त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था, भाग-1(ग्राम पंचायत)

त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था, भाग-1(ग्राम पंचायत)

ग्राम पंचायत त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था की पहली इकाई मानी गई है। ग्रामसभा के सदस्य ही ग्राम पंचायत का गठन करते हैं। जिसका मुखिया सरपंच होता है।

26 June 2020

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  • अभी तक आपने हमारे ब्लॉग पंचायती राज अधिनियम-1992 में वर्तमान पंचायती राज व्यवस्था के बारे में विस्तृत रूप से पढ़ा, कि किस प्रकार इस अधिनियम के द्वारा स्थानीय स्वशासन व विकास की इकाईयों को एक पहचान मिली। 

     

    अब हम जानेंगे कि भारत में तीनों स्तरों पर पंचायत की संरचना क्या है? और किस प्रकार से भारत में संचालित हो रहा है? 

     

    जैसा कि हम सभी जानते हैं ग्राम पंचायत, ग्राम विकास की पहली इकाई है। ग्रामसभा के सदस्य ही ग्राम पंचायत का गठन करते हैं। जिसका मुखिया सरपंच होता है। यदि देखा जाए तो भारत में शासन व्यवस्था की स्थापना केंद्र के बाद राज्यों से होकर जिला और इसके बाद सबसे निचले स्तर पर ग्राम पंचायत तक होती है। यही कारण है कि सन् 1992 के बाद शासन में निचले स्तर पर भी ज्यादा से ज्यादा लोगों की भागीदारी और अधिकार प्रदान करने के लिए कानून बनाया गया।

     

    पंचायती राज अधिनियम-1992 में पंचायतों को भी विकेंद्रीकरण कर इसे ग्राम, ब्लॉक और जिला स्तर पर अधिकार दिए गए जिससे ग्रामीण भारत का विकास तीनों स्तरों पर हो सके।

     

    पंचायती राज व्यवस्था में सबसे निचले स्तर पर ग्राम पंचायत होती है। जिसका चुनाव गाँव के वयस्क मतदातों (ग्रामसभा) द्वारा किया जाता है। सबसे दिलचस्प है कि पंचायती राज संस्था एक स्वायत्त निकाय है। यह एक स्वशासन की संस्था है जो अपने आप में विधायिका भी है, कार्यपालिका भी है और न्यायपालिका भी।

     

    यहाँ ग्राम पंचायत अपने आप में गाँव की सरकार है जिसे ग्राम स्वराज के लिए काम करना होता है। जिसके लिए ग्राम पंचायत स्तर पर ग्रामसभा के साथ-साथ ग्राम-कचहरी का प्रावधान है। 

     

    आपको बता दें, ग्राम पंचायत सदियों पुरानी चली आ रही पंचायत व्यवस्था का संस्थागत एवं विकसित रूप है। वर्तमान में केवल सदस्यों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ उन्हें चुनने का तरीका बदल गया है।

    अब पंचायत सदस्यों को लोकतांत्रिक ढंग से प्रत्यक्ष रूप चुना जाता है। इन्हीं सब कारणों से ग्राम पंचायत त्रिस्तरीय पंचायत राज की सबसे महत्वपूर्ण संस्था है। इसके सदस्य सीधे जनता के प्रति जबावदेह है न कि प्रशासन या शासन के प्रति। इसलिए ग्राम पंचायतों को सशक्त, जागरुक एवं सक्रिय होना पंचायती राज की पहली आवश्यकता है।

    कैसे होता है ग्राम पंचायत का गठन

    ग्राम पंचायत के सदस्य अर्थात् सरपंच, वार्डपंच गाँव के मतदाताओं द्वारा बहुमत के आधार पर चुने जाते हैं। एक गाँव में प्रायः पाँच सौ की आबादी पर एक वार्ड का गठन होता है और प्रत्येक वार्ड से एक वार्डपंच चुने जाते हैं। इसके अलावा चुने हुए वार्ड पंचों से एक उपसरपंच का चुनाव होता है जो सरपंच के सहायक के रुप में या उसके अनुपस्थिति में ग्राम पंचायत का काम करता है।  इस प्रकार सरपंच, उपसरपंच और सभी वार्ड सदस्यों को मिलाकर एक ग्राम पंचायत का गठन होता है।

     

    पंचायती राज-व्यवस्था के नियमों के अनुसार किसी ग्राम पंचायत के सदस्यों की संख्या उस ग्राम पंचायत की आबादी पर निर्भर होगी।

    जैसे-

    •  500 तक की जनसंख्या पर                  – 05 सदस्य/वार्डपंच
    •  501 से 1000 तक की जनसंख्या पर      – 07 सदस्य/वार्डपंच
    •  1001 से 2000 तक की जनसंख्या पर    – 09 सदस्य/वार्डपंच
    •  2001 से 3000 तक की जनसंख्या पर    – 11 सदस्य/वार्डपंच 
    •  3001 से 5000 तक की जनसंख्या पर    – 13 सदस्य/वार्डपंच
    •  5000 से अधिक की जनसंख्या पर         – 15 सदस्य/वार्डपंच

    सरपंच और वार्ड पंचों के चुनाव के बाद राज्य निर्वाचन आयोग ग्राम पंचायत को नवगठित घोषित कर देती  है।

    ग्राम पंचायत चुनाव प्रणाली

    जैसा कि आपको पता है ग्राम पंचायत के सदस्यों और सरपंच का चुनाव गाँव के ही मतदाताओं द्वारा 5 वर्ष के लिए किया जाता है अर्थात् प्रत्येक 5 वर्ष बाद राज्य चुनाव आयोग पंचायत चुनाव आयोजित करती है। 

     

    अतः यहाँ यह भी जिक्र करना आवश्यक है कि यदि पंचायत के सामान्य चुनाव में सरपंच का चुनाव नहीं हो पाता है और पंचायत के लिए दो-तिहाई से कम सदस्य ही चुने जाते हैं। तो इस दशा में सरकार एक प्रशासनिक समिति बनाकर ग्राम पंचायतों के कार्यों को संचालित करती है। इसके लिए राज्य निर्वाचन आयोग एक प्रशासक भी नियुक्त कर सकता है। लेकिन प्रशासनिक समिति व प्रशासक का कार्यकाल 6 माह से अधिक नहीं होता है। इस अवधि के दौरान ग्राम पंचायत, उसकी समितियों तथा सरपंच के सभी अधिकार इसमें निहित होते हैं। आपको बता दें कि लोकसभा, विधानसभा की तरह ही ग्राम पंचायतों के विघटन बाद इसका चुनाव भी 6 माह के भीतर कराने का प्रावधान है।  

    ग्राम पंचायत में आरक्षण

    किसी भी ग्राम पंचायत में आरक्षण का प्रावधान पंचायती राज अधिनियम-1992 के नियमानुसार की जाती है। आपको बता दें, चुनाव आयोग निर्वाचन नवीनतम जनगणना आंकड़ो के आधार पर सामान्य वर्ग, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या के अनुपात में उस निर्वाचन क्षेत्र में उनकी सीट आरक्षित करती है। 

    महिलाओं के लिए आरक्षण

    कमजोर वर्गों की भाँति महिलाओं को भी स्थानीय शासन में कुछ भी बोलने का अधिकार नहीं था। 73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम के तहत महिलाओं को उचित स्थान दिया गया। पंचायतों में सभी सीटों पर महिलाओं के लिए (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं सहित) एक तिहाई स्थान आरक्षित किए गए।यह आरक्षण व्यवस्था प्रत्येक पाँच वर्ष बाद चक्रानुक्रम/रोस्टर के अनुसार आवंटित किए जाते हैं।

    पंचायतों का कार्यकाल

    ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। जिसकी गणना ग्राम पंचायत की पहली बैठक से की जाती है। यदि पंचायत को उसके कार्यकाल से पहले भंग किया जाता है तो 6 माह के अंदर पुन: चुनाव कराया जाता है। परन्तु इस नवनिर्वाचित पंचायत का कार्यकाल केवल शेष बचे हुए समय के लिए ही होता है। 

    ग्राम पंचायत के कार्य एवं शक्तियाँ

    पंचायतों को संविधान की 11वीं अनुसूची में 29 विषयों पर निर्णय लेकर कार्य करने की शक्तियाँ प्रदान की गई हैं। जो पहले राज्य सूची में थे। इससे पहले तक पंचायतों को कार्य-योजना बनाने का कोई अधिकार नहीं था।

    जिसका विवरण निम्न है-

    •  इस सूची में शामिल विषयों के अन्तर्गत आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय और विकास योजनाओं को अमल में लाने का दायित्व पंचायतों का होगा।
    •  संविधान की 11वीं अनुसूची के अन्तर्गत ग्राम पंचायतों की कुछ जिम्मेदारियां सुनिश्चित की गई है।
    •  प्रत्येक ग्राम पंचायत अपने कार्यों का संपादन निष्ठापूर्वक करेगी।

    ग्राम पंचायत के कार्य

    •  पंचायत क्षेत्र के विकास के लिए वार्षिक योजना बनाना।
    •  वार्षिक बजट बनाना।
    •  प्राकृतिक संकट में सहायता कार्य करना।
    •  लोक संपत्ति से अतिक्रमण हटाना।
    •  गाँवों के आवश्यक आँकड़ों को तैयार करना।

    सरपंच के कार्य

    •  ग्रामसभा की बैठक बुलाना और उसकी अध्यक्षता करना।
    •  ग्रामीणों की अपेक्षाओं को जिला परिषद्, पंचायत समिति व जिला प्रशासन से लेकर राज्य सरकार तक पहुंचाना व ग्राम पंचायत की सार्वजनिक सम्पत्ति का सदुपयोग करवाना।
    •  हर महीने ग्राम पंचायत की बैठक पंचायत कार्यालय पर बुलाना व पिछली बैठक में लिए गए निर्णयों पर की गई कार्यवाही की रिपोर्ट पढ़कर सबके सामने रखना।

    ग्राम सचिव के कार्य

    •  प्रत्येक ग्राम पंचायत में सरकार द्वारा नियुक्त एक ग्राम सचिव होता है। जो ग्राम पंचायत तथा सरकार के बीच एक कड़ी के रूप मे कार्य करता है।.
    •  ग्राम पंचायत द्वारा पारित प्रस्तावों का रिकार्ड रखना और क्रियान्वयन में सहायता करना इत्यादि। 
    •  ग्राम पंचायत की कार्यवाही को विवरण पुस्तिका में दर्ज करना।

    ग्राम पंचायत विकास योजना में नागरिकों की जरूरतों और उनकी प्राथमिकताओं का उपलब्ध संसाधनों के साथ मेल खाना जरूरी है। यह योजना  ग्राम पंचायतों को पारदर्शी और भागीदारी प्रक्रिया से सभी ग्रामवासियों को शामिल करके बनानी चाहिए। ग्राम पंचायत की जिम्मेदारी है कि वह स्थानीय नागरिकों, गरीबों और हाशिए के लोगों के लिए सही योजना  बनाकर बुनियादी सेवाएं दिलवाए।

    ग्रामसभा की बैठक, विशेष बैठक और कोरमपूर्ति

    •  ग्राम सभा की सामान्य बैठकें साल में चार बार सरपंच द्वारा बुलाई जाती है। ग्रामसभा की विशेष बैठकें सरपंच अपनी मर्जी से,पंचायत समिति या 1/10 ग्रामसभा सदस्यों द्वारा लिखित में दिए जाने पर बुलायी जा सकती है।
    •  ग्रामसभा की बैठक में सभी पंचों, ग्राम सचिव, खण्ड विकास व पंचायत अधिकारी, शिक्षा अधिकारी इत्यादि का भाग लेना जरूरी है।
    •  ग्राम सचिव ग्रामसभा की कार्यवाही को लिखेगा। बैठक की कार्यवाही लिखने के पश्चात सरपंच, पंच तथा उपस्थित सभी लोगों के हस्ताक्षर करवाए जाएंगें या अंगूठे के निशान लगवाए जाएंगें।
    •  ग्राम पंचायत विकास योजना गांव के विकास और बुनियादी सेवाओं के लिए एक वर्ष की योजना है, जिसे सरपंच, पंच और ग्रामीण मिलकर बनाते हैं।

    महत्व

    ग्रामसभा के सदस्य ग्राम पंचायत के माध्यम से अपने गाँव की सरकार चलाते हैं। ग्राम पंचायत में जो भी आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय की स्कीमें बनाई जाती हैं, उन स्कीमों व उनके बजट को ग्राम सभा की बैठक में चर्चा करके ही मंजूरी मिलती है। जिसका पंचायती राज अधिनियम में विस्तृत उल्लेख है कि ग्रामसभा, ग्राम पंचायतो को पारदर्शी ढंग से अपनी जिम्मेदारियां निभाने व लोगों के प्रति जवाबदेह बनाने में सहयोग करेगी। अतः ग्रामसभा को सुदृढ़ करना सभी ग्रामवासियों के लिए बहुत जरूरी है ताकि लोगों की भागीदारी से गाँव का बेहतर विकास हो सके।

     

    अगले ब्लॉग में हम त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था,भाग-2(पंचायत समिति) पंचायत राज की मध्यस्तरीय संस्था पंचायत समिति के बारे में चर्चा करेंगे।



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