जानिए, पशुओं के प्रमुख रोग और उनका उपचार

पशुओं के प्रमुख संक्रामक रोग, लक्षण और बचाव

पशुओं में अनेक प्रकार की बीमारियां होती हैं, जिससे पशुपालकों को काफी हानि होती है। आइए जानें, पशुओं में लगने वाले रोग और उनके बचाव।

07 March 2021

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  • इंसान को रोग लग जाए, तो सीधे डॉक्टर, हकीम या वैद्य के पास पहुंच जाता है। लेकिन, पशुओं के पास ये विकल्प नहीं होता। यदि उन्हें कोई तकलीफ या पीड़ा होती भी है, तो भी वो बेज़ुबान ज़्यादा कुछ नहीं कर पाते। इसलिए ज़रूरी है कि जिस तरह हम अपना ख्याल रखते हैं, हम अपने पशुओं का भी ख्याल रखें। 

     

    आज Knitter का ये ब्लॉग आपको पशुओं में होने वाले रोग और उन रोगों से बचने के उपायों पर जानकारियां प्रदान करेगा। इसमें हम बताएंगे कि पशुपालन के दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए। सबसे पहले बात उन लक्षणों की, जिनके बूते आप पशुओं की सेहत का अंदाज़ा लगा सकते हैं। 

     

    पशुओं की सेहत का हाल बताते लक्षण

     

    • अचानक आहार कम होना अथवा भूख न लगना
    • शरीर का तापमान अचानक बढ़ना या कम होना
    • पशुओं के नथुने सूख जाना या नाक से पानी निकलना 
    • सांस की गति तेज होना या सांस फूलना
    • मल सामान्य न होना या मूत्र का रंग बदल जाना
    • आंख लाल होना या आंख से पानी निकलना
    • पशु सुस्त दिखाई देना
    • पशु के कान नीचे की तरफ लटकना
    • पशुओं के शरीर पर चोट का निशान

     

    जानिए, पशुओं के प्रमुख रोग और उनका उपचार

     

    अब बात पशुओं में लगने वाले रोग और उसके इलाज 

     

    मुंहपका-खुरपका

     

    यह एक संक्रामक रोग है। यह बीमारी पशुओं में बहुत तेजी से फैलती है। मुंहपका से ग्रसित पशुओं के जीभ और होंठ पर छाले पड़ जाते हैं। इसी तरह खुरपका से ग्रसित पशुओं के खुरों में कीड़े पड़ जाते हैं और पशु लंगड़ाकर चलने लगते हैं।  

     

    दरअसल, खुरपका-मुंहपका एक ऐसी बीमारी है जो एक बार हो जाने पर पशु पुनः उसी तरह स्वस्थ नहीं हो पाता है। यह बीमारी पशुओं को न हो, इसके लिए पशुओं को एफएमडी वैक्सीन लगवा लेना चाहिए। इसके टीके बरसात के पहले लगवा लेना चाहिए। ठंड के दिनों में भी एक बार उसका टीका लगवा लेना चाहिए। 

     

    गलाघोंटू

     

    यह बहुत ही भयानक रोग है। इस रोग से पशुओं की मौत भी हो जाती है। इस रोग से पीड़ित पशु के गर्दन में सूजन और अकड़न आ जाती है। पशु पीछे की ओर मुंह करके लेट जाता है। उसकी स्थिति असहाय हो जाती है। इस रोग से ग्रसित पशुओं की जल्दी पहचान भी नहीं हो पाती है। इसका एक ही इलाज है। वो यह कि पशुपालक पशुओं को जन्म के 6 महीने के अंदर एच.एस. वैक्सीन लगवा लें।  

     

    लगड़िया रोग

     

    इस रोग से ग्रसित पशुओं के पिछले भाग  पर सूजन आ जाती है। इससे चरचर की आवाज़ आती है। इससे पशुओं को उठने-बैठने में दिक्कत होने लगती है। जब पशु एक जगह बैठ जाता है तो वहां रगड़ से घाव हो जाता है।यह भी बहुत खतरनाक बीमारी है। इस रोग से बचाव के लिए पशु के जन्म 6 माह बाद पॉली वैलेंट का वैक्सीन लगाया जाता है। इससे पशु इस रोग से सुरक्षित हो जाता है। 

     

    संक्रामक गर्भपात

     

    यह रोग गाय और भैस में ज़्यादा होता है। इस रोग में अंतिम 6 महीने में गर्भपात हो जाता है। गर्भपात के बाद जेर आसानी से नहीं निकलता है। यह संक्रामक की बीमारी है। इस अवस्था में पशु का कृत्रिम गर्भाधान कराना चाहिए। इसके लिए ब्रुसेला का टीका लगवाना चाहिए।

     

    पीपीआर 

     

    यह रोग ज़्यादातर भेड़ और बकरियों में होता है। यह बीमारी विषाणु से होती है। इससे भेड़-बकरियों की मृत्यु हो जाती है। इसलिए पीपीआर प्लेग के नाम से भी जाना जाता है। शुरुआती दौर में पशु को बुखार, जुकाम व डायरिया की शिकायत होती है। इसके बाद नाक व थूथन में छाले पड़ना शुरू हो जाते हैं। पशु खाना-पीना छोड़ देते हैं। देर से इलाज करने पर कोई दवा कारगर साबित नहीं होती। इसके लिए पीपीआर का वैक्सीन 4 महीने के अंदर लगवा देना चाहिए। 


     

    थनैला रोग

     

    थनैला रोग दूध देने वाले जानवरों को होता है। यह भी एक गंभीर बीमारी है। यह बीमारी दो प्रकार की होती है। 

     

    • कम अवधि की
    • ज़्यादा अवधि की


     

    कम अवधि वाले थनैला रोग की पहचान जल्दी हो जाती है, लेकिन अधिक अवधि वाले रोग की पहचान जल्दी नहीं हो पाती है। इसमें थनों में सूजन हो जाती है, जिससे थन कठोर हो जाता है। इस रोग से ग्रसित पशु के थन में दर्द होता है और मवाद भी आता है। दूध पीलापन लिए हुए लच्छेदार रूप में आता है। कभी-कभी दूध में खून भी आने लगता है। 

     

    लक्षण देर में आने की वजह से पशुपालक इसका इलाज़ सही ढंग से नहीं करा पाते हैं। अतः पशुपालकों को इससे बचने के लिए सबसे ज़रूरी है- सावधानी। 

     

    इसकेलिए विशेष तौर पर आवास स्थल का साफ-सफाई पर ध्यान देना चाहिए। दूध दुहते समय बछड़े या बछड़ी को नाद से अलग कर दें और उन्हें पानी पीला दें, जिससे उनके मुंह से भूसे या दाने साफ हो जाए। दूध दुहने के बाद लाल दवा (पोटेशियम परमैंगनेट) लगा दें। 

     

    रोगों से बचने के लिए आसान टिप्स

     

    • पशुओं को संतुलित आहार दें
    • दुधारू जानवरों को 40-50 ग्राम मिनरल्स ज़रूर दें  
    • अपने क्षेत्र के अनुशंसित नस्लों का चयन करें 
    • पशुओं का टीकाकरण ज़रूर कराएं 
    • पशुओं को साफ पानी ही पिलाएं
    • आवास स्थल की नियमित रूप से साफ-सफाई करते रहें
    • कमजोर मवेशियों के स्वास्थ्य और आहार पर विशेष ध्यान दें

     

    जानिए, पशुओं के प्रमुख रोग और उनका उपचार

     

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    ✍️

    लेखक- दीपक गुप्ता



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