्राम पंचायत का ही नहीं अपितु ग्रामसभा का भी सहयोग जरूरी है। जानें ग्राम सभा की जिम्मेदारियाँ और उसके योगदान।

26 June 2020

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  • ग्रामसभा पंचायती राज की सबसे छोटी और कभी नहीं विघटित होने वाली संस्था है। गाँव में रहने वाले सभी मतदाता इसके सदस्य होते हैं। 

     

    दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ग्रामसभा पूर्ण रूप से वयस्क लोगों की एक आम सभा होती है। जिसमें सभी वयस्क मतदाता जिनकी आयु 18 वर्ष पूर्ण हो चुकी है, बैठक में प्रतिभाग कर सकते हैं। 

     

    भारत देश में ग्राम स्तर से लेकर केंद्र स्तर पर ग्रामसभा, विधानसभा, लोकसभा और राज्य सभा आयोजित की जाती है। परन्तु इन चारों सभाओं में केवल ग्रामसभा ही एक मूल सभा है। ‘ग्रामसभा’  राज्यसभा की तरह कभी विघटित नहीं होने वाली सभा है। इस सभा की अवधि का भी कोई परिसीमन नहीं है। यह सदैव अस्तित्व में बनी रहती है। 

     

    राज्य सभा, लोकसभा और विधान सभा के सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित किए जाते हैं। जबकि ग्राम पंचायत के सभी मतदाता 18 वर्ष की आयु पूर्ण करते ही ग्रामसभा के सदस्य हो जाते हैं। 

     

    गाँधीजी ने ‘ग्राम स्वराज’ की संकल्पना करते हुए कहा था-

    सच्चा लोकतंत्र वही है जो निचले स्तर पर लोगों की भागीदारी पर आधारित हो। यह तभी संभव है जब ग्रामवासियों को भी शासन में फैसला करने का अधिकार मिले। गाँव के सभी विकास कार्यों में ग्रामवासियों का हिस्सा लेना उनका कर्तव्य है, यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो एक तरह से स्वशासन प्रणाली की नींव को कमजोर करते हैं।

    आजादी के बाद स्थानीय स्वशासन को साकार करने का श्रेय देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू को जाता है। उन्होंने पंचायती राज व्यवस्था का उद्घाटन 2 अक्टूबर 1959 को नागौर जिले के बगदरी गाँव से की थी।

     

     पं. नेहरू ने इस अवसर पर कहा था कि गाँवों के लोगों को अधिकार दो, उनको काम करने दो, चाहें वे हजारों गलतियाँ करें। इससे घबराने की जरूरत नहीं है, पंचायतों को अधिकार दें।

     

    ग्रामसभा की बैठक

     

    ग्रामसभा की बैठक आयोजित कराने की जिम्मेदारी सरपंच को दी गई है, परन्तु ग्रामसभा के सदस्यों की मांग पर विशेष बैठक भी बुलाई जा सकती है। किसी-किसी राज्यों में ग्रामसभा की बैठक वर्ष में कम-से-कम 4 बार बुलाए जाने का प्रावधान है। जिसके लिए 26 जनवरी, 1 मई, 15 अगस्त या 2 अक्टूबर की तिथि निर्धारित की गई है। परन्तु यह बैठक देशभर में अलग-अलग राज्यों के लिए अलग-अलग भी हो सकती है।

     

    किन्हीं-किन्हीं राज्यों में यह बैठक वर्ष में दो बार बुलाए जाने का प्रावधान है। जिसमें एक बैठक ख़रीफ़ की फसल कटने के बाद तथा दूसरी रबी की फसल काटने के बाद कराया जा सकता है। पंचायत अधिनियम के अनुसार ग्रामसभा के आयोजन को टाला नहीं जा सकता है। बिहार, असम, मध्य प्रदेश में चार बार ग्रामसभा आयोजित करने का प्रावधान है। जबकि  गुजरात एवं महाराष्ट्र में वर्ष में दो बार ग्रामसभा करने का प्रावधान है। 

     

    ग्रामसभा के बैठक की सूचना

     

    ग्रामसभा की बैठक के बारे में ग्रामवासियों को इसकी सूचना एक सप्ताह या 15 दिन पहले दी जानी चाहिए। यह सूचना डुगडुगी बजाकर या लाउडस्पीकर के माध्यम से पूरे गाँव में प्रसारित की जा सकती  है। इसके अलावा ग्राम पंचायत कार्यालय में सूचना चिपकाकर और अन्य आधुनिक प्रचार साधनों से भी दी जा सकती है। सूचना में ग्रामसभा की तिथि, समय, बैठक का स्थान और एजेंडे का उल्लेख अनिवार्य है। 

     

    बैठक की कोरमपूर्ति

     

    आप लोगों के मन में यह सवाल होगा कि बैठक की कोरमपूर्ति क्या है? तो बता दें, किसी बैठक की कोरमपूर्ति का आशय सभा या संसद की बैठक में हिस्सा लेने वाले न्यूनतम आवश्यक सदस्यों की संख्या से है। जिसके बिना सभा या संसद के कार्य को वैधानिक मान्यता प्राप्त नहीं होती। अत: बैठक की कोरमपूर्ति के लिए इस न्यूनतम संख्या में सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य है। 

     

    यह न्यूनतम संख्या प्रत्येक सभा के लिए भिन्न-भिन्न हो सकती है।  ग्रामसभा की बैठक में यह संख्या कुल सदस्यों का बीसवाँ हिस्सा होता है। इसके अभाव में बैठक स्थगित हो जाती है। लेकिन पंचायती राज व्यवस्था में 15 दिन के भीतर कुल सदस्यों के चालीसवें भाग से कोरमपूर्ति कर पुनः बैठक आयोजित किए जाने का प्रावधान है।

     

    बैठक का स्थान

     

    ग्रामसभा की बैठकें साधारणतः ग्राम पंचायत के कार्यालय में ही करने का प्रावधान है। यदि ग्राम पंचायत में पंचायत भवन उपलब्ध नहीं है या बंद है तो बैठक की व्यवस्था सार्वजनिक स्थान पर की जा सकती है।

     

    ग्रामसभा की अध्यक्षता

     

    ग्रामसभा की बैठक की अध्यक्षता सरपंच करता है। सरपंच की अनुपस्थिति में बैठक की अध्यक्षता उप सरपंच करता है। बैठक का संचालन सरकार द्वारा नियुक्त ग्राम विकास अधिकारी या पंचायत सचिव द्वारा किया जाता है।

     

    कार्यवाही

     

    ग्रामसभा की बैठक में ग्राम पंचायत के विभिन्न मुद्दों और समस्याओं पर चर्चा की जाती है। बैठक में सभी को अपने विचार और मतदान करने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है। यदि किसी विषय पर आम सहमति नहीं बनती तो उस विषय पर मतदान कराया जा सकता है।

     

    अतः ग्रामसभा की बैठको में सभी ग्रामवासियों को हमेशा भागीदारी करनी चाहिए। इससे सभी लोगों को अपने मुद्दों को कहने का मौका मिलता है। सरपंच को भी इन बैठकों में लोगों की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करने का उपाय करना चाहिए। विशेषकर अनुसूचित, अनुसूचित जनजाति, अति पिछड़े वर्ग के लोगों और महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित हो। जिससे सभी वर्गों को अपनी बात रखने का मौका मिल सकेगा। सरपंच द्वारा उन्हें अपनी शिकायतों को कहने और सुझाव देने के लिए भी प्रोत्साहित करना चाहिए। जिससे हर वर्ग के लोगों का सर्वांगीण विकास हो सके।

     

    ग्राम सभा की बैठक के दौरान सदस्यों द्वारा निम्नलिखित बातों पर चर्चा की जा सकती है।

    •   ग्राम पंचायत की वार्षिक लेखा-जोखा विवरण के बारे में।
    •   पिछले वित्तीय वर्ष की प्रशासन रिपोर्ट पर।
    •   ऑडिट रिपोर्ट पर।
    •   अगले वित्तीय वर्ष के लिए बजट पर।
    •   पिछले वर्ष के विकास योजनाओं और कार्यक्रमों के बारे में।
    •   वर्तमान वित्तीय वर्ष में शुरू किए जाने वाले विकास योजनाओं और कार्यक्रमों के बारे में।
    •   निगरानी समिति की रिपोर्ट पर।

     

    योजनाओं पर ही नहीं, मुद्दों पर भी करें ग्रामसभा में चर्चा

     

    ग्रामसभा की बैठक में सरकारी योजनाओं के अलावा गाँव की सामाजिक समस्याओं पर भी ध्यान रखा जाना चाहिए। गाँव में ऐसे कई सामाजिक बुराईयाँ होती है जिससे सभी ग्रामवासियों के जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ता है। गाँव की समस्याओं का निपटारा करने के लिए ग्रामसभा की बैठक का महत्वपूर्ण स्थान है जहाँ प्रत्येक ग्रामवासी विभिन्न विषयों पर खुलकर चर्चा कर सकते हैं। लोगों को जागरूक किया जा सकता है और जीवन में बदलाव लाया जा सकता है। जैसे-

     

    शिक्षा

    ग्रामीण भारत में शिक्षा की स्थिति बेहतर नहीं है जिसकी वजह से गाँवों का विकास नहीं  हो  पा रहा है। अच्छी शिक्षा ना मिल पाने के कारण जन जागरूकता में कमी देखी जाती है। ग्रामीणों को गाँव में अच्छी शिक्षा के लिए ग्रामसभा में विचार-विमर्श जरूर करना चाहिए।

     

    महिला उत्पीड़न

    भारत में देखा गया है कि महिला उत्पीड़न की सबसे ज्यादा मामले गाँवों से होते हैं। शिक्षा की कमी के कारण बेटा और बेटियों में भेदभाव किया जाता है। अतः ग्रामसभा के माध्यम से महिलाओं को भी बराबरी का अधिकार देने के लिए  बात करनी चाहिए जिससे महिला सशक्तिकरण में बल मिलेगा।

     

    अंधविश्वास व सामाजिक कुरीतियाँ

    अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिए ग्रामसभा एक बेहतर स्थान है। जिसमें गाँव की सामाजिक कुरीतियों को दूर किया जा सकता है। ग्रामीणों को शराबबंदी, जुआ, भूत-प्रेत जैसी बुराईयों पर ग्रामसभा में विचार करना चाहिए।

     

    स्वास्थ्य परिचर्चा तथा शुद्ध पेयजल

     ग्रामसभा बैठक में स्वास्थ्य सुविधाओं और शुद्ध पेयजल की व्यवस्था पर परिचर्चा करनी चाहिए। बच्चों में कुपोषण, गर्भवती महिलाओं का टीकाकरण आदि पर परिचर्चा ग्रामसभा में करें, जिससे गाँव में लोग स्वस्थ्य रहें।  जिससे  स्वास्थ्य के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़े।

     

    ग्रामसभा के कार्य

     

    ग्रामसभा में सदस्यों की भूमिका निगरानी प्रवृत्ति की होती है जिसमें सभी सदस्य ग्राम पंचायतों के कामों की निगरानी और विकास कार्यों में सहयोग करते हैं। ग्रामसभा में सदस्यों के निम्नलिखित कार्य होते हैं। जैसे-

    •   ग्रामीण विकास कार्यों में सहायता करना।
    •   विकास संबंधित कार्यों की योजना बनाना और उसे पारित कराना।
    •   कल्याण और विकास योजनाओं व कार्यक्रमों के लिए लाभार्थियों की पहचान कर उनके चयन के लिए ग्राम पंचायत को भेजना।
    •   ग्राम पंचायत क्षेत्र में श्रमदान करके विकास योजनाओं को गति प्रदान करना।
    •   ग्राम पंचायत के सदस्यों से उसके कार्यों, कल्याणकारी योजनाओं, आमदनी और खर्चों के बारे में जानकारी लेना
    •   निगरानी समिति बनाना, उसकी रिपोर्ट पर विचार-विमर्श करना और उसके लिए सिफ़ारिश करना
    •   जन शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण कार्यक्रमों में सभी तरह के सहयोग देना।

     

    ग्रामसभा की भूमिका

     

    ग्रामसभा की बैठक में सदस्यों की सक्रिय भागीदारी ही पंचायत राज व्यवस्था को सुदृढ़ एवं ग्रामीण विकास को गति प्रदान कर सकती है। इसलिए ग्रामसभा के सभी सदस्यों को बैठक में हिस्सा लेना केवल उनका अधिकार ही नहीं परन्तु उनका परम कर्त्तव्य भी है।

     

    पंचायती राज व्यवस्था का आधार स्तंभ होने के नाते ग्रामसभा को सशक्त, सक्रिय एवं सामूहिक उत्तरदायित्व की कारगर संस्था के रूप में बदलाव करना बेहद जरूरी है. ग्रामसभा को सलाहकारी निकाय के ऊपर उठकर यथार्थ तौर पर शक्तिशाली बनाने हेतु कागजी कार्यवाही की व्यवस्था पर रोक लगाकर कानून के जरिए ग्रामसभा को सशक्त एवं उपयोगी बनाना होगा। गाँव से संबंधित विभिन्न विकास योजनाओं व आगामी वित्तवर्ष की बजट स्वीकृति का अधिकार वास्तविक रूप से ग्रामसभा के हाथों में होना चाहिए।

     

    ग्रामीण भारत में विभिन्न समस्याओं जैसे- दहेज-प्रथा, नशाखोरी, बाल विवाह, सफाई व स्वच्छता के अभाव आदि के समाधान में भी ग्रामसभा महत्वपूर्ण योगदान देकर गाँवों की सूरत बदल सकती है और ‘ग्राम स्वराज’ के स्वप्न को साकार रूप प्रदान कर सकती है।



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