कृषि के परम्परागत तकनीक को छोड़िए आधुनिक मशीनों से नाता जोड़ि

कृषि मशीनीकरण : बदल रही है खेती की तस्वीर

बदलते समय के साथ कृषि भी बदली है। अब खेत की जुताई, बुवाई और फसल की कटाई के लिए आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल होता है। जिससे कार्य कम समय और कम मेहनत में हो जाता है।

20 August 2020

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  • आज तकनीकी और आधुनिक मशीनों के उपयोग से खेती का स्वरूप बदल रहा है। मशीनरीकरण से पहले किसान अपने खेतों में पुराने उपकरणों का ही उपयोग किया करते थे। लेकिन अब खेती के कई कामों के लिए मशीनों का प्रयोग हो रहा है, जिससे खेती के काम कम समय और कम मेहनत में हो जाता है। मशीनरीकरण से आर्थिक बचत होने के साथ ही साथ उत्पादन भी बढ़ता है।

     

    एक प्रगतिशील किसान के लिए जरूरी है कि वह कृषि मशीनरीकरण को समझें ताकि आने वाले समय में वे अपने खेतों में इन मशीनों का उपयोग कर सकें।

     

    तो आइए इस ब्लॉग में जानते हैं, मशीनरीकरण से होने वाले लाभ और हानि के बारे में।

     

    मशीनीकरण किसे कहते है?

    आसान भाषा में कहें तो कृषि के मशीनीकरण का अर्थ परम्परागत तकनीक के स्थान पर आधुनिक मशीन का प्रयोग है। 

     

    दूसरे शब्दों में कहें तो कृषि में मशीनीकरण का अर्थ बैलों, घोड़ों एवं पशुओं या मानवीय श्रम के स्थान पर आधुनिक मशीनों का उपयोग है। 

     

    जैसे- खेत में हल चलाने का कार्य ट्रैक्टरों से होना, बुवाई व उर्वरक डालने का काम ड्रिल मशीन द्वारा किया जाना। इसी प्रकार फसल काटने का कार्य हार्वेस्टर व थ्रेसर से करना, सिंचाई कुओं एवं बैलों से न करके पम्प सेटों से करना आदि ही कृषि का मशीनीकरण है। 

     

    कृषि मशीनीकरण न केवल बीज, उर्वरक, पौध संरक्षण, रसायन और पानी सिंचाई के लिए के रूप में विभिन्न कार्यों के कुशल उपयोग के लिए सक्षम बनाता है बल्कि यह एक आकर्षक और आधुनिक खेती बनाकर गरीबी उन्मूलन में मदद करती है। 

     

    भारत में कृषि एवं मशीनीकरण

    भारत सरकार भी खेती में मशीनीकरण के उपयोग को बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है। परंपरागत कृषि उपकरणों के स्थान पर नए और विकसित कृषि मशीनों के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए कई नीतियां और कार्यक्रम बनाए गए हैं। जिनकी सहायता से किसान ट्रैक्टर, बिजली से चलने वाले जुताई यंत्र, हारवेस्टर्स जैसी नई मशीनों का उपयोग खेती में कर पा रहे हैं। इन यंत्रों को खरीदने में किसानों को सक्षम बनाने, मशीनों को किराए पर उपलब्ध कराने कृषि उपकरण केंद्र (CHC) स्थापित किए जा रहे हैं। जिसकी चर्चा हम अगले ब्लॉग में करेंगे। 

     

    भारत में मशीनीकरण का इतिहास

    भारत में मशीनीकरण का इतिहास बहुत पुराना है। जैसा कि हम सभी जानते हैं, प्राचीन समय में लोहार और बढ़ई कृषि उपकरणों का निर्माण करते थे। प्राचीन समय में अन्य देशों में घोड़े आधारित उपकरणों का इस्तेमाल होता था, जबकि भारत में बैल आधारित उपकरणों को जगह दी गई। इन उपकरणों में हल, जुंआठ, हरिषा, परिहत आदि शामिल हैं। 

     

    आजादी के बाद भारत में मशीनीकरण कृषि की काफी प्रगति हुई है। 1960 के दशक में हरित क्रांति के बाद मशीनीकरण की आवश्यकता को विशेष रूप से महसूस किया गया। जिसके बाद किसानों ने कृषि आधारित मशीनों को अपनाना शुरू किया। 

     

    हरित क्रांति के दौरान सबसे अधिक चर्चा में जो मशीन आई वह था ट्रैक्टर। ट्रैक्टर का उपयोग होने से खेती का पूरा पैटर्न ही बदल गया। आपको बता दें, 1961 में भारत में ट्रैक्टरों की संख्या 31,000 थी जो 1966 में बढ़कर 2,52,000 हो गई थी। जो वर्तमान में 5 मिलियन से ज्यादा हो गई है। 

     

    इसके अलावा सिंचाई और उर्वरक की आधुनिक जानकारी ने किसानों का ध्यान कृषि मशीनीकरण की तरफ आकर्षित किया। किसानों ने ट्रैक्टर के साथ थ्रेसर, ब्लोवर, पुआव छलनी आदि को अपनाया। जिसके बाद धीरे-धीरे अन्य कृषि मशीनों की भी मांग बढ़ने लगी जो आज भी अनवरत जारी है। 

     

    कृषि में मशीनीकरण के लाभ

     

    कृषि में मशीनीकरण के निम्नलिखित लाभ है। 

     

    उत्पादन में वृद्धि

    जैसा कि हम सभी जानते हैं कि कृषि में मशीनों के प्रयोग करने से कृषि कार्यों की गति बढ़ जाती है, मानवीय शक्ति का प्रयोग कम हो जाता है। मशीनीकरण के फलस्वरुप गहन व सघन जुताई करना सम्भव हो पाता है। इसके कारण प्रति हेक्टेयर उत्पादन में वृद्धि हो जाती है।

     

    लागत में कमी 

    राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद के नमूना सर्वेक्षण के अनुसार ट्रैक्टर से खेती करने की प्रति एकड़ लागत 100 रुपए आती है जबकि वही कार्य यदि बैलों की सहायता से किया जाता है तो लागत 160 रुपये आती है। इस प्रकार मशीनीकरण कृषि उत्पादन लागत कम करने में सहायक है।

     

    समय की बचत

    कृषि यंत्रों का प्रयोग करने से किसान अपना कार्य शीघ्रता से कर लेते हैं और समय भी बच जाता है। जो कार्य एक जोड़ी हल व बैल से पूरे दिन भर किया जाता है उसे एक ट्रैक्टर द्वारा एक घण्टे से भी कम समय में कर लिया जाता है।

     

    व्यापारिक कृषि को प्रोत्साहन

    कृषि यन्त्रों के प्रयोग से व्यापारिक कृषि को प्रोत्साहन मिला है। कृषि आधारित उद्योगों को कच्चा माल पर्याप्त मात्रा में कृषि द्वारा उपलब्ध कराया जा सकता है। भूमि के बहुत बड़े-बड़े खेत कम समय व कम लागत में जोते जा सकते हैं, जिसके फलस्वरुप बड़ी मात्रा में उत्पादन मंडी तक पहुँचाया जा सकता है।

     

    खाद्यान्न फसलों, के साथ-साथ व्यापारिक फसलों को भी प्रोत्साहन मिला है। कृषि उपज की बिक्री न केवल अपने देश के बाजारों में बल्कि विदेशी बाजारों तक भी होती है।

     

    भारी कार्यों में सुगमता

    कृषि यंत्रों की सहायता से भारी कार्य जैसे ऊँची-नीची व पथरीली भूमि, बंजर भूमि तथा टीलों को आसानी से साफ व समतल कर कृषि योग्य बनाया जा सकता है। इस तरह कृषि योग्य भूमि में वृद्धि मशीनों द्वारा किया जा सकता है।

     

    उपभोक्ताओं को लाभ 

    कृषि में यन्त्रीकरण से उत्पादन लागत कम आती है जिसके परिणामस्वरुप उपभोक्ताओं को कृषि उपजों का मूल्य कम देना पड़ता है।

     

    परती भूमि का उपयोग

    गहरी जुताई करने, भू-संरक्षण, भूमि सुधार, गहरे पानी वाले क्षेत्रों से पानी उठाने के कार्य यंत्रों की सहायता से सरलतापूर्वक किए जा सकते हैं।

     

    ऊर्जा, बीज व उवर्रक की बचत

    एक अध्ययन के अनुसार बीज बोने वाली ड्रिल मशीन से न केवल ऊर्जा की बचत होती है बल्कि 20% बीज की भी बचत होती है और 15 प्रतिशत तक उत्पादन बढ़ाने में सहायक होती है। इससे उर्वरक व बीज का प्रयोग अधिक प्रभावशाली ढंग से हो पाता है।

     

    आय में वृद्धि

    जैसा कि आप जानते हैं कि कृषि मशीनों की सहायता से किसान कम समय व कम लागत में अधिक कृषि उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं, इसके फलस्वरुप किसानों की आय में वृद्धि होती हैं।

     

    मशीनीकरण से हानि

    मशीनीकरण के बढ़ते दौर का खामियाजा सबसे अधिक मजदूरों और किसानों को भुगतना पड़ रहा है। आज के दौर में कृषि जगत में मशीनीकरण से कुछ हानियाँ भी जो निम्नलिखित हैं।

     

    बेरोजगारी में वृद्धि

    जैसा कि आप जानते है, भारत की आबादी बहुत अधिक है और प्रतिवर्ष इसमें वृद्धि होती जा रही है। चूंकि देश में अभी भी 60 प्रतिशत जनसंख्या रोजगार के लिए प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रुप से कृषि पर ही निर्भर रहती है। अत: कृषि में बड़े पैमाने पर मशीनीकरण होने से बेरोजगारी को बढ़ावा मिलेगा। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कृषि मशीनीकरण बहुत अधिक उपयुक्त नहीं है। 

     

    जैसे- अब धान व गेहूं की फसल की कटनी का काम मजदूरों से नहीं करा कर हार्वेस्टरों से किया जाने लगा है। जिसकी वजह से कृषि मजदूरों को काम नहीं मिलता जिससे मजदूरों के परिजनों के सामने भुखमरी की नौबत आ पड़ी है। अब लोगों के समक्ष दो जून की रोटी की सुविधा जुटाना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।

     

    भूमिहीन श्रमिकों की संख्या में वृद्धि

    कृषि में मशीनीकरण अपनाने से बड़े किसान, लघु किसानों की भूमि क्रय कर लेते हैं जिससे बड़े किसानों की जोत का आकार बड़ा हो जाता है इसलिए भूमिहीन श्रमिकों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही हैं।

     

    ईधन की समस्या

    कृषि कार्य में जैसे- ट्रैक्टर, ट्यूबवेल, थ्रेसर आदि चलाने के लिए पेट्रोल, डीजल व बिजली की आवश्यक्ता होती है। इसकी आपूर्ति कम होने तथा कीमत अधिक होने से सामान्य कृषक की क्रय शक्ति के बाहर हो जाती है। इसके अतिरिक्त अधिकांश राज्यों में बिजली की आपूर्ति 24 घण्टे नहीं है, इसलिए किसानों को कृषि मशीनों के प्रयोग में बाधा आने लगती है और मशीनें बेकार पड़ी रहती है।

     

    कृषि में मशीनीकरण की चुनौतियाँ

    अगर आकड़ों पर एक नजर डालें तो अभी भी भारत में कृषि का मशीनीकरण अन्य देशों की अपेक्षा काफी कम है। देश के कुछ हिस्सों में कृषि के बड़े पैमाने पर मशीनीकरण के बावजूद, अधिकांश कृषि कार्य सरल और पारंपरिक साधनों जैसे- लकड़ी के हल, दरांती इत्यादि उपकरणों का उपयोग किया जाता है।

     

    जुताई, बुवाई, सिंचाई, पतलेपन और छँटाई, निराई, कटाई थ्रेसिंग और फसलों के परिवहन में मशीनों का बहुत कम या कोई उपयोग नहीं किया जाता है। यह विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के मामले में है। इसके परिणामस्वरूप मानव श्रम का भारी अपव्यय होता है और प्रति व्यक्ति श्रम शक्ति में कम पैदावार होती है।

     

    कृषि कार्यों को मशीनीकरण करने की तत्काल आवश्यकता है ताकि श्रम बल की बर्बादी से बचा जा सके और खेती को सुविधाजनक और कुशल बनाया जा सके। कृषि औजार मशीनरी कुशल और समय पर कृषि कार्यों के लिए एक महत्वपूर्ण इनपुट है,  होती हैं और जिससे उत्पादन बढ़ता है।

     

    संक्षेप में कहें तो कृषि में मशीनीकरण समय की एक बहुत बड़ी मांग है। मशीनीकरण को  भारतीय नज़रिए से देखा जाए तो खेती-किसानी को ‘घाटे के सौदे’ जैसे संबोधन से उबारा जा सकता है। इसीलिए कृषि में मशीनीकरण का उपयोग बेहद जरूरी है।

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