मधुमक्खी पालन में क्या कहता है विज्ञान, जानें यहां पूरी बात

हर मौसम में कैसे करें मधुमक्खी पालन, यहां है पूरी जानकारी

मधुमक्खी पालन कम लागत वाला कुटीर उद्योग बन चुका है। ये उद्योग युवाओं के लिए रोज़गार का माध्यम भी है। अगर इसे सही तकनीक के साथ न किया जाए तो नुकसान हो सकता है।

05 February 2021

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  • कम लागत में ज़्यादा कमाई हर कोई चाहता है, यही वजह है कि मधुमक्खी पालन आज की तारीख में युवाओं के लिए रोज़गार का अच्छा विकल्प साबित हो रहा है। क्योंकि कृषि आधारित इस व्यापार से आप 50 फीसदी तक मुनाफा कमा सकते हैं। 

     

    बिज़नेस कोई भी हो, आपको रखरखाव और प्रबंधन करना बेहद ज़रूरी हो जाता है। बदलता मौसम इंसान के शरीर पर भी असर डालता है। मधुमक्खी पालन में भी मौसम के अनुसार प्रबंधन करना पड़ता है। अगर ज़रा सी चूक हुई तो मधुमक्खियों को अलग-अलग तरह के रोग लग सकते हैं। मधुमक्खी पालन आम तौर पर 100 से 380 सेंटीग्रेड पर उचित रहता है। उचित प्रबंध द्वारा प्रतिकूल परिस्थितियों में इनका बचाव आवश्यक है। 

     

    ज़रूरी है कि हर मौसम में उनका उचित ध्यान रखा जाए। रखरखाव के साथ मधुमक्खी की कार्य करने की क्षमता को हर मौसम में बरकरार रखा जा सकता है। यह मधुमक्खियों को जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली समस्याओं से बचाता है। तो आइए निटर (knitter)के इस ब्लॉग में आपको मौसम के मुताबिक, मधुमक्खियों के प्रबंधन की जानकारी देते हैं।

     

    सबसे पहले बात करेंगे….

     

    ठंड का मौसम

     

    ठंड का मधुमक्खियों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इस मौसम में तापमान 10 से 20 डिग्री के नीचे भी चला जाता है, जिसमें मधुमक्खियों को बचाना बेहद ज़रूरी हो जाता है। क्योंकि इतना कम तापमान मधुमक्खियां नहीं सह पाती हैं। 

     

    ये करना चाहिए- बक्सों को ऐसे स्थान पर रखा जाए, जहां धूप ठीक से पड़ती हो। ठंड से बचने के लिए मधुमक्खियों के बक्सों को बोरी से ढका जा सकता है। प्रवेश द्वार को छोड़कर पूरे बक्से को ढकना चाहिए। उन्हें ढकने के लिए आप घास फूस, बोरी या छप्पर का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। ऐसा करने से बक्से के अंदर का तापमान गर्म रहेगा। इस मौसम में मधुमक्खियों के भोजन की भी व्यवस्था करनी चाहिए। इसके लिए आप 50% पानी में 50% चीनी घोलें और उनके छत्ते में रख दें।

     

    बसंत का मौसम

     

    बसंत ऋतु मधुमक्खियों के लिए सबसे अच्छी मानी जाती है, क्योंकि इस मौसम में पराग और मकरंद उचित मात्रा में उपलब्ध होता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पराग और मकरंद वह पदार्थ है, जो मधुमक्खियां फूलों से प्राप्त करती है। अन्य मौसमों की तुलना में इस मौसम में शहद का उत्पादन भी बढ़ जाता है। 

     

    ये करना चाहिए- इस मौसम में मधुमक्खियों के ढके हुए बक्सों को खोल कर, साफ कर देना चाहिए। इस मौसम में मधुमक्खी पालक को छत्तों की ज्यादा देखरेख करनी चाहिए, क्योंकि बसंत ऋतु में शहद का उत्पादन बढ़ जाता है। 

     

    गर्मियों का मौसम 

     

    गर्मियों के मौसम में मधुमक्खियों की देखरेख बेहद ज़रूरी होती है। कई जगहों पर तापमान 400 डिग्री सेंटीग्रेड तक पहुंच जाता है। इसलिए इस मौसम में ज़्यादा ध्यान रखना होता है। इस मौसम में आप ऐसे स्थान का भी चुनाव कर सकते हैं, जहां जल की पर्याप्त व्यवस्था हो और बरसीम व सूरजमुखी के खेत हों। 

     

    ये करना चाहिए- गर्मी के मौसम में मधुमक्खियों के बक्सों को सफेद रंग से रंग देना चाहिए जिससे बक्सों का तापमान नियंत्रित रहे। बक्से को गर्मी से बचाने के लिए छायादार जगह पर भी रखा जा सकता है, लेकिन ध्यान रखें कि मधुमक्खियों के सुबह से ही सक्रिय होने के लिए यह आवश्यक है कि उन पर सुबह ही सूरज की किरणें पड़ें। इसके अलावा मधुमक्खियों को लू से बचाने के लिए बक्सों को छप्पर से भी ढका जा सकता है। 

     

    बरसात का मौसम 

     

    इस मौसम में मधुमक्खियों को सबसे ज़्यादा खतरा कीटों से होता है। इस मौसम में बचाव के लिए सबसे अधिक बक्सों की सफाई पर ध्यान देना चाहिए। 

     

    ये करना चाहिए- बक्से को ज़मीन से ऊपर स्टैंड पर रखना चाहिए और स्टैंड में पानी से भरे हुए बर्तन रखने चाहिए ताकि कोई भी कीड़े बक्से तक न पहुंच पाएं। पुराने और खराब छत्तों को भी बदल देना चाहिए, क्योंकि सड़े और फफूंदी लगे छत्तों पर कीड़े जल्दी लगते हैं। 

     

    मधुमक्खियों को होने वाले रोग और रोकथाम

     

     

    मधुमक्खी पालन में मौसम की भूमिका को समझें

     

     

    यूरोपियन फॉलब्रूड

     

    यह बीमारी आमतौर पर बिहार, पंंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश में देखी जाती है। इसकी पहचान करना भी अत्यंत कठिन होता है। यह एक जीवाणु रोग है जो मैलिकोकॉकस प्लूटन के कारण होता है। यह मधुमक्खी के लारवे अण्डे से निकलने के बाद  2 से 3 दिन के अंदर ग्रसित हो जाते हैं। यह शुरुआत में हल्के पीले और अंत तक गहरे काले रंग में बदल जाते हैं। 

     

    इलाज- इस बीमारी के इलाज के लिए टैरामाईसीन 250 मि.लि.ग्रा., 750 मि.लि.ग्रा. पानी, एक चम्मच शहद या फिर चीनी का घोल बनाकर प्रभावित मधुमक्खियों पर छिड़काव करें। 8-10 दिन के अंतराल पर दोबारा करें। 

     

    अमेरिकन फॉलब्रूड

     

    यह एक संक्रामक रोग है, जो बैक्टीरिया बेसिलस लार के कारण होता है। यह रोग तब होता है जब लार्वा और प्यूपा विकसित हो रहे होते हैं। गर्मी के मौसम में यह बीमारी अधिक होती है। 

     

    इलाज- इस बीमारी के उपचार के लिए इस्तेमाल की जाने वाली रोकथाम विधि यूरोपीय फॉलब्रूड में समान होगी, लेकिन अमेरिकी फॉलब्रूड को पूरी तरह से समाप्त करना मुश्किल है। ऐसी स्थिति में, केवल एक ही रास्ता बचता है कि कॉलोनियों को अलग करना या संक्रमित भागों का पता लगाना और उन्हें नष्ट करना। 

     

    एकेराईन 

     

    यह बीमारी अगर मधुमक्खियों में होती है तो वह बक्से में आस-पास रेंगती हुई या उनके पंख खड़े किए हुए दिखाई देते हैं। एकेराईन बीमारी होने पर पीड़ित मधुमक्खी उड़ने में भी सक्षम नहीं हो पाती है। 

     

    इलाज- इस बीमारी को नियंत्रित करने के लिए थाइमोल का इस्तेमाल किया जा सकता है। यह एक प्रकार का चूर्ण होता है, इसे बक्से पर डाला जाता है। दूसरा आप फार्मिक एसिड का भी प्रयोग कर सकते हैं। इसकी 5 से 6 मिली मात्रा प्रति बक्से में इस्तेमाल की जाती है। फार्मिक एसिड का प्रयोग शाम के समय करना होता है। 

     

    नोसेमा रोग

     

    जिन मधुमक्खियों को नोसेमा रोग हुआ होता है, वह रेंगने लगती है और अलग समूह बनाने लगती है। ऐसी मधुमक्खियां फूलों से केवल मकरंग इकट्ठा करती हैं और पीड़ित रानी केवल नर को ही जन्म देती है। इन सभी प्रतिक्रियाओं से नोसिमा रोग की पहचान की जा सकती है।

     

    इलाज- इस बीमारी के उपचार के लिए कवाइकोलो हेक्साइल अमोनियम प्यूमिगिल एक प्रभावी दवा है। इसके अलावा फ्यूमिगिलिन-बी की 0-5 से 3 मिलीग्राम मात्रा प्रति 100 मिली घोल के साथ मिलाकर देनी चाहिए। 

     

    वरोआ दीमक 

     

    मधुमक्खियों की सबसे सामान्य बीमारियों में से एक वरोआ दीमक है। यह मधुमक्खियों का खून पीती हैं, जिस कारण मधुमक्खियां कमजोर हो जाती है। यह सामान्यतः वयस्क मधुमक्खियों, लार्वा और प्यूपा को प्रभावित करती हैं। 

     

    इलाज- फार्मिक एसिड की 5 मि.लि. रोजाना फर्श में लगाने से इस पर नियंत्रण पाया जा सकता है। इसके अन्य उपाय इकेरमाईट के तरह ही हैं।

    हम आशा करते हैं कि मधुमक्खी पालन पर हमारा यह ब्लॉग आपको पसंद आया होगा। यदि आप हमारे अन्य ब्लॉग पढ़ना चाहते हैं, तो आप Knitter पर जाकर उन्हें पढ़ सकते हैं। 

     

     

    मधुमक्खी पालन में मौसम की भूमिका को समझें

     

     

    ✍️  लेखक- नितिन गुप्ता





     

     

     



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