भारत में स्वशासन का इतिहास

भारत में स्वशासन का इतिहास

जानिए, स्वशासन की विकास यात्रा का इतिहास। वैदिक काल से भारत की आजादी तक।

25 June 2020

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  • भारत गाँवों का देश है जहाँ आज भी लगभग 65% जनसंख्या गाँवों में निवास करती है। गाँव हमारी प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति का स्रोत है। प्राचीन धर्मग्रन्थों जैसे- वेद, पुराण, स्मृतियों और संहिताओं में भी सार्वजनिक सभा के साथ-साथ ग्रामसभाओं की बैठकों का विस्तार से वर्णन है।

     

    इस ब्लॉग की शुरूआत करने से पहले हम अपने पाठकों को बताना चाहते हैं कि भारत में प्राचीन समय से ही गाँवों में स्वशासन की व्यवस्था विद्यमान थी। आज की तरह प्राचीन समय में भी स्थानीय स्वशासन का महत्व था। 

     

    आपको बता दें, प्राचीन समय में गाँवों का जैसे-जैसे विकास होता गया, गाँव का प्रशासन चलाने के लिए लोगों को प्रशासन की जरुरत महसूस हुई।  इसी आवश्यकता को पूरा करने के लिए गाँवों में स्वतंत्र शासन-व्यवस्था की स्थापना की गई। जिसे आज 'स्वशासन' कहा जाता है।

     

    प्राचीन समय से ही ग्रामवासियों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए स्वशासन एक स्वतन्त्र प्रणाली के रूप में विकसित होने लगा था। इन स्वतंत्र प्रणाली के मुखिया को प्राचीन भारत में विभिन्न नामों जैसे- ग्रामणी, ग्रामधिपति, रेड्डी और पंचमंडली से जाना जाता था।

     

    यहाँ यह भी जिक्र करना आवश्यक है कि प्राचीन समय में शासन से जुड़े रोजमर्रा के निर्णय ग्रामसभा में ही होते थे। राजा भी ग्रामसभाओं के निर्णयों का सम्मान करता था। मनुस्मृति के अनुसार मनु ने शासन व्यवस्था के सुचारू रूप से संचालन के लिए एक गाँव, दस गाँव, सौ गाँव और एक हजार गाँवों के अलग-अलग संगठन बनाए, जिन्हें आज के संदर्भ में क्रमशः ग्राम, ब्लॉक, तहसील और जिला स्तर के समकक्ष माना जा सकता है। 

     

    भारत में स्वशासन का इतिहास
    भारत में स्वशासन का इतिहास

    वैदिक काल में स्वशासन

    वैदिक काल में ग्रामीण प्रशासन महत्वपूर्ण था। गाँव की पंचायतें ग्रामवासियों द्वारा ही गठित की जाती थी। प्रशासकीय और न्याय संबंधित कार्य भी ग्रामसभा द्वारा संपन्न किए जाते थे। वैदिक मंत्रों में भी गाँवों की समृद्धि के लिए अनेक प्रार्थनाओं का जिक्र किया गया है। वेदों में ग्राम अधिकारी को ‘ग्रामणी’ कहा गया है। वैदिक काल में राज्य छोटे-छोटे होते थे, इस कारण ग्रामों का महत्व और भी बढ़ गया था।

     

    वैदिक काल में ग्रामीण शासन महत्वपूर्ण माना जाता था। गाँव की पंचायत गाँव के लोगों द्वारा संगठित होती थी। प्रशासकीय और न्याय संबंधित कार्य भी ग्रामसभा द्वारा संपन्न किए जाते थे। 

     

    वैदिक काल में गाँव के शासन को ‘सभा’ या ‘समिति’ के नाम से जाना जाता था। गाँव के मुखिया को ‘ग्रामणी’ या ग्रामाधिपति’ कहते थे। गाँव की शासन व्यवस्था को इन्हीं के माध्यम से चलाया जाता था। ग्रामणी के चयन के बारे में वेदों में स्पष्ट रुप से उल्लेख तो नहीं मिलता है, लेकिन इतिहासकारों का कहना है कि ग्रामणी की नियुक्ति राजा के द्वारा की जाती थी और यह पद प्रायः वंशानुगत होता था। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि ग्रामणी का चुनाव ग्राम-परिषद द्वारा किया जाता था।

     

    मनुस्मृति में ग्राम परिषद के सम्बन्ध में स्पष्ट और विस्तृत नियम मिलते हैं। वैदिक काल में लोग प्रतिनिधित्व के सिद्धांत का आदर करते थे। राज्याभिषेक के अवसर पर गाँव का मुखिया प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित रहता था। ‘ग्रामणी’ के माध्यम से ही राजा ‘राज्य के कानूनों’ को गाँव में लागू करवाता था। गाँव के मुद्दों का निर्णय करना भी उसी का उत्तरदायित्व था। इस प्रकार वैदिक युग में राज्य-शासन में ‘ग्रामाधिपति’ का महत्वपूर्ण स्थान था।

    बौद्ध काल में स्वशासन

    बौद्ध काल में गाँवों की शासन-व्यवस्था सुगठित और सुदृढ़ थी। गाँव के शासक को ग्राम-योजक कहते थे। ग्राम-योजक का पद बहुत ही महत्वपूर्ण था। ग्राम संबंधित सभी मामले को सुलझाने का काम ग्राम-योजक के ऊपर था। वह गाँव की सभी छोटी-बड़ी समस्याओं को अपने स्तर पर सुलझाने का प्रयत्न करता था। यदि ग्राम-योजक अपने क्षेत्र में स्वेच्छाचारी शासक बन जाता था तो उसके कार्यों के विरूद्ध राजा के पास अपील भी की जा सकती थी।

     

    गाँव के मुखिया की सहायता के लिए एक मुनीम की व्यवस्था होती थी जो गाँव के कार्यों आदि का लेखा-जोखा तैयार करता था। इस काल में कई गाँवों को मिलाकर ग्राम-परिषद बनती थी, जिसमें महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होती थी।

     

    इस काल की दिलचस्प बात है कि मुखिया का स्थान ग्रामीण प्रशासन में महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ राजा की सभा में महत्वपूर्ण था। ग्राम पंचायतों को ग्रामसभा कहा जाता था और इसका मुखिया ग्राम-योजक कहलाता था, जिसका चुनाव ग्रामीणों द्वारा होता था।

    मौर्य काल में स्वशासन

    मौर्य शासन में प्रत्येक गाँव में एक सभा होती थी जो गाँव के सभी मामलों में तर्क-वितर्क करती थी। एक गाँव में सौ से पाँच सौ परिवार होते थे। पूरे समुदाय के लिए कानून बनाए जाते थे। नियमित न्याय-प्रक्रिया एवं जाँचों में अपराधियों को दंडित किया जाता था। गाँव की विविध गतिविधियों का केंद्र ग्रामसभा होती थी जिसमें गाँव के परिवारों के प्रतिनिधि, वृद्ध और अनुभवी लोग हिस्सा लेते थे। ग्रामसभा या पंचायतें सार्वजनिक हित की योजनाएं भी बनाती थी। ये सभाएं सिंचाई की नहरों और तालाबों का निर्माण व देख-रेख का काम भी करती थी। ग्राम सभाओं को अतिरिक्त कर और चुंगी लगाने का भी अधिकार था।

     

    यहाँ यह भी जिक्र करना आवश्यक है कि ग्रामसभा की महत्ता देखते हुए सभी राजाओं ने शासन-प्रणाली को सुविधाजनक बनाने के लिए स्थानीय प्रशासन हेतु विकेंद्रीकरण की निति को अपनाया। यहाँ दिलचस्प बात है कि इतिहास में बिम्बसार की सभा में 80 हजार ग्रामधिपतियों को आमंत्रित किए जाने का भी जिक्र है।

     

    मौर्य काल में प्रशासन में बीस गाँवों का मुखिया बीसाती, सौ ग्रामों का शत-ग्रामधिपति और इसके ऊपर सहस्र ग्रामधिपति कहा जाता था। इन सभी की नियुक्ति राजा के द्वारा होती थी।

    गुप्त काल में स्वशासन

    गुप्त काल के दौरान भी मौर्य कालीन जैसी ही ग्रामसभा थी परन्तु इस दौरान पंचायतों के नाम में परिवर्तन किए गए, इसके अन्तर्गत जिला ग्रामों को भी विभाजित किया गया। ग्राम प्रशासन हेतु प्रत्येक ग्राम में एक मुखिया होता था जिसे ‘ग्रामिक’, ‘ग्रामपति’ अथवा ‘ग्रामहत्तर’ आदि विभिन्न नामों से पुकारा जाता था। गुप्त काल में ग्राम परिषद, ग्रामसभा, ग्राम पंचायत व पंचमंडली अथवा ग्राम जनपद होती थी।

     

    आपको बता दें,  ग्रामीण प्रशासन सार्वजनिक उपयोग के कार्यों के साथ-साथ गाँव की सुरक्षा, झगड़ों का निर्णय, राजस्व वसूली, सिंचाई एवं परिवहन की व्यवस्था करता था। गाँव की भूमि और अन्य चल-अचल संपत्ति ग्रामसभा एवं ग्राम पंचायत की स्वीकृति से ही बेची अथवा दान दी जा सकती थी। इस काल के दौरान स्वयं चन्द्रगुत द्वितीय के सेनापति अम्रकादेव को एक गाँव का दान करने के लिए ग्राम पंचायत की अनुमति लेनी पड़ी थी। ग्राम-सभा उद्यान, सिंचाई और मंदिर आदि की व्यवस्था हेतु उपसमितियों का गठन करती थी।

     

    गुप्त काल में ‘ग्रामसभा’ की निगरानी के लिए राजा द्वारा शाही अधिकारियों की नियुक्ति की जाती थी। ये शाही अधिकारी राजा के फरमान को ग्रामसभाओं में सुनाते थे। ग्रामसभा की सहायता से  ही शाही अधिकारियों द्वारा न्याय किया जाता था।  छोटे-छोटे मामलों में ग्रामसभा न्याय कर सजा सुना देती थी। पंचायतों में अनुभवी और वृद्धजनों को वरीयता दी जाती थी।

    मध्य काल(मुगलकाल) में स्वशासन

    मध्यकालीन भारत में विदेशी आक्रमणों से युद्ध और विनाश, विद्रोह और उनके क्रूर दमन का माहौल रहा। नए विदेशी शासक मुख्य रुप से सैन्य शक्तियों पर निर्भर करते थे किन्तु ग्रामीण स्थानीय स्वशासन की निरंतरता बनी रही।

     

    किन्तु कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इस काल की शासन व्यवस्था में नगरों पर अधिक ध्यान दिया गया जिससे पंचायतों की शक्तियाँ कम हो गई।

     

    इस काल में जमींदारी प्रथा के विकास से ग्राम पंचायतों का पतन हुआ। इस व्यवस्था में समृद्ध किसान या तो स्वयं कर लेकर या अपने मुनीमों से कर वसूल कर गाँव के लोगों पर नियंत्रण किया करते थे। लेकिन मध्य काल में हिन्दू राजाओं ने ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय शासन को ही विकसित किया। मराठा शासक शिवाजी के शासन काल में स्थानीय शासन व्यवस्था में काफी सुधार हुआ। फिर भी मुगल और मराठा काल में भी किसी न किसी प्रकार की पंचायत व्यवस्था चलती रही और प्रत्येक गाँव आत्मनिर्भर बना रहा। फिर भी इस काल में शहरों को बसाने पर ज्यादा ध्यान दिया गया।

    ब्रिटिश काल में स्थानीय स्वशासन

    भारत लगभग 250 वर्ष तक अंग्रेजों की दासता में रहा। इस काल में गाँवों की दशा सुधारने की दिशा में कोई विशेष प्रयास नहीं किए गए, इसलिए गाँवों की दशा पहले से अधिक बदतर हो गई।

     

    ब्रिटिश शासनकाल में पंचायत-व्यवस्था को सबसे अधिक धक्का पहुँचा। आरंभ से ही अंग्रेजों की नीति थी कि शासन का काम, अधिकाधिक राज्य कर्मचारियों के हाथों में ही रहे। इसके परिणामस्वरूप फौजदारी और दीवानी अदालतों की स्थापना, नवीन राजस्व नीति, पुलिस व्यवस्था आदि कारणों से गाँवों का स्वावलंबी जीवन और स्थानीय स्वायत्तता धीरे-धीरे समाप्त हो गई। पंचायतें स्थानीय शासन के रूप में कार्य करती थी। परंतु यह कार्य सरकारी नियंत्रण में होता था।

     

    कुछ समय बाद अंग्रेजों ने भी अनुभव किया कि उनकी केंद्रीकरण की नीति से शासन की जटिलता दिन-प्रति-दिन बढ़ती ही जा रही है। सन् 1882 ई. में स्थानीय स्वशासन के विकास में एक नए अध्याय का शुभारंभ हुआ। 

     

    1882 ई. में लॉर्ड रिपन द्वारा प्रस्तुत ‘स्थानीय स्वशासन प्रस्ताव’ को भारत में आधुनिक स्थानीय स्वशासन का प्रारंभ माना जाता है। जिसे ‘स्थानीय स्वशासन’ संस्थाओं का ‘मैग्नाकार्टा’ भी कहते हैं। 

     

    लार्ड रिपन ने भारत में स्थानीय स्वशासन में को एक नई दिशा दी। इसीलिए लॉर्ड रिपन को आधुनिक स्थानीय स्वशासन का जनक कहा जाता है।

     

    बीसवीं सदी के शुभारंभ में भारत शासन अधिनियम 1909, 1919 और 1935 में स्वशासन की व्यवस्था को अपनाते हुए प्रांतो को स्थानीय स्वशासन के क्षेत्र में कई अधिकार दिए गए। 1908 ई0 में विकेन्द्रीकरण के लिए गठित ‘राजकीय आयोग’ की रिपोर्ट ने स्थानीय स्वायत शासन के लिए महत्वपूर्ण सिफारिशें प्रस्तुत की। आयोग ने जिला बोर्ड तथा जिला नगरपालिकाओं के कार्यों को विभाजित करने के लिए ग्राम पंचायत और उपजिला बोर्डों के विकास पर बल दिया। बोर्ड ने सुझाव दिया कि ग्राम पंचायतों को भी शक्तियाँ मिलनी चाहिए।

     

    1919 के ‘भारत सरकार अधिनियम’ के लागू होने के पश्चात स्थानीय स्वायत्त शासन एक हंस्तातरित विषय के अंतर्गत आ गया। जिसका नियंत्रण जनता द्वारा निर्वाचित लोकप्रिय मंत्रियों का हो गया।

     

    1935 के अधिनियम के अनुसार प्रान्तीय स्वाशासन के प्रचलन से स्थानीय स्वायत संस्थाओं को और भी अधिक गति मिली जो 1947 में भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति तक इसी व्यवस्था के तहत शासन प्रणाली चली। 1947 के बाद भारत में ग्रामीण विकास के लिए कई कार्यक्रम चलाए गए, लेकिन पंचायत को 1992 तक संवैधानिक दर्जा प्राप्त नहीं था।

     

    अब हम लोग अगले ब्लॉग स्वतंत्र भारत में पंचायती राज की विकास यात्रा में जानेंगे कि भारत में आजादी के बाद स्थानीय स्वशासन की स्थिति कैसी थी। पंचायतों के विकास के लिए किस प्रकार के कदम उठाए गए और पंचायती राज की संवैधानिक विकास के लिए कौन-कौन सी समितियाँ बनाई गई।



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