कृषि विपणन : किसानों के लिए है लाभ का सौदा

कृषि विपणन : किसानों के लिए है लाभ का सौदा

आधुनिक कृषि विपणन प्रणाली से ही किसानों को उनके उपज का सही दाम मिल सकता है। इस कड़ी में ई-नाम (E-NAM) एक अच्छी पहल है।

19 August 2020

  • 10270 Views
  • 8 Min Read

  • भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक है। भारत की आधी से ज्यादा आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर करती है। यह ग्रामीण लोगों के कल्याण, उनकी समृद्धि और रोज़गार को भी बड़े पैमाने पर प्रभावित करती है लेकिन कृषि का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ कृषि उत्पादों का विपणन है।

     

    इस ब्लॉग को शुरू करने से पहले आइए जानें, कृषि विपणन क्या है?

     

    कृषि विपणन शब्द से तात्पर्य उन समस्त विपणन कार्य और सेवाओं से है जिनके द्वारा कृषि वस्तुएं उत्पादक से अंतिम उपभोक्ता तक पहुँचती हैं। इस प्रक्रिया में कृषि मंडी एक ऐसा स्थान है जहाँ पर किसान अपना पूरा उत्पाद बेचता है।

     

    आपको बता दें,  कृषि विपणन (Agricultural marketing) के अंतर्गत वे सभी सेवाएँ आती हैं जो कृषि उपज को खेतों से लेकर उपभोक्ताओं तक पहुँचाने में करनी पड़ती है। जैसे कि- भंडारण, परिवहन, बिक्री, स्वामित्व परिवर्तन, वित्त, विज्ञापन इत्यादि।

     

    आईए अब समझते हैं कि बाजार क्या है और कृषि बाजार किसे कहते हैं?

     

    बाजार जहाँ पर वस्तुओं और सेवाओं को खरीदा और बेचा जाता है उसे बाजार कहते हैं। जैसे- सराफा बाजार में सोने-चाँदी की खरीद व बिक्री होती है, तथा वस्त्र बाजार में वस्त्रों की खरीद व बिक्री होती है। 

     

    इसी प्रकार जहाँ कृषि उत्पादों की खरीद व बिक्री होती है। उसे कृषि बाजार कहते हैं। जैसा कि हम सभी जानते हैं किसान अपनी कृषि उपज को बिक्री के लिए इन्हीं मंडी या बाजार में ले जाते हैं। 

     

    भारत में कृषि विपणन

    भारत में कृषि विपणन का इतिहास भी काफी पुराना है। प्राचीन समय में किसान अपनी उत्पाद को ग्रामीण इलाकों के हाट बाजारों में बेचा करते थे। वर्तमान समय में कृषि विपणन भी धीरे-धीरे नई तकनीकों के साथ लैस हो रही है। जिसमें नया नाम है- ई-नाम(e-NAM) जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे। 

     

    भारत में कृषि विपणन के स्वरूप

    आजादी से पहले, भारत में कृषि बाजार परंपरागत तरीके से चलते थे। कोई अन्य विक्लप न होने के कारण, किसान अपनी उपज को हाट, बाजारों और बिचौलियों को बेचने के लिए मजबूर थे। मंडियों में व्यापारियों के एकाधिकार के कारण किसानों को हानि उठानी पड़ती थी। 

     

    आगे हम कृषि बाजार के निम्नलिखित स्वरूपों पर चर्चा करेंगें 

     

    परम्परागत स्वरूप

    पारंपरिक प्रणाली भारतीय किसानों के बीच प्रचलित है, जिसके अंतर्गत असंगठित बाजार जिसमें साप्ताहिक हाट बाजार, धार्मिक त्योहार पर आयोजित होने वाले मेले इत्यादि शामिल हैं।

     

    स्थानीय ब्रिक्री

    स्थानीय बिक्री का आशय स्थानीय या आस-पास के बाजारों में उपज की बिक्री से है। इस प्रकार के बाजारों में किसान पास के कस्बों या नगरों में अपनी उपज- गेंहू, चावल, ज्वार आदि को हाट या बाजार में बेचते हैं और नकद मुद्रा प्राप्त कर अपनी आवश्यकतों को पूरा करते हैं। लेकिन इस प्रकार के बाजारों में किसानों को अपनी उपज का सही मूल्य नहीं मिल पाता है।

     

    मध्यस्थ व्यापारी 

    मध्यस्थ व्यापारी वे होते हैं जो सामान्यतः कंपनी या बड़ी संस्थाओं की ओर से लाइसेंस प्राप्त व्यापारी होते हैं। इन व्यापारियों की खरीदी में सक्रिय भागीदारी होती है। फसल कटाई के बाद प्रत्येक मध्यस्थ व्यापारी तुरन्त किसानों के पास पहुंचता है क्योंकि इस समय किसानों को उत्पाद के विक्रय से उचित भाव नहीं मिलता है। जिसका फायदा ये मध्यस्थ व्यापारी उठाते हैं। 

     

    दलाल

    कृषि विपणन में दलाल एक प्रकार से एजेंट होते हैं, जो क्रेता और किसानों के मध्य उपज के सम्बंध में अनुबंध कराते हैं। दलाल स्वयं अपने नाम से किसी प्रकार का अनुबंध नहीं करते हैं, न ही किसी प्रकार से उत्तरदायी होते हैं। 

     

    कमीशन एजेंट

    कमीशन एजेंट मंडी क्षेत्र के बाहर विक्रय के लिए आनी वाली उपज को खरीदकर प्रमुख व्यापारी को माल उपलब्ध करवाते हैं। कमीशन एजेंट किसानों की कीमतों की सही जानकारी नहीं होने का लाभ उठाते हुए उनसे खाद्यान्न कम कीमत में खरीद लेते हैं। इससे उन्हें कमीशन के रूप में ज्यादा लाभ प्राप्त होता है। 

     

    आधुनिक स्वरूप

     

    नियमित मंडियां

    बाजार में व्यापारियों द्वारा लूट पर नियंत्रण रखने के लिए भारत सरकार देशभर में नियमित कृषि बाजार की स्थापना कर रही है। जानकारी के लिए बता दें कि कृषि उत्पाद की बिक्री के लिए बनाए गए बाजार को नियमित मंडी कहा जाता है। नियमित मंडियां किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य दिलाने में एक कारगर कदम है। इसके माध्यम से किसानों को उनके उपज का सही मूल्य मिल पाता है।

     

    यहां यह भी बताना जरूरी है कि वर्तमान में कृषि बाजारों का विनियमन प्रत्येक राज्यों के कृषि उत्पाद विपणन अधिनियम के माध्यम से किया जाता है। जिसे कृषि उत्पादन बाजार समिति अधिनियम मंडी के नाम से जाना जाता है। 

     

    राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम)

    मंडी की समस्याओं को दूर करने के लिए वर्ष 2014 में सरकार द्वारा नई योजनाएँ शुरू की गई जिसमें मंडी की स्थिति को सुधारने के लिए ई-नाम पोर्टल की शुरुआत की गई है।

     

    यह एक इलेक्ट्रॉनिक कृषि पोर्टल है जो पूरे भारत में मौजूद कृषि उत्पाद विपणन समिति को एक नेटवर्क में जोड़ने का काम करती है। जो किसी भी राज्य में मौजूद कृषि बाजार को एक विशेष सॉफ्टवेयर की मदद से जोड़ता है। इसमें कोई भी मंडी बिना किसी चार्ज के शामिल हो सकते हैं। 

     

    ई-नाम पोर्टल का उद्देश्य

    इस पोर्टल का मुख्य उद्देश्य कृषि उत्पादों को एक एकीकृत बाजार उपलब्ध करवाना है। ई-नाम के द्वारा सभी कृषि विपणन समितियों द्वारा लिए गए सभी फैसलों को एक ही जगह पर उपलब्ध कराया जाता है। इसमें कृषि उत्पादों के संबंध में खरीदी और बेची जाने वाली वस्तु की जानकारी, व्यापार में दिए गए ऑफर और आने वाली वस्तुओं की जानकारी और उनकी कीमत के संबंध में जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। 

     

    इसके अतिरिक्त सभी राज्यों में उपस्थित बाजारों में बिना उपस्थिति के व्यापारियों, किसानों और एजेंटों को लाइसेंस उपलब्ध करवाना है। जिसके जरिए किसान केवल एक लाइसेंस  से ही अन्य राज्यों की मंडियों में व्यापार करने में सक्षम होगा।

     

    अधिक जानकारी के लिए आप राष्ट्रीय कृषि बाजार के वेबसाइट https://enam.gov.in/web/ पर विजिट कर सकते हैं। 

     

    भारत में कृषि विपणन की समस्याएँ

     

    कृषि विपणन (Agriculture Marketing)

     

    भारत में विपणन सुधार की प्रक्रिया में है, लेकिन अभी भी कुछ कमियाँ हैं-

     

    भंडारण क्षमता में कमी

    भारत में अभी भंडारण की उचित व्यवस्था नहीं है जिससे किसान अपनी उपज को ज्यादा समय तक संग्रह नहीं कर पाते हैं। जिससे उन्हें अपनी उपज को जल्दी बेचना पड़ता है परिणामस्वरूप किसानों को बाजार से अपने फसलों की उचित कीमत नहीं मिल पाती।

     

    परिवहन की समस्या

    भारत में अभी भी कई गाँव ऐसे है जो दुर्भाग्य से सड़कों से नहीं जुड़ पाएं हैं । गाँवों का संपर्क मुख्य सड़कों से नहीं है। इससे कृषि उपज को बाजार तक ले जाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

     

    मंडियों की अपर्याप्त संख्या

    एक आँकड़े के अनुसार भारत में 454 वर्ग किलोमीटर पर एक मंडी है जबकि राष्ट्रीय किसान आयोग के अनुसार किसी भी गाँव के 5 किलोमीटर की दायरे में एक मंडी होनी चाहिए।

     

    मंडियों में भ्रष्टाचार का बोलबाला

    मंडियों में लगने वाले विभिन्न प्रकार के कर और शुल्क- विपणन शुल्क, ग्रामीण विकास शुल्क, निराश्रित शुल्क, क्रय शुल्क, जीएसटी आदि के नाम पर भ्रष्टाचार की शिकायत आम है। मंडियों में बिचौलियों द्वारा किए जाने वाले विभिन्न प्रकार के शोषण-कमीशन, ढुलाई,पल्लेदारी आदि के नाम पर किसानों को परेशान किया जाता है। मंडियाँ गाँवों से दूर हैं जहाँ भंडारण की व्यवस्था नहीं है। इसलिए उनको पर्याप्त कीमत नहीं मिल पाती है। इसके अलावा बिचैलिए या दलाल उनसे अधिक अंश लेते हैं।

     

    शिक्षा और सूचना की कमी

    शिक्षा की कमी व टेक्नोलॉजी के अभाव के कारण किसानों को बाजार संबंधी सूचनाएं पर्याप्त रूप से नहीं मिल पाती है। जिससे वह कृषि मंडियों से नहीं जुड़ पाते। 

     

    कृषि विपणन की समस्याएं

     

    संक्षेप में कहें तो आज भी भारत में कृषि विपणन विकट परिस्थिति में खड़ा है। इसके लिए किसानों को उनके आवश्यकतानुसार सुविधाएँ दी जानी चाहिए जिससे वे अपनी उपज को सही मूल्य पर बेच सकें।



    यह भी पढ़ें



    कृषि की अन्य ब्लॉग