भैंस पालन से चमकेगी आपकी किस्मत, होगी अच्छी कमाई

भैंस पालन है कितना फायदेमंद, आइए जानें

भारत में भैंस पालन सदियों से किया जा रहा है। भारतीय डेयरी सेक्टर की सफलता में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। आइए, इसे करीब से समझें।

28 February 2021

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  • भैंस के आगे बीन बजाए, भैंस खड़ी पगुराय...अरे भइया हम तो कहते हैं कि उसे पगुराने दीजिए। आपको भैंस के पगुराने से कोई परेशानी इसलिए भी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि भैंस जितनी अच्छी तरह से रहेगी, आपके और हमारे जीवन की गाड़ी उतनी ही अच्छी तरह से आगे बढ़ेगी। जानना चाहेंगे कैसे? तो इसके लिए आपको Knitter का ये ब्लॉग पूरा पढ़ना पड़ेगा।

     

    “बिज़नेस और रोज़गार” की हमारी श्रृंखला में आज हम आपको भैंस पालन से जुड़ी जानकारियां देंगे। हम बताएंगे कि आप कैसे भैंस पालन कर अपनी आमदनी से जुड़ी चिंताओं को छू मंतर कर सकते हैं? हम ये भी बताएंगे कि इस व्यवसाय पर एक्सपर्ट क्या कहते हैं? तो चलिए, जानकारियों के समंदर में डुबकी लगाते हैं, लेकिन इससे पहले ये भी जान लेते हैं कि इस दौरान आपको क्या-क्या जानकारियां मिलेंगी?

     

    आप जानेंगे-

     

    • भैंस पालन क्या है?
    • इसमें स्कोप क्या है?
    • भारत में दूध उत्पादन की स्थिति क्या है?
    • भैंस की प्रचलित नस्लें कौन सी हैं?
    • लागत कितनी आएगी?
    • मुनाफा कितना होगा?
    • लोन और सब्सिडी का प्रावधान क्या है?
    • एक्सपर्ट की क्या राय है?

     

    भैंस पालन पर एक नज़र:

     

    हम भारतीयों के लिए भैंस पालन कोई नई चीज़ नहीं है। सदियों से हम इस काम को करते आए हैं। हालांकि, ज़्यादातर लोग इसके महत्व से अंजान हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि देश के कुल दूध उत्पादन में भैंस के दूध की हिस्सेदारी करीब 49 प्रतिशत है। 

     

    वहीं, यदि हम भैंसों की वैश्विक आबादी पर गौर करें, तो विश्व की तकरीबन 56 प्रतिशत भैंस भारत में हैं। हालिया पशु गणना के आंकड़ों के मुताबिक, मौजूदा समय में भारत में करीब 11 करोड़ भैंसें हैं। हम इन आंकड़ों से आपको इसलिए भी रू-ब-रू करा रहे हैं, ताकि आप भैंस पालन की अहमियत को समझ सकें। 

     

    भैंस पालन क्या है?

     

    यदि सामान्य शब्दों में कहें, तो दूध और दूध से जुड़े उत्पादों के लिए, मांस उत्पादन के लिए और कृषि से जुड़े कार्यों को आसान बनाने के लिए भैंसों को पालना ही भैंस पालन कहलाता है। 

     

    स्कोप:

     

    • डेयरी प्रोडक्ट्स की बाज़ार में बढ़ती मांग
    • लागत की तुलना में बेहतर मुनाफा 
    • दूध में फैट कंटेंट की अधिकता

     

    भैंस पालन है कितना फायदेमंद, आइए जानें

     

     

    प्रचलित नस्लें:

     

    भारत में भैंसों की कई नस्लें हैं। लेकिन, कुछ नस्लें मुनाफे के लिहाज़ से काफी अच्छी हैं। तो चलिए, उन खास नस्लों पर एक नज़र डालें।

     

    मुर्रा:

     

    इसे दुनिया की सबसे बेहतरीन दुधारू नस्ल माना जाता है। देश के तकरीबन हर हिस्से में इस नस्ल को देखा जा सकता है। वैसे हरियाणा, दिल्ली, पंजाब और उत्तर-प्रदेश के पश्चिमी हिस्सों में ये आपको बड़ी तादाद में मिल जाएगी। 

     

    • वज़न- 350 से 700 किलो
    • दूध उत्पादन (300 दिनों में)- 1000 से 3000 लीटर

     

    सुरती:

     

    ये नस्ल गुजरात से ताल्लुक रखती है। अन्य नस्लों की तुलना में इसकी शारीरिक बनावट थोड़ी छोटी होती है। देश के छोटे किसानों के बीच ये नस्ल लोकप्रिय है।

     

    • वज़न- 400 से 410 किलो
    • दूध उत्पादन (300 दिनों में)- 1600 से 1800 लीटर

     

    मेहसाना:

     

    ऐसा माना जाता है कि मुर्रा और सुरती की क्रॉस ब्रीडिंग से इस नस्ल की उत्पत्ति हुई है। चूंकि, ये गुजरात के मेहसाना ज़िले में पाई जाती है, इसलिए इसका नाम मेहसाना पड़ गया। इसकी शारीरिक बनावट औसत होती है और सींग थोड़े घुमावदार।

     

    • वज़न- करीब 600 से 620 किलो
    • दूध उत्पादन (300 दिनों में)- करीब 1800 से 2000 लीटर

     

    नीली-रावी:

     

    ये पंजाब की एक लोकप्रिय नस्ल है। इसे फिरोज़पुर और आस-पास के इलाकों में आसानी से देखा जा सकता है। देखा जाए तो पहले नीली और रावी दो अलग-अलग नस्लें हुआ करती थीं। लेकिन, क्रॉस ब्रीडिंग के चलते इनका ये नाम पड़ गया। सतलुज और रावी नदियों की बेल्ट से इसका गहरा नाता है। इसे पंच कल्याणी के नाम से भी जाना जाता है।

     

    • वज़न- करीब 600 से 620 किलो
    • दूध उत्पादन (250 दिनों में)- करीब 2500 से 5000 लीटर

     

    ज़ाफराबादी

     

    ये गुजरात की एक अन्य नस्ल है। गीर के जंगलों और आस-पास के क्षेत्रों में इस नस्ल को आसानी से पाया जा सकता है। इसे भावनगरी, गीर और ज़ाफरी के नाम से भी जाना जाता है। इसकी शारीरिक बनावट काफी मज़बूत होती है और इसके दूध में फैट भी अधिक होता है। यही वजह है कि डेयरी बिज़नेस से जुड़े लोगों के बीच ये काफी फेमस है।

     

    • वज़न- करीब 600 से 620 किलो
    • दूध उत्पादन (300 दिनों में)- 1800 से 2900 लीटर

     

    भदावरी:

     

    ये नस्ल चंबल, बेतवा और जमुना नदी के आस-पास पाई जाती है। इसका रंग गहरा काला न होकर तांबे जैसे होता है। इसके दूध में बहुत ज़्यादा फैट होता है। इसकी सींग काफी लंबी होती है, मगर साथ ही साथ हंसिये की तरह घुमावदार भी होती है। भदावरी तहसील में पाये जाने की वजह से इसका नाम भदावरी पड़ा है।

     

    • वज़न- करीब 400 से 450 किलो
    • दूध उत्पादन (300 दिनों में)- करीब 1600 से 1800 लीटर

     

    गोदावरी:

     

    ये आंध्र प्रदेश की एक नस्ल है। दूध उत्पादन और अच्छे फैट कंटेंट की वजह से ये काफी लोकप्रिय है। रामचंद्रपुरम, भीमावरम और तनुकु जैसे क्षेत्रों में इसे आसानी से देखा जा सकता है। शारीरिक बनावट की बात करें, तो ये काफी सुगठित सी नज़र आती है। हालांकि, इसके सींग छोटे होते हैं।

     

    • वज़न- करीब 400 किलो
    • दूध उत्पादन (305 दिनों में)- करीब 2000 से 2050 लीटर

     

    संबलपुरी

     

    ये नस्ल ओडिशा में पाई जाती है। संबलपुर और बरगढ़ ज़िले में इस नस्ल को बहुतायत में देखा जा सकता है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ के कुछ इलाकों में भी ये नस्ल पाली जाती है। शारीरिक बनावट की बात करें, तो इसका माथा काफी बड़ा होता है और सींग घुमावदार से होते हैं। दूध उत्पादन के मामले में ये काफी अच्छी नस्ल मानी जाती है।

     

    • वज़न- करीब 600 किलो
    • दूध उत्पादन (340 दिनों में)- करीब 2300 से 2700 लीटर

     

    नागपुरी:

     

    इसका नाता महाराष्ट्र से है और इसे अकोला, अमरावती, यवतमाल, वर्धा और नागपुर के आस-पास के क्षेत्रों में आसानी से पाया जा सकता है। इसे ‘बेरारी’ और ‘चंदा’ जैसे नामों से भी जाना जाता है। इसकी खास बात ये है कि ये विदर्भ के कठोर वातावरण को भी आसानी से झेल लेती है।

     

    • वज़न- 400 से 450 किलो
    • दूध उत्पादन- करीब 760 से 1500 लीटर

     

    इसके अतिरिक्त तराई, मंदा और पंढरपुरी जैसी नस्लें भी देश में लोकप्रिय हैं। वातावरण और क्षेत्र विशेष को ध्यान में रखकर इन्हें पाला जा सकता है। 

     

    लागत:

     

    यदि आप बहुत छोटे स्तर पर इस काम को शुरू करना चाहते हैं, तो संभवतः 1 लाख रुपये से भी बात बन जाएगी। लेकिन, बेहतर यही रहेगा कि आप थोड़े अधिक पशुओं के साथ इस काम को शुरू करें। यदि आप ऐसा करते हैं, तो करीब 4 से 5 लाख रुपये तक खर्च करने पड़ सकते हैं।

     

    मुनाफा:

     

    जानकारों की मानें, तो भैंस पालन में मुनाफा अच्छा है। इस काम में करीब 40 प्रतिशत तक का मुनाफा आसानी से कमाया जा सकता है। यदि बेहतर प्रबंधन तकनीक अपनाई जाए, तो मुनाफे का ये आंकड़ा और बढ़ सकता है।

     

    लोन और सब्सिडी:

     

    सरकार पशु पालन और डेयरी उद्योग को लगातार बढ़ावा दे रही है। लिहाज़ा, भैंस पालन के लिए लोन और सब्सिडी हासिल करना पहले के मुकाबले काफी आसान है। नेशनल लाइवस्टॉक मिशन और नाबार्ड के डेयरी डेवलपमेंट स्कीम के तहत आप इसका लाभ ले सकते हैं।

     

    प्रशिक्षण:

     

    भैंस पालन के प्रशिक्षण के लिए आप स्थानीय पशु पालन विभाग से संपर्क कर सकते हैं। कई राज्य सरकारें समय-समय पर प्रशिक्षण शिविर भी आयोजित करती हैं।

     

    ध्यान देने योग्य बातें-

     

    • हर 3 महीने में डीवर्मिंग ज़रूर कराएं
    • वातावरण के अनुरूप ही नस्लों का चुनाव करें
    • पशुओं के आहार पर विशेष ध्यान दें
    • आहार में नमक और मिनरल्स का समावेश करना न भूलें
    • समय-समय पर पशुओं का टीकाकरण कराएं
    • पशु आवास सड़क से 400 से 500 मीटर की दूरी पर ही बनाएं
    • पीने के पानी और बिजली की उचित व्यवस्था करें
    • स्थानीय पशु पालन विभाग से प्रशिक्षण ज़रूर लें

     

    भैंस पालन में हैं क्या संभावनाएं, एक्सपर्ट से जानें

     

    हमें उम्मीद है कि आपको Knitter का यह ब्लॉग पसंद आया होगा। Knitter पर आपको बिज़नेस के अलावा कृषि एवं मशीनीकरण, एजुकेशन और करियर, सरकारी योजनाओं और ग्रामीण विकास जैसे मुद्दों पर भी कई महत्वपूर्ण ब्लॉग्स मिलेंगे। आप इनको पढ़कर अपना ज्ञान बढ़ा सकते हैं और दूसरों को भी इन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। 

     



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