मोतियों की खेती (Pearl Farming) पर डालें एक नज़र

जानें, मोतियों की खेती (Pearl Farming) के बारे में

लगातार बढ़ती मांग के बीच भारत में मोतियों की खेती (Pearl Farming)पर ज़ोर दिया जा रहा है। इससे किसानों को कई गुना अधिक लाभ मिल रहा है। आइए, इस पर नज़र डालते हैं।

29 October 2020

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  • भारत में मोतियों की खेती (Pearl Farming) काफी लोकप्रिय है। इसमें लागत काफी कम आती है और मुनाफ़ा कई गुना अधिक होता है। शायद यही वजह है कि बीते कुछ वर्षों में हमारे किसान भाई मोतियों की खेती की ओर आकर्षित हुए हैं। कई किसान तो ऐसे हैं, जो इससे लाखों रुपए कमा रहे हैं। आज इस ब्लॉग के ज़रिए हम मोतियों की खेती और उससे होने वाले फ़ायदों पर ही बात करेंगे।  लेकिन आगे बढ़ने से पहले ये जान लेते हैं कि आख़िर ये मोतियों की खेती है क्या?

     

    क्या है मोतियों की खेती:

     

    मोतियों की खेती (Pearl Farming) ऐक्वाकल्चर व्यवसाय का हिस्सा है। खास बात ये है कि इसे मछली पालन या उससे जुड़े किसी अन्य व्यवसाय के साथ भी किया जा सकता है। यह लाभ की दृष्टि से भी किसानों के लिए एक अच्छा विकल्प है। 

     

    यहां आपको यह बताना भी ज़रूरी है कि मोतियों का उत्पादन एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसमें सीप की भूमिका सबसे अहम होती है। मोतियों की खेती में इम्प्लैन्टेशन और ग्राफ्टिंग की प्रक्रिया के बाद सीपों को तालाब में करीब एक मीटर की गहराई में लटकाया जाता है, जो प्राकृतिक चारे पर निर्भर होते हैं। करीब 8 से 10 महीने में इन सीपों में मोती तैयार हो जाते हैं। 

     

    यहां आपको यह बताना भी आवश्यक है कि मोतियों की खेती बिना ट्रेनिंग के नहीं की जा सकती है। इसकी शुरुआत के पूर्व किसान का इसमें पारंगत होना ज़रूरी है। हालांकि अच्छी बात ये है कि हमारे देश में ऐसे कई ट्रेनिंग सेंटर्स हैं, जहां मोतियों की खेती करने की ट्रेनिंग दी जाती है। भुवनेश्‍वर का सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ फ्रेश वॉटर ऐक्वाकल्चर भी इन्हीं में से एक है, जहां मोतियों की खेती पर ट्रेनिंग दी जाती है। 


     

    मोतियों का इतिहास

     

    मोतियों का इतिहास बहुत पुराना है। रामायण काल में भी मोतियों के प्रयोग की बात की गई है। यहां तक कि बाइबल में भी मोती का ज़िक्र मिल जाता है। अलग-अलग दौर में विश्व के कई स्थानों पर मोतियों को तरजीह मिली है। 

     

    वहीं, यदि आधुनिक दौर में भारत की बात की जाए, तो पता चलता है कि वर्ष 1961 में मन्नार की खाड़ी में मोतियों की खेती की शुरुआत हुई थी। अब यह देश के कई हिस्सों में प्रचलित है। आपको ये जानकर हैरानी होगी कि आप मछली पालन के लिए बनाए गए तालाबों में भी मोतियों की खेती कर सकते हैं। हमारे देश में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह एवं लक्षद्वीप मोती उत्पादन के लिए सबसे अनुकूल स्थान हैं। वहीं, तमिलनाडु स्थित तूतीकोरिन और बिहार का दरभंगा ज़िला भी मोतियों की खेती के लिए काफी प्रसिद्ध है। इसके अतिरिक्त हैदराबाद में देश का सबसे बड़ा पर्ल ड्रिलिंग सेंटर है। शायद यही वजह है कि इसे "मोतियों का शहर" भी कहा जाता है।

     

    मोतियों की खेती और उसके इतिहास से तो आप परिचित हो गए, लेकिन अब बारी है इसके फ़ायदों को जानने की। तो चलिए, मोतियों की खेती के फ़ायदों पर भी थोड़ी बात कर लेते हैं।

     

     

     

    मोतियों की खेती के फ़ायदे (Benefits of Pearl Farming)

     

    • मोतियों की खेती से किसानों को कई गुना अधिक लाभ हासिल होता है।
    • मोती जितने अच्छे होते हैं, उनकी कीमत उतनी ही अधिक होती है। अच्छे मोतियों की कीमत लाखों तक भी जाती है।
    • दुनिया भर में मोतियों की अच्छी डिमांड है। इसलिए इन्हें बेचने में किसी भी प्रकार की परेशानी नहीं आती। 
    • यदि मोतियों का निर्यात कर उन्हें विदेशी बाज़ारों में बेचा जाता है, तो और भी अधिक लाभ हासिल होता है।
    • वहीं, मोती निकालने के बाद बचे हुए सीप को भी बेचा जा सकता है। कई सजावटी सामानों में सीप का उपयोग किया जाता है। 
    • इसके अतिरिक्त नदियों और तालाबों के पानी को भी सीपों के ज़रिए शुद्ध किया जाता है। इस तरह जल प्रदूषण की समस्या से भी काफी हद तक निपटा जा सकता है। 

     

    उम्मीद है कि मोतियों की खेती पर लिखा हमारा यह ब्लॉग आपको पसंद आया होगा। यदि आप मोतियों की खेती (Pearl Farming) के बारे में और अधिक जानना चाहते हैं, तो आप हमारे ब्लॉग “ऐसे शुरू करें मोतियों की खेती ” अवश्य पढ़ें।  

     

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