मछली पालन की बायोफ्लॉक तकनीक (Biofloc Technology) को समझें

जानें, क्या है बायोफ्लॉक तकनीक (Biofloc Technology)?

बायोफ्लॉक तकनीक (Biofloc Technology ) मछली पालन की उन्नत तकनीकों में से एक है। इसकी मदद से किसान बेहतर मुनाफ़ा कमा रहे हैं। आइए, इसे समझने का प्रयास करते हैं।

26 October 2020

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  • नई तकनीक अपने साथ हमेशा कुछ नया लेकर आती है। मछली पालन की बायोफ्लॉक तकनीक भी कुछ ऐसी ही है, जो किसानों के साथ-साथ समूचे कृषि क्षेत्र को मज़बूती प्रदान कर रही है। तो चलिए, इस ब्लॉग के ज़रिए मछली पालन की इस उन्नत तकनीक पर एक नज़र डालते हैं।  

     

    क्या है बायोफ्लॉक तकनीक (Biofloc Technology)?       

    यह मछली पालन की एक तकनीक है, जो पानी में मौजूद विषैले पदार्थों को मछलियों के चारे में तब्दील कर देती है। यह चारा मछलियों का भोजन बन जाता है। इसके अतिरिक्त यह तकनीक पानी में कार्बन और नाइट्रोजन के अनुपात को भी संतुलित रखती है, जिससे पानी का वातावरण अच्छा रहता है। जब वातावरण अच्छा रहता है, तो मछलियों को पालना और भी आसान हो जाता है।  

     

     

    बायोफ्लॉक तकनीक के फ़ायदे:

    ·    यह तकनीक विषैले पदार्थों को एक हाई प्रोटीन चारे में बदल देती है।

    ·    पारम्परिक मछली पालन की तुलना में मछलियां जल्दी बड़ी होतीं हैं।

    ·    इससे पानी के वातावरण को ज़्यादा नुकसान नहीं पहुंचता है।

    ·        पानी में मौजूद हानिकारक अवशेषों का बेहतर प्रबंधन हो पाता है।

    ·        मछली पालन की लागत में कमी आती है।

    ·        किसान सीमित जगह में भी बेहतर उत्पादन कर पाते हैं।

    ·        मछलियां लंबे समय तक पानी में जीवित रहतीं हैं।

    ·        ज़मीन व पानी का सदुपयोग हो पाता है।

     

    बायोफ्लॉक तकनीक की कुछ कमियां:

    ·       इसमें बहुत ज़्यादा सावधानी बरतनी पड़ती है।

    ·       पानी में नाइट्रेट की मात्रा में वृद्धि होती है।

    ·       पानी का वातावरण दूषित हो सकता है।

    ·      मछली उत्पादन में बढ़ोतरी होती है मगर कभी-कभी मछलियोें की क्वालिटी पर इसका असर देखने को मिल सकता है।

     

     

     

     

    कब आती है यह तकनीक काम:

    जब मछलियां बड़ी संख्या में पाली जातीं हैं और पानी की अदला-बदली एक समस्या होती है, तब बायोफ्लॉक तकनीक सबसे ज़्यादा कारगर साबित होती है। इसके ज़रिए मछलियों की अच्छी पैदावार होती है और जैव सुरक्षा (biosecurity)  में भी मदद मिलती है।

     

    कौन सी मछलियां पाली जा सकतीं हैं?

    बायोफ्लॉक तकनीक के ज़रिए मछली की उन्हीं प्रजातियों को पालना सही होता है, जो सूक्ष्मजीवों से मिले प्रोटीन को पचाने में सफल रहते हैं। इस लिहाज़ से देखें, तो तिलपिया, मांगुर, पंगेसियस व कार्प मछली इसके लिए उपयुक्त हैं।

     

    कौन सी मछलियां नहीं पाली जा सकतीं हैं?

    कुछ मछलियां इस तकनीक में फिट नहीं बैठतीं हैं क्योंकि वे पानी में मौजूद हाई सोलिड कॉन्सन्ट्रेशन्स को सहन नहीं कर पातीं हैं। जैसे कि कैटफ़िश और स्ट्राइप्ड बास मछली। इसलिए बायोफ्लॉक मछली पालन के लिए ये प्रजातियां बेहतर विकल्प नहीं हैं।

     

    एक नज़र इसके आर्थिक पहलू पर:

    जानकारों की मानें, तो यह तकनीक बिल्कुल भी महंगी नहीं है। सबसे अच्छी बात ये है कि किसान छोटी सी पूंजी के साथ इसकी शुरुआत कर सकते हैं। आइए, इसके अर्थतंत्र को समझते हैं-

    मान लीजिए, करीब एक एकड़ के तालाब में 5-6 महीने के अंतराल में लगभग 2 हज़ार किलो मछलियां होतीं हैं। वहीं, किसान बायोफ्लॉक तकनीक के ज़रिए महज़ 100-150 स्क्वेयर फीट की जगह में ही इतना उत्पादन आसानी से कर सकते हैं। उन्हें बस 4 मीटर व्यास (diameter) की 4 टंकियों की आवश्यकता होगी और वे बड़ी सरलता से उत्पादन के इस लक्ष्य को हासिल कर पाएंगे।

    यदि खर्च की बात की जाए, तो हमारे किसान भाई महज़ 1.5 लाख रुपए की लागत के साथ बायोफ्लॉक की दो टंकियों की एक इकाई तैयार कर सकते हैं। वहीं, यदि कोई किसान बड़े पैमाने पर इसे अपनाना चाहता है, तो करीब 4 लाख रूपए में बायोफ्लॉक की 6 टंकियों की इकाई लगाई जा सकती है। है ना फ़ायदे की बात?

     

    हम आशा करते हैं कि आपको बायफ्लॉक तकनीक पर लिखा हमारा यह ब्लॉग पसंद आया होगा। यदि आप मछली पालन पर और अधिक जानकारी चाहते हैं तो आपको हमारा ब्लॉग जानें मछली पालन(fish farming ) के लागत और मुनाफ़े का गणितज़रूर पढ़ना चाहिए।  

     



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