Organic fertilizers: जैविक खाद और उर्वरक के प्रकार एवं महत्व

Organic fertilizers: जैविक खाद और उर्वरक के प्रकार एवं महत्व

भारत में खाद्यान्न (Food grains) में आत्मनिर्भरता, हरित क्रांति (Green revolution) के कारण ही संभव हो पाई। इसमें उर्वरकों (Fertilizers) का भी योगदान है।

17 August 2020

  • 1890 Views
  • 8 Min Read

  • मनुष्य अपने पोषण (Nutrition) की जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने भोजन में कार्बोहाईड्रेट, प्रोटीन और विटामिन शामिल करते हैं। इसके अलावा विभिन्न प्रकार के खनिज तत्व (Mineral elements) भी शामिल करते हैं। जैसे- फॉस्फोरस, पोटैशियम, आयरन, मैग्नीशियम इत्यादि। 

     

    उसी प्रकार पौधों के पोषण के लिए ऐसी ही जरूरतें होती हैं। यदि मिट्टी (Soil) में इन पोषक तत्वों की कमी है तो पौधों की वृद्धि रूक जाती है। इन आवश्यक पोषक तत्वों (Nutrients) को रासायनिक या जैविक खाद के माध्यम से पूरा किया जाता है। 

     

    स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत खाद्यान्नों (Food grains) तथा अन्य कृषि उत्पादों की भारी कमी से जूझ रहा था। 1960 के दशक में हरित क्रांति (green Revolution) के बाद भारत में उर्वरक रसायनों (Fertilizer chemicals) का उपयोग बढ़ गया, जिससे अनाज के उत्पादन में करीब 40-50 प्रतिशत की वृद्धि भी हुई। भारत अनाज उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर (self dependent) हो सका।


    ब्लॉग को शुरू करने से पहले आपको बता दें कि खाद और उर्वरक क्या होते हैं? ज्यादातर लोग इसमें अंतर नहीं कर पाते हैं। 

     

    आसान भाषा में कहें तो जो खाद प्राकृतिक तरीके से बनाए जाते हैं, उसे जैविक खाद (organic fertilizer) कहते हैं और जो फैक्ट्री में रासायनिक पदार्थ से तैयार किया जाता है उसे उर्वरक (Fertilizer) कहते हैं।

     

    जैसे- जैविक खाद में गोबर खाद, कम्पोस्ट खाद, हरी खाद और कार्बनिक खाद आते हैं। जबकि रासायनिक खाद में यूरिया, डीएपी, कैल्शियम अमोनियम नाईट्रेट, एमोनियम सल्फेट, एन.पी.के, जिंक सल्फेट इत्यादि। 

     

    प्राकृतिक उर्वरक: जैविक खाद

    खाद एक प्राकृतिक जैविक उर्वरक है, जिसे जैविक खाद (organic fertilizer) भी कहते हैं। वनस्पति जगत में पोषण और विकास के काम आने वाले विघटन (Dissolution) को खाद कहते है। 

     

    रासायनिक खादों (Chemical fertilizers) के मुकाबले जैविक खाद सस्ते, टिकाऊ तथा बनाने में आसान होते हैं। इनके प्रयोग से मिट्टी में ह्यूमस (Humus) की बढ़ोतरी होती है और मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होता है। इसके अलावा फसलों को आवश्यक पोषक तत्वों जैसे नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश उपलब्ध हो जाती है। 

     

    जैविक खाद के प्रकार

    गोबर खाद

    गोबर की खाद गाय, भैंस, बकरी, घोड़ा, सुअर, मुर्गी एवं अन्य पशु-पक्षियों के मल-मूत्र, विभिन्न पोषक पदार्थों जैसे बिछावन, भुसा, पुआल, पेड़ पोधों की पत्तियां आदि को मिलाकर तैयार किया जाता है। 

     

    वर्मी कम्पोस्ट (Vermi compost)

    केंचुआ खाद या वर्मी कम्पोस्ट पोषण से भरपूर एक उत्तम जैव उर्वरक (Bio fertilizer) है। वर्मी कम्पोस्ट खाद प्रायः केंचुआ आदि कीड़ों के द्वारा वनस्पतियों एवं भोजन के कचरे आदि को विघटित करके बनाई जाती है। इसीलिए केंचुएं को किसानों का मित्र कहा जाता है। 

     

    आपको बता दें, वर्मी कम्पोस्ट को 50 से 60 दिनों के अंदर तैयार किया जा सकता है। इसमें 2.5 से 3% नाइट्रोजन, 1.5 से 2% सल्फर तथा 1.5 से 2% पोटाश पाया जाता है। इस खाद की मुख्य विशेषता है कि इसमें बदबू नहीं होती है और मक्खी एवं मच्छर नहीं बढ़ते है तथा वातावरण (Environment) प्रदूषित नहीं होता है। तापमान नियंत्रित रहने से जीवाणु क्रियाशील तथा सक्रिय रहते हैं।

                                              

    हरी खाद                              

    कृषि में हरी खाद उस सहायक फसल को कहते हैं जिसकी खेती मुख्यत: भूमि में पोषक तत्वों (Nutrients) को बढ़ाने तथा उसमें जैविक पदाथों की पूर्ति करने के उद्देश्य से की जाती है। प्राय: इस तरह की फसल को कुछ दिनों के बाद जब कुछ बढ़कर हरी और मुलायम अवस्था में होती है तभी हल चलाकर मिट्टी (Soil) में दबा या मिला दिया जाता है। जिससे कुछ दिनों बाद फसल सड़कर मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढ़ा देती है। 

     

    कार्बनिक खाद

    कार्बनिक खाद (Organic manure) प्रायः घरों में प्रयुक्त होने के बाद बची खाद्य पदार्थों और अन्य जैसे- गोबर खाद, फसल अपशिष्ट, चीनी मिल से निकले गन्ने के अपशिष्ट, जूस उद्योग का अपशिष्ट पदार्थ, विभिन्न प्रकार की खली और ऊन के कारखानों का अपशिष्ट पदार्थ आदि को फॉस्फेट के साथ कम्पोस्टिंग (Composting) करके बनाया जाता है। कार्बनिक खाद का उपयोग प्रायः पौधों को फॉस्फोरस (Phosphorus) देने के लिए किया जाता है। 

     

    जैविक खाद के लाभ (Benefits of organic manure)

    • जैविक खाद (organic manure) के प्रयोग से मृदा (Soil) का जैविक स्तर बढ़ता है, जिससे लाभकारी जीवाणुओं (Bacteria) की संख्या बढ़ जाती है और मृदा काफी उपजाऊ बनी रहती है।
    • जैविक खाद (organic manure) से फलों की गुणवत्ता बढ़ती है जिससे अच्छा स्वाद मिलता है।
    • रासायनिक खादों (Chemical fertilizers) के मुकाबले जैविक खाद सस्ते, टिकाऊ तथा बनाने में आसान होते हैं।
    • किसान DAP व SSP खरीदने पर जितना पैसा खर्च करता है उससे कम पैसे में जैविक खाद बनाकर भरपूर फसल पैदा कर सकता है।
    • इनके प्रयोग से मृदा में ह्यूमस (Humus in the soil) की बढ़ोतरी होती है व मृदा की भौतिक दशा में सुधार होता है।
    • इन खादों के प्रयोग से पोषक तत्व पौधों को काफी समय तक मिलते हैं। यह खादें अपना अवशिष्ट गुण मृदा में छोड़ती हैं। अतः यह एक फसल में इन खादों के प्रयोग से दूसरी फसल को लाभ मिलता है। इससे मृदा उर्वरता का संतुलन ठीक रहता है
    • जैविक खाद लवणीय व क्षारीय दोनों प्रकार की मिट्टी में प्रभावी रूप में काम करता है जबकि रासायनिक खाद ऐसा नहीं कर सकते।

    कृत्रिम उर्वरक

    कृत्रिम उर्वरक एक प्रकार से रासायनिक उत्पाद हैं जिसे पेड-पौधों की तत्काल वृद्धि में सहायता के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। इसे रासायनिक खाद (chemical fertilizer) भी कहते हैं।

     

    रासायनिक खाद असल में जमीन को उत्तेजित करता है जिससे फसलों में तत्काल फर्क दिखता है। अर्थात् रासायनिक उर्वरक, पौधों के लिए आवश्यक तत्वों की तत्काल पूर्ति के साधन है। 

     

    लेकिन रासायनिक खाद (chemical fertilizer) के लगातार उपयोग से दुष्परिणाम भी आ रहे हैं। ये लंबे समय तक मिट्टी में बने नहीं रहते हैं। इस प्रकार की खाद मिट्टी में उपस्थित जीवाणुओं और सुक्ष्मजीवों के लिए भी ये घातक साबित होते हैं। इसलिए रासायनिक उर्वरक के विकल्प के रूप में जैविक खाद (organic fertilizer) का प्रयोग तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। 

     

    कृत्रिम उर्वरक के प्रकार

    यदि हम भारतीय बाजारों में उपलब्ध रासायनिक उर्वरकों पर नज़र डालें तो निम्न प्रकार के रासायनिक खाद बाजार में उपलब्ध हैं। 

     

    यूरिया (Urea)

    यह रासायनिक उर्वरकों में सबसे अधिक लोकप्रिय और सर्वाधिक बिकने वाला उर्वरक है। यह पानी में घुलनशील कार्बनिक रसायन है, जिसका निर्माण अमोनिया और कार्बन डाईऑक्साइट से एक उच्च दबाव और तापमान वाली औद्योगिक प्रक्रिया के द्वारा किया जाता है। यूरिया में लगभग 46 प्रतिशत नाइट्रोजन होती है। 

     

    कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट (Calcium ammonium nitrate)

    यह अमोनियम नाइट्रेट और कैल्शियम कार्बोनेट का मिश्रण होता है। चूँकि इसमें एक अतिरिक्त पोषण तत्व कैल्शियम होता है, इसलिए यह फसलों के लिए लाभकारी होता है।

     

    फॉस्फिक उर्वरक (Phosphic fertilizer)

    फॉस्फेटिक उर्वरकों में फॉस्फोरस प्रमुख पोषक तत्व के रुप में होता है। इसमें मुख्य रूप से कैल्शियम फॉस्फेट होता है जो कि सभी फॉस्फेटिक उर्वरकों का प्राथमिक स्रोत है।

     

    मिश्रित उर्वरक (Compound fertilizer)

    मिश्रित उर्वरक में एक से अधिक पोषक तत्व होते हैं। इन्हें N-P-K-S अर्थात- नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम- सल्फर कहा जाता है।

     

    पोटैशियम उर्वरक (Potassium fertilizer)

    पौधों के लिए तीसरा सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व पोटैशियम है। इसे पोटैशियम क्लोराइड या पोटैशियम सल्फेट के रूप में दिया जाता है। यह मूल्य की दृष्टि से भी सस्ती होती है। इसलिए किसान इसे ज्यादा मात्रा में इस्तेमाल करते हैं। 

     

    रासायनिक उर्वरकों के लाभ और हानियाँ

    भारत जैसे घनी आबादी वाले देश में पर्याप्त मात्रा में खाद्य फसलों का उत्पादन एक बड़ी चुनौती है।  हमारे देश में खाद्यान्नों में आत्मनिर्भरता हरित क्रांति (green Revolution) के कारण ही सम्भव हो पाया है। जिसमें उर्वरकों का भी बड़ा योगदान है। इसलिए हमारी वर्तमान खाद्य सुरक्षा को हासिल करने में रासायनिक उर्वरकों की भूमिका को कम करके नहीं आँका जा सकता। 

     

    परन्तु रासायनिक उर्वरकों के अँधाधुँध इस्तेमाल से मिट्टी की गुणवत्ता में काफी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। 

     

    भारत सरकार की उर्वरक नीति

    कृषि के निरंतर विकास और संतुलित पोषक तत्‍व अनुप्रयोग को बढ़ावा देने के लिए आवश्‍यक है कि किसानों को उर्वरक न्यूनतम मूल्‍य पर उपलब्‍ध कराया जाए। इसी उद्देश्‍य से भारत सरकार ने 1 अप्रैल 2003 से यूरिया के लिए नई मूल्‍य-निर्धारण नीति की थी। जिसके तहत यह सुनिश्चित किया गया है कि किसानों को यूरिया न्यूनतम मूल्य पर प्राप्त हो सके। 

     

    इसके लिए भारत और राज्य सरकारों के कृषि विभागों को  यह जिम्मेदारी दी गई है कि किसानों को समय-समय पर उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करें ताकि किसान अपने फसलों को उचित समय पर खाद दे सकें। 

     

    संक्षेप में कहें तो बीजों के बाद, आज विशेष रूप से हमारी खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की दृष्टि आवश्यक फसलों की उच्च पैदावार को हासिल करने के लिए, कृषि क्षेत्र में लगने वाली सबसे महत्वपूर्ण सामाग्रियों में से कुछ रासायनिक उर्वरक ही हैं। जिसके सहारे भारत की 130 करोड़ आबादी को खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित किया जा सकता है।



    यह भी पढ़ें



    कृषि की अन्य ब्लॉग