पंचायती राज अधिनियम -1992

पंचायती राज अधिनियम -1992

1992 के 73वें संविधान संशोधन का मुख्य उद्देश्य पंचायती राज की त्रिस्तरीय व्यवस्था को अधिक से अधिक अधिकार प्रदान करना है।

26 June 2020

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  • अभी तक आपने हमारे ब्लॉग भारत में स्वशासन का इतिहास और स्वतंत्र भारत में पंचायती राज की विकास यात्रा में पढ़ा कि प्राचीन समय से स्वतंत्रता के बाद 1992 ई. तक भारत पंचायती राज व्यवस्था का इतिहास और विकास यात्रा कैसी रही। अब हम इस ब्लॉग में पढ़ेंगे कि पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा कैसे मिला और 'पंचायती राज अधिनियम-1992' क्या है?

     

    यहाँ यह भी जिक्र करना आवश्यक है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमारे देश में पंचायतों के सुधार और स्वशासन के लिए समय-समय पर कई समितियों का गठन किया गया, लेकिन पंचायती राज व्यवस्था को कानूनी रूप नहीं मिल पाई।

     

    आइए इस ब्लॉग में विस्तार से जानें कि 'पंचायती राज अधिनियम-1992' क्या है?

     

    64वाँ संविधान संशोधन विधेयक

    इसी कड़ी में वर्ष 1989 में पंचायतों को संवैधानिक दर्जा देने के लिए तत्कालीन राजीव गाँधी सरकार द्वारा संसद में 64वाँ संविधान संशोधन विधेयक पेश किया गया। परन्तु यह विधेयक लोकसभा में पारित होने के बाद राज्यसभा से अस्वीकार कर दिया गया। 

     

    73वाँ संविधान संशोधन (पंचायत राज अधिनियम-1992)

    अंततः वर्ष 1992 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी नरसिम्हा राव के कार्यकाल में पंचायती राज अधिनियम (Panchayati Raj Act - 1992) दोनों सदनों से पारित कर दिया गया। इस अधिनियम से पंचायतों को संवैधानिक दर्जा और शक्तियाँ प्राप्त हो सकी।

     

    आपको बता दें, विधेयक को संसद द्वारा पारित होने के बाद 20 अप्रैल, 1993 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली और 24 अप्रैल, 1993 से इसे देशभर में लागू कर दिया गया। इसके फलस्वरूप 24 अप्रैल को देशभर में ‘राष्ट्रीय पंचायत दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।

     

    पंचायती राज अधिनियम-1992 लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की अवधारणा को साकार करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। इसका उद्देश्य देश की करीब ढाई लाख पंचायतों को अधिक से अधिक अधिकार प्रदान कर उन्हें सशक्त बनाना है। इस अधिनियम के अनुसार ग्राम पंचायतें स्थानीय ज़रुरतों के अनुसार योजनाएँ बनाकर लागू कर सकेंगी। 

     

    73वें संविधान संशोधन अधिनियम-1992 के तहत भारतीय संविधान के भाग-9 में पंचायती राज से संबंधित नियमों की चर्चा (अनुच्छेद-243) में की गई है। भाग-9 में ‘पंचायतें’ नामक शीर्षक के तहत अनुच्छेद 243 से 243(ण) तक पंचायती राज से संबंधित नियमों का उल्लेख किया गया है। इस संशोधन द्वारा संविधान में 11वीं अनुसूची जोड़ी गई है, जिसके तहत पंचायतों को कुल 29 विषयों पर काम करने का अधिकार दिया गया है। इस अधिनियम के तहत पंचायतों को तीन स्तर पर विकेंद्रीकरण कर पंचायतों की शासन व्यवस्था को आसान बनाया गया है। 

     

    पंचायती राज संबंधित अनुच्छेद

    संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा 1992 में संविधान में भाग-9 जोड़ा गया है। इस भाग में ‘पंचायतें’ नामक शीर्षक के तहत अनुच्छेद 243-243ण (243-243O) तक पंचायती राज से संबंधित विषय का उल्लेख किया गया है। जो निम्नलिखित है।

     

    अनुच्छेद-243 के अंतर्गत ग्राम स्तर पर ग्राम सभा, मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत समिति और जिला स्तर पर जिला परिषद को परिभाषित किया गया है।

     

    अनुच्छेद- 243 (क)

    इस अनुच्छेद के अनुसार प्रत्येक गाँव में एक ग्रामसभा होगी जो राज्यों के विधान मंडल द्वारा दिए गए अधिकारों का उपयोग और निर्धारित कर्तव्यों का पालन ग्राम स्तर पर करेंगी।

     

    अनुच्छेद- 243 (ख)

    अनुच्छेद- 243 (ख) में पंचायतों के गठन का प्रावधान किया गया है। जिसके तहत प्रत्येक राज्य में ग्राम स्तर, मध्यवर्ती स्तर और जिला स्तर पर पंचायतों का गठन किया जाएगा। जिस राज्य में कुल जनसंख्या 20 लाख से कम है, वहाँ मध्यवर्ती स्तर पर पंचायतों का गठन नहीं किया जाएगा। वहाँ की पंचायतें द्विस्तरीय होगी जबकि अन्य राज्यों में त्रिस्तरीय पंचायत होंगी।

     

    अनुच्छेद-243(ग)

    अनुच्छेद-243(ग) में पंचायतों की संरचना का प्रावधान है। राज्य विधानमंडलों को विधि द्वारा पंचायतों की संरचना के लिए नियम बनाने की शक्ति दी गई है, लेकिन किसी भी स्तर पर पंचायत के राज्य की जनसंख्या और निर्वाचन द्वारा भरे जाने वाले स्थानों की संख्या के मध्य अनुपात राज्य में यथासंभव एक ही रहेगा।

     

    अनुच्छेद- 243(घ)

    इस अनुच्छेद के अनुसार प्रत्येक पंचायत में अनुसूचित जातियों-जनजातियों और पिछड़े वर्ग के साथ-साथ महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है। लेकिन इन वर्गों के लोगों के लिए पदों का आरक्षण गाँव में उनकी जनसंख्या के अनुपात पर निर्भर करेगा। अनुसूचित जाति के लिए पदों का आरक्षण कुल सीटों में अधिक से अधिक 21% तक ही होगा। इसी प्रकार पिछड़ी जाति के लिए 27% आरक्षण का प्रावधान है।

     

    इस अनुच्छेद में यह भी कहा गया है कि किसी पंचायत में कुल सदस्य संख्या का कम-से-कम एक तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित होगी। यह आरक्षण व्यवस्था विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों के लिए चक्रानुक्रम (बारी-बारी) से निर्धारित करने का प्रावधान है। वर्तमान में यह आरक्षण अनेक राज्यों में 50% तक कर दिया गया है। अर्थात् उस राज्य में प्रत्येक दूसरी सीट महिलाओं के लिए आरक्षित है।

     

    अनुच्छेद-243(ङ)

    इस अनुच्छेद में पंचायतों के कार्यकाल का वर्णन हैं। सभी पंचायतों का कार्यकाल 5 वर्ष निर्धारित किया गया है। पंचायतों के रिक्त होने पर 6 माह के अंदर चुनाव कराने का प्रावधान है।

     

    अनुच्छेद 243(च)

    इस अनुच्छेद में पंचायत सदस्यता के लिए योग्यताओं के बारे में वर्णन किया गया है। पंचायत-जनप्रतिनिधि बनने के लिए प्रत्याशी की आयु 21 वर्ष होना आवश्यक है। पंचायत चुनावों में 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके सभी युवा चुनाव में हिस्सा ले सकेंगे।

     

    अनुच्छेद-243(छ)

    इस अनुच्छेद में राज्यों की विधानसभा पंचायतों के अधिकार, कर्तव्य और वित्त संबंधित नियमों का उल्लेख है।  

    1.   इसके अंतर्गत राज्य सरकार पंचायतों के लिए आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएं तैयार करेंगी।

    2.   इसके अतिरिक्त राज्य सरकार 11वीं अनुसूची में वर्णित 29 विषयों पर क्रियान्वित करेगी। 

     

    अनुच्छेद- 243(ज)

    इस अनुच्छेद के अनुसार राज्य के राज्यपाल पंचायतों की वित्तीय स्थिति का पुनर्निरीक्षण करने के लिए एक वित्त आयोग का गठन करेंगे। वित्त आयोग राज्य की संचित निधि से पंचायतों के लिए सहायता अनुदान प्रदान करेगा। राज्य वित्त आयोग को ही पंचायतों को धन मुहैया कराने की जिम्मेदारी दी गई है।

     

    अनुच्छेद- 243(झ)

    इस अनुच्छेद में वित्तीय स्थिति के पुनर्वालोकन के लिए वित्त आयोग का गठन का प्रावधान है,अर्थात् प्रत्येक राज्य का राज्यपाल पंचायत अधिनियम-1992 के अनुसार प्रत्येक 5 वर्ष के बाद राज्य में ‘राज्य वित्त आयोग का गठन करता है। राज्य वित्त आयोग ही  पंचायतों की वित्तीय स्थिति का पुनर्विलोकन करने का काम करती है। इससे स्पष्ट है कि ‘राज्य वित्त आयोग’ की सिफारिशों पर ही राज्यपाल स्थानीय स्वशासन को धन मुहैया कराते  हैं। 

     

    अनुच्छेद- 243(ञ)

    इस अनुच्छेद में पंचायतों के लिए ऑडिट की व्यवस्था की गई है।आपको बता दें, इस अनुच्छेद में राज्य के विधान मंडल को पंचायतों में की जा रही कार्यों की निगरानी की जिम्मेदारी दी गई है। अर्थात् राज्य सरकार पंचायतों की लेखा आडिट कर सकती है। 

     

    अनुच्छेद-243(ट)

    इस अनुच्छेद के अनुसार पंचायतों के लिए कराए जाने वाले सभी निर्वाचनों के लिए मतदाता सूची तैयार कराने का और उन सभी चुनाव के संचालन का देखभाल, निर्देशन और नियंत्रण एक राज्य निर्वाचन आयोग में निहित होगा, जिसमें एक राज्य निर्वाचन आयुक्त होगा, जो राज्यपाल द्वारा नियुक्त किया जाएगा।

     

    अनुच्छेद-243(ठ)

     इस अनुच्छेद के अनुसार पंचायतों का राज्यों और संघशासित क्षेत्रों में लागू होने से संबंधित है।

     

    अनुच्छेद-243(ड)

    इस अनुच्छेद में अनुसूचित जनजाति क्षेत्रों के संवर्धन के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। इसके अनुसार अनुच्छेद 244 के खंड(1) में निहित अनुसूचित क्षेत्रों और उसके खंड (2) में निर्दिष्ट जनजाति क्षेत्रों को लागू नहीं होगी।

     

    यहाँ यह भी जिक्र करना आवश्यक है कि पंचायती राज अधिनियम-1992 संपूर्ण भारत में लागू नहीं है। ऐसे विशेष क्षेत्र जो अनुसूचित जनजाति क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं, वहाँ उन्हें विशेष अधिकार दिए गए है। इन इलाकों के लिए अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार अधिनियम-1996 (पेसा) बनाया गया है। जो उन्हें स्वशासन में  स्वायत्ता  प्रदान करती है। इसलिए अनुच्छेद 243 (क) को पर्वतीय क्षेत्रों के अनुसूचित जनजाति इलाकों जैसे नागालैंड, मेघालय, मिजोरम को इससे अलग रखा गया है।

     

    अनुच्छेद 243(ढ)

    इस अनुच्छेद के अनुसार पंचायत अधिनियम, 1992 के प्रारंभ के ठीक विद्यमान सभी पंचायतें, यदि उस राज्य की विधान सभा द्वारा या ऐसे राज्य की दशा में, जिसमें विधान परिषद् है, उस राज्य के विधान-मंडल के प्रत्येक सदन द्वारा पारित इस आशय के संकल्प द्वारा पहले ही विघटित नहीं की जाती हैं तो, अपनी अवधि की समाप्ति तक बनी रहेगी।

     

    अनुच्छेद 243(ण)

    इस अनुच्छेद में पंचायत के सदस्यों के निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालयों में हस्तक्षेप का उल्लेख है। 

     

    इस अनुच्छेद के दो महत्वपूर्ण बिन्दु है-

     

    1. अनुच्छेद-243(ट) में हम लोगों ने पढ़ा कि पंचायत चुनाव की ज़िम्मेदारी राज्य चुनाव आयोग की है। इस अनुच्छेद में कहा गया है कि पंचायत चुनाव के लिए बनाया गया कोई कानून, परिसीमन, चुनाव विधि या उनके स्थानों के आवंटन से संबंधित है, किसी भी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जा सकता है। 

    2. यद्यपि दूसरे बिन्दु में यह कहा गया है कि ऐसे नियम जो किसी राज्य सरकार द्वारा बनाए गए हैं उन्हें ही न्यायालयों में प्रश्नगत किया जा सकेगा, अन्यथा नहीं। 

     

    पंचायती राज अधिनियम-1992 का महत्व

    पंचायती राज अधिनियम देश में लोकतंत्र को सबसे निचले स्तर पर तैयार करने की एक युगान्तकारी और क्रांतिकारी सोच है। स्वशासन के माध्यम से शासन में समाज के अंतिम व्यक्ति की भागीदारी सुनिश्चित होती है जिससे सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों के नागरिक भी लोकतंत्रात्मक संगठनों में रुचि लेते हैं।महिलाओं को न्यूनतम एक-तिहाई आरक्षण मिलने से महिलाएँ भी पंचायती राज व्यवस्था में शामिल होकर मुख्य धारा में जुड़ रही हैं।

     

    यह स्वस्थ राजनीति की प्रथम पाठशाला साबित हो सकती है जहाँ से ज़मीनी स्तर पर समाज के प्रत्येक पहलू की समझ रखने वाले एवं स्थानीय समस्याओं के प्रति संवेदनशील नेता भविष्य के लिये तैयार हो सकते हैं।

     

    संक्षेप में कहें, पंचायती राज अधिनियम-1992 (Panchayati Raj Act - 1992) को बेहतर ढंग से लागू करके ही स्थानीय समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। 

     

    आधुनिक पंचायती राज अधिनियम के बाद हम Knitter के अगले ब्लॉग पंचायती राज की त्रिस्तरीय व्यवस्था के बारे में जानेंगे कि किस प्रकार पंचायती राज शासन को तीन स्तरों पर विकेंद्रीकरण कर इसे कैसे बेहतर बनाया गया है।



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