तलाक (Divorce) से संबंधित कानून और अधिकारों को जानें

तलाक (Divorce) से संबंधित कानून और अधिकारों को जानें

अपने अधिकारों से महिलाएं अक्सर अनजान रहती हैं और पारिवारिक कलह की स्थिति में अपना जीवन बर्बाद कर लेती हैं। इस ब्लॉग में जानें तलाक से जुड़े कानून और अधिकार।

20 January 2021

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  • भारत में कोर्ट कचहरी से जुड़ी बातों पर ही लोग अक्सर घबराने लगते हैं और तलाक जैसे मुद्दों पर तो ज़्यादा खुलकर बात भी नहीं की जाती। हमारे समाज के सभी धर्मों में शादी को एक पवित्र रिश्ता समझा जाता है इसलिए किसी की शादी का टूट जाना अच्छा नहीं माना जाता। हालांकि कई बार पति-पत्नी के रिश्ते इस कदर बिगड़ जाते हैं कि तलाक लेना ही सही फैसला होता है। देखा जाता है कि तलाक या फिर पारिवारिक लड़ाई की स्थिति में महिलाएं ही ज़्यादातर नुकसान झेलती हैं। कई बार महिलाएं ससुराल में ही अत्याचार सहती रहती हैं तो कई बार बिना तलाक अलग रहने लगती हैं। वहीं, तलाक होने पर कई जानकारियों के अभाव में वे अपने अधिकारों का सही इस्तेमाल नहीं कर पाती हैं। इस ब्लॉग में हम तलाक के जुड़े सभी कानूनों और अधिकारों पर चर्चा करेंगे।

     

    क्या है तलाक (Divorce)?

     

    पति-पत्नी के कानूनी और सामाजिक तौर पर अलग हो जाने की प्रक्रिया को तलाक कहा जाता है। 

     

    भारत में तलाक के लिए अलग-अलग कानून हैं (Divorce law in India)

     

    हमारे देश में तलाक विभिन्न धर्मों से संबंधित मैरिज एक्ट्स में लिखित धाराओं पर निर्भर करता है। सभी धर्मों में अलग-अलग कानूनों के हिसाब से तलाक की प्रक्रिया अपनाई जाती है। हिंदू, सिख, बौध व जैन धर्मों के लिए हिंदू मैरिज एक्ट 1955 लागू होता है। वहीं, मुस्लिम, पारसी और इसाई धर्मों के लिए अलग कानूनों का प्रावधान है। अंतर-जाति और अंतर-धार्मिक शादियों के लिए विशेष विवाह अधिनियम, 1954 है। इसलिए यहां हम आसान भाषा में तलाक के उन नियमों पर बात करेंगे जो सभी धर्मों के लोगों पर समान रूप से लागू हो सकते हैं।

     

    कब पड़ती है तलाक की ज़रूरत:- इन परिस्थितियों में कर सकते हैं तलाक के लिए आवेदन

     

    1- आपसी सहमति से तलाक

     

    शादी टूट जाने की स्थिति में आपसी सहमति से तलाक सबसे सही तरीका है क्योंकि पति-पत्नी इसमें बिना सार्वजनिक विवाद के एक दूसरे से सम्मानजनक तरीके से अलग हो सकते हैं। यदि पति और पत्नी आपसी सहमति से अलग होना चाहते हैं तो इसके लिए जरूरी है कि वे एक दूसरे से 1 साल तक अलग रह रहे हों। इसके बाद वे कोर्ट में आपसी सहमति से तलाक की अर्जी दे सकते हैं। हालांकि इसमें भी अदालत द्वारा एक बार दंपति में सुलह समझौते की कोशिश की जाती है।

     

    तलाक के वो कानून जिनकी जानकारी है ज़रूरी


     

    2- विवाद की स्थिति

     

    ये स्थिति तब पैदा होती है जब एक पक्ष तलाक की मांग करता है और दूसरा पक्ष शादी को बनाए रखना चाहता है। ऐसी स्थिति में कोर्ट में केस लड़ा जाता है। बिना आधार के कोर्ट में तलाक की मांग नहीं की जा सकती। विवाद की स्थिति में इन आधारों पर तलाक की अर्जी दी जा सकती है-

     

    उत्पीड़न- एक पक्ष द्वारा मानसिक या शारीरिक उत्पीड़न किए जाने की स्थिति में दूसरा पक्ष अदालत में तलाक की अर्जी दे सकता है। दहेज उत्पीड़न के मामलों में कई बार तलाक की मांग की जाती है।

     

    व्याभिचार- यदि पति किसी दूसरी स्त्री के साथ शारीरिक संबंध बनाता है तो पत्नी कोर्ट में तलाक के लिए केस दर्ज करवा सकती है। हालांकि पत्नी द्वारा शादी के बाहर संबंध बनाने पर पति ,पत्नी पर व्याभिचार का मामला दर्ज नहीं करवा सकता। 

     

    मानसिक बीमारी- यदि एक पक्ष मानसिक तौर पर बीमार है और सामान्य वैवाहिक जीवन जीने के काबिल नहीं है तो ऐसी स्थिति में दूसरा पक्ष तलाक की मांग कर सकता है।

     

    संक्रामक रोग- यदि पति या पत्नी में से कोई किसी फैलने वाली गंभीर बीमारी से पीड़ित है जैसे- एड्स, कुष्ठ रोग आदि। ऐसी स्थिति में भी दूसरे पक्ष द्वारा तलाक की मांग की जा सकती है।

     

    धर्म परिवर्तन- यदि शादी के बाद पति या पत्नी अपना धर्म बदल ले और दूसरा पक्ष इसमें सहज नहीं है तो वो तलाक के लिए केस फाइल कर सकता है।

     

    परित्याग करने पर- यदि पति या पत्नी 2 साल से ज़्यादा  समय से साथ न रह रहे हों तो ऐसी स्थिति में दूसरे पक्ष द्वारा तलाक की मांग की जा सकती है।

     

    लापता होने की स्थिति में- यदि पति या पत्नी में से कोई 7 साल से ज़्यादा समय से लापता हो तो ऐसी स्थिति में उसे मृत माना जाएगा और दूसरा पक्ष कानूनन तलाक की अर्जी दे सकता है।

     

    बलात्कार या अप्राकृतिक यौन संबंध- यदि पति द्वारा पत्नी के साथ जबरन संबंध या अप्राकृतिक यौन संबंध बनाए जाते हैं तो इस स्थिति में भी पत्नी द्वारा कोर्ट में केस किया जा सकता है।

     

    तलाक लेने की प्रक्रिया

     

    • तलाक के लिए फैमिली कोर्ट या जिला कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की जाती है। 
    • कोर्ट द्वारा 6 महीने का समय सुलह के लिए दिया जाता है।
    • इसके बाद सुनवाई शुरू होती है और दोनों पक्षों के बयान दर्ज किए जाते हैं।
    • विवाद की स्थिति में गवाहों और सबूतों की मदद ली जाती है।
    • आखिरी चरण में कोर्ट अपना फैसला सुनाता है और तलाक होने पर पति-पत्नी कानूनी तौर पर अलग हो जाते हैं।

     

    तलाक के बाद का जीवन

    तलाक के बाद का जीवन निश्चित तौर पर दोनों पक्षों के लिए मुश्किल होता है। लेकिन भारतीय समाज में महिलाओं के लिए ज़्यादा मुश्किलें सामने आती हैं। देखा जाता है कि तलाक के बाद ज़्यादातर पुरूष विवाह कर लेते हैं तो ज़्यादातर महिलाएं अकेले ही जीवन बिता देती हैं।

     

    तलाक के वो कानून जिनकी जानकारी है ज़रूरी

     

    इसलिए महिलाओं को संपत्ति और बच्चों संबंधी अपने अधिकारों का ज्ञान होना चाहिए ताकि वे तलाक के बाद खुशहाल जीवन बिता सकें।

     

    गुजारा भत्ता

     

    हिंदू मैरिज एक्ट के मुताबिक जब तक तलाक की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती तब तक पति द्वारा पत्नी को गुजारा भत्ता देना होगा। वहीं, तलाक हो जाने के बाद पति को गुजारा भत्ता की एकमुश्त राशि पत्नी को देनी होगी। अगर पत्नी चाहे तो वो सालाना या मासिक गुजारा भत्ते की भी मांग कर सकती है। जिस पर कोर्ट अपना आखिरी फैसला देगा।

     

    संपत्ति पर अधिकार

     

    • तलाक के बाद पत्नी के नाम जितनी भी संपति है उस पर उसका पूरा अधिकार होगा।
    • शादी के समय मिले उपहारों व नकदी पर भी पत्नी का अधिकार होता है। 
    • ज्वॉइंट प्रापर्टी पर पत्नी को बराबर का हिस्सा मिलेगा, पत्नी चाहे तो अपने हिस्से की संपत्ति बेच सकती है।

     

    बच्चों की कस्टडी

     

    • 7 साल से कम उम्र के बच्चे की कस्टडी हमेशा मां को ही सौंपी जाती है।
    • 7 साल से ज़्यादा आयु के बच्चे की कस्टडी के लिए दोनों पक्ष कोर्ट में अप्लाई कर सकते हैं।
    • कस्टडी के लिए अप्लाई करने वाले पक्ष को अदालत में साबित करना होगा कि वे उसकी अच्छी देखभाल करने में सक्षम हैं।

     

    हालांकि फैमिली एक्ट 1984 में ये स्पष्ट किया गया है कि तलाक से पहले कोर्ट के जज दोनों पक्षों में सुलह की कोशिश करें। इसके लिए पुलिस थानों, परिवार परामर्श केंद्रों और वन स्टॉप सेंटर्स पर भी कॉउंसलिंग मुहैया करवाई जाती है ताकि शादियों को टूटने से बचाया जा सके। पति पत्नी में लड़ाई की परिस्थितियों में भावनाएं दिमाग पर हावी हो जाती हैं, इसलिए जल्दबाजी में तलाक जैसा फैसला ना लें। उम्मीद है इस ब्लॉग में तलाक की प्रक्रिया से जुड़े सभी जरूरी सवालों के जवाब आपको मिल पाए होंगे।



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