चिताओं के बीच होली, जानें महाश्मशान की ये कहानी

जानिए क्या है काशी के महाश्मशान की ‘चिता भस्म होली’

फूलों की होली, रंगों की होली, लट्ठमार होली, अबीर और गुलाल की होली...तो आपने सुनी होगी। लेकिन, कभी जलती चिताओं के बीच खेली जाने वाली होली देखी? आइए, जानें।

25 March 2021

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  • वाराणसी का मणिकर्णिका घाट, मोक्ष के द्वार के रूप में जाना जाता है। यहां लगता है चिताओं का मेला..., धधकती है शवों की ज्वाला। दरअसल, यहीं से शुरू होती है, काशी की मसानी होली। एक ऐसी होली, जिसे देखकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे। क्योंकि, यहां होली खेलने में रंगों की जगह चिताओं की भस्म का इस्तेमाल होता है।

     

    ये है परंपरा

     

    मणिकर्णिका घाट पर भोलेनाथ के भक्त चिता भस्म से होली खेलते हैं। मान्यता है कि भगवान महाश्मशानाथ मतलब भूत भावनशंकर अपने गणों, भूत-प्रेत, पिशाच, यक्ष, गंधर्व, राक्षस के साथ होली खेलते हैं। शिवपुराण और दुर्गा सप्तशती पाठ में इसका पूरा वर्णन मिलता है। 

     

    रोंगटे खड़े कर देगी वाराणसी की ‘मसाने की होली’

     

    कहा जाता है कि शिव जी ने अपने अति प्रियगणों को मनुष्यों और देवी-देवताओं  से दूर रहने को कहा था। इसलिए रंगभरी एकादशी में देवता और मनुष्य भोलेनाथ के साथ होली खेलते हैं। इसके ठीक अगले दिन मणिकर्णिका घाट पर बाबा के साथ चिताभस्म की होली खेली जाती है।

     

    मसाने वाली होली की शुरुआत

     

    रंगभरा एकादशी के दूसरे दिन महाश्मशान नाथ की आरती होती है, इसके बाद बाबा भोलेनाथ को भस्म चढ़ाई जाती है। फिर 51 वाद्य यंत्रों के साथ बाबा भोलेनाथ की आरती होती है। आरती के बाद ही शुरू होती है, मसाने वाली होली। यहां महाश्मशान में एक ओर चिताएं जलती रहती हैं, तो वहीं दूसरी तरफ डमरू की गूंज और हर-हर महादेव के जयकारे लगते रहते हैं। भांग, पान और ठंडाई की मस्ती के साथ कोई एक-दूसरे को मणिकर्णिका घाट की भस्म लगाता दिखता है। 

     

    यह है गौने की कहानी 

     

    कथाओं में वर्णन किया गया है कि महाशिवरात्रि पर शिव विवाह के बाद पड़ने वाली एकादशी को भोलेनाथ का गौना किया जाता है। मान्यताओं के अनुसार, गौने पर भोलेनाथ, माता पार्वती को मायके से विदा करवाकर अपने काशी विश्वनाथ मंदिर लाते हैं। इस दिन को रंगभरी एकादशी कहा जाता है। भोलेनाथ इस दिन देवी देवताओं और मनुष्यों के साथ होली खेलते हैं। इसके बाद से पूरा शहर 4 दिन तक होली के रंग में डूब जाता है।

     

    रोंगटे खड़े कर देगी वाराणसी की ‘मसाने की होली’

     

    पौराणिक कथा को समझिए

     

    पौराणिक कथाओं में कहा जाता है कि काशी में जन्म-मृत्यु के चक्र को भंग करने के लिए महाकाल ने महाश्मशान में धुनी रमाई और यहां भस्म फाग का उत्सव रचाया। यही वजह है कि फाल्गुन शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि की दुपहरिया मणिकर्णिका के महाश्मशान की पारंपरिक भस्म होली खेली जाती है।

     

    हुड़दंग का रंग निराला

     

    काशी में मृत्यु भी मंगलकारी मानी जाती है। अड़ियों के इस शहर में खेली जाती है चिता भस्म होली। इसके रंग इतने हैं कि हर इंसान यहां आकर इनमें खो जाता है। पूरे विश्व का ये इकलौता शहर है, जहां अबीर और गुलाल के अलावा धधकती चिताओं की राख से  होली खेली जाती है। इस दौरान काशी के घाटों से लेकर गलियों तक होने वाली हुड़दंग का नज़ारा देखने लायक होता है। 

     

    रोंगटे खड़े कर देगी वाराणसी की ‘मसाने की होली’

     

    जीवात्मा का शिव से मिलन

     

    जीव का शिव से मिलन कहलाती है, मसाने की ये होली। मणिकर्णिका घाट पर चिताओं की लकड़ियों पर लिट्टी सेंककर खाई जाती है, ये नज़ारा आम लोगों के लिए बहुत खास हो जाता है। इस घाट पर इंसान को मोक्ष प्रदान करने वाले महाकाल भस्म का फाग रचाते हैं। 

     

    ये तो थी काशी की मसाने वाली होली की बात। लेकिन, Knitter पर आपको कृषि एवं मशीनीकरण, एजुकेशन और करियर, सरकारी योजनाओं और ग्रामीण विकास जैसे मुद्दों पर भी कई महत्वपूर्ण ब्लॉग्स मिलेंगे, जिनको पढ़कर अपना ज्ञान बढ़ा सकते हैं और दूसरों को भी इन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।   

     

     

    ✍️ लेखक- नितिन गुप्ता 

     



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