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त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था, भाग-3(जिला परिषद)

त्रिस्तरीय पंचायती राज की सबसे उपरी संस्था जिला परिषद के बारे में। आईए जानें, क्या है जिला परिषद के कार्य, जिम्मेदारियाँ।

26 June 2020

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  • भी तक आप लोगों ने हमारे ब्लॉग त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था, भाग-2(पंचायत समिति) में पढ़ा कि त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था के अंतर्गत मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत समिति कैसे काम करती है।

     

    अब हम लोग इस ब्लॉग में पंचायती राज-व्यवस्था की सबसे ऊपरी संस्था जिला परिषद के बारे में विस्तार से जानेंगे।

     

    जिला परिषद, पंचायती राज व्यवस्था में जिला स्तर की  सबसे उच्च संस्था है जो ग्राम पंचायत एवं पंचायत समितियों के नीति-निर्धारण व मार्गदर्शन का काम करती है। आपको बता दें, 73वें संविधान संशोधन के अन्तर्गत त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था में सभी राज्यों के जिले स्तर पर जिला-परिषद के गठन का प्रावधान किया गया है। जिसे कई राज्यों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है।

    जैसे- उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में ‘जिला पंचायत’ तो राजस्थान, बिहार, झारखंड जैसे राज्यों इसे जिला परिषद के नाम से जाना जाता है। जिला परिषद का नाम उस जिले के नाम पर होता है। जैसे-उत्तर प्रदेश में जिला पंचायत-आगरा और राजस्थान में जिला परिषद- अजमेर

    जिला परिषद का गठन

    जिला परिषद का गठन जिला परिषद के निर्वाचित सदस्यों द्वारा की जाती है। इसके अलावा उस जिले के अंतर्गत लोकसभा और विधानसभा के निर्वाचित सदस्य भी शामिल होते हैं। लेकिन ये सदस्य जिला परिषद के अध्यक्ष के निर्वाचन में शामिल नहीं होते हैं। इन सदस्यों को स्थाई सदस्य न कहकर पदेन सदस्य कहा जाता है।

    जिला परिषद के सदस्यों का चुनाव

    जिला परिषद के चुनाव के लिए जिला परिषद को छोटे-छोटे ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों में बांटा जाता है जिसकी आबादी लगभग 50,000 होती है। इन सदस्यों का चुनाव भी ग्रामीण मतदाता करते हैं। जिला पंचायत के सदस्य के रूप में चुने जाने के लिए जरूरी है कि प्रत्याशी की उम्र 21 साल से कम नहीं हो। यह भी जरूरी है कि चुनाव में खड़े होने वाले सदस्य का नाम उस जिले की मतदाता सूची में शामिल हो।

    जिला परिषद के अध्यक्ष का चुनाव

    राज्य निर्वाचन आयोग के निर्देशानुसार जिला परिषद के निर्वाचित सदस्य यथाशीघ्र जिला परिषद अध्यक्ष का चुनाव करते हैं। जिला परिषद में कुल चुने जाने वाले सदस्यों में से यदि किसी सदस्य का चुनाव किसी कारण से नहीं भी होता है तो भी अध्यक्ष पद के लिए चुनाव नहीं रूकता और चुने गए जिला परिषद सदस्य अपने में से एक अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष का चुनाव कर लिया जाता है।

     

    यदि कोई व्यक्ति संसद या विधान सभा का सदस्य हो, किसी नगर निगम का अध्यक्ष या उपाध्यक्ष हो, नगरपालिका का अध्यक्ष या उपाध्यक्ष हो या किसी नगर पंचायत का अध्यक्ष या उपाध्यक्ष हो तो वह जिला परिषद अध्यक्ष या उपाध्यक्ष नहीं बन सकता।

    जिला परिषद में आरक्षण

    जिला परिषद के अध्यक्ष और जिला परिषद सदस्यों के पदों पर आरक्षण लागू होगा। पंचायती राज अधिनियम के अनुसार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़ी जाति के लोगों के लिए आरक्षण उनकी जनसंख्या के अनुपात पर निर्भर करता है। इसके अलावा सभी पदों पर एक तिहाई (33प्रतिशत) सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित रखने का प्रावधान है। वर्तमान समय में कई राज्यों में महिलाओं के लिए यह आरक्षण बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया गया है। अर्थात् इन राज्यों में पंचायती राज का प्रत्येक दूसरा पद महिलाओं के लिए आरक्षित है। ये सीटें चक्रानुक्रम या रोस्टर व्यवस्था के अनुसार आरक्षित की जाती है।

    नोट- अनुसूचित, अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़े वर्ग के लोग अनारक्षित सीट पर भी चुनाव लड़ सकते हैं। इसी तरह से अगर कोई सीट महिलाओं के लिए आरक्षित नहीं की गई है तो वे भी उस सीट से चुनाव लड़ सकती हैं।

    जिला परिषद अध्यक्ष और उसके सदस्यों का कार्यकाल

    ग्राम पंचायत व पंचायत समिति की तरह ही जिला परिषद का एक निश्चित कार्यकाल होता है। पंचायती राज अधिनियम में दिए गए नियमों के अनुसार- 

    जिला परिषद का कार्यकाल पहली बैठक की तारीख से 5 वर्षों तक का होता है। यदि किसी कारणवश जिला पंचायत को उसके निर्धारित कार्यकाल से पहले भंग कर दिया जाए तो 6 महीने के भीतर उसका चुनाव कराना जरूरी होगा। नए सदस्यों का कार्यकाल भी बाकी बचे समय के लिए ही होगा। 

    जिला परिषद की बैठक

    जिला परिषद के कार्यों के संचालन हेतु संविधान में जिला परिषद की बैठक का प्रावधान किया गया है। जिसके अंतर्गत हर दो महीने में जिला परिषद की कम से कम एक बैठक जरूर होगी। जिला परिषद की बैठक को बुलाने का अधिकार अध्यक्ष को है। अध्यक्ष की गैर हाजिरी में यह कार्य जिला परिषद उपाध्यक्ष करता है। इसके अतिरिक्त जिला परिषद की अन्य बैठकें भी बुलाई जा सकती है। सभी बैठक जिला परिषद कार्यालय में होगी। अगर बैठक किसी अन्य स्थान पर होना निश्चित की गई है तो इसकी सूचना सभी सदस्यों को पहले दी जानी चाहिए। बैठक में जिला पंचायत सदस्य अध्यक्ष या मुख्य विकास अधिकारी से प्रशासन से संबंधी कोई विवरण,  आंकड़े, सूचना, कोई प्रतिवेदन, अन्य ब्यौरा या कोई पत्र की प्रतिलिपि मांग सकते है। अध्यक्ष या मुख्य विकास अधिकारी को बिना देर किए मांगी गई जानकारी सदस्यों को देनी होगी।

    जिला परिषद के कार्य

    जिला परिषद एक समन्वय और पर्यवेक्षण करने वाली निकाय है। साधारणतया यह निम्नलिखित कार्यों का सम्पादन करती है। जैसे-

    1.   जिला परिषद का वार्षिक बजट तैयार करना।
    2.   राज्य सरकार द्वारा जिलों को दिए गए अनुदान को पंचायत समितियों में वितरित करना।
    3.   प्राकृतिक संकट के समय राहत - कार्य का प्रबन्ध करना।
    4.   पंचायत समितियों द्वारा तैयार की योजनाओं का समन्वय करना।
    5.   पंचायत समितियों तथा ग्राम पंचायतों के कार्यों का समन्वय तथा मूल्यांकन करना।
    6.   ग्रामीण और कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन देना।
    7.   कृषि का विकास करना।
    8.   लघु सिंचाई, मत्स्य पालन तथा जलमार्ग का विकास करना।
    9.   अनुसूचित जाति, जनजाति तथा पिछड़े वर्गों के कल्याण की योजना बनाना।
    10.   शिक्षा का प्रसार करना।

     इससे स्पष्ट है कि जिला परिषद पूरे जिले से आई प्राथमिकताओं व लोगों की जरूरतों का समेकित कर एक जिला योजना तैयार करती है, जो क्षेत्र विशेष के हिसाब से उनकी प्राथमिकताओं के आधार पर होती है। इस प्रकार जिला योजना में स्वीकृत योजना को लागू किया जाता है। 

    जिला परिषद के अध्यक्ष के कार्य

    जिला परिषद अध्यक्ष का मुख्य कार्य जिला परिषद के सदस्यों तथा पंचायत समितियों के अध्यक्षों की बैठक बुलाना और उनकी अध्यक्षता करना है।

    • बैठकों में व्यवस्था बनाए रखना तथा लिए गए निर्णयों की जानकारी रखना।
    • वित्तीय प्रशासन पर नजर रखना तथा योजनाओं के अनुरूप वित्तीय प्रबंधन की निगरानी करना।
    • जिला परिषद अध्यक्ष को सरकार द्वारा दिए गए अन्य कार्य भी करने होते हैं।

    अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव

     यदि अध्यक्ष अपने कार्यों को ठीक प्रकार से नहीं करता है तो राज्य सरकार नियत प्रक्रिया व नियमों के अनुसार उसे निश्चित अवसर देकर पद से हटा भी सकती है। अधिनियम में दी गई प्रकिया के अनुसार जिला परिषद के अध्यक्ष या किसी उपाध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव किया जा सकता है तथा उस पर कार्यवाही की जा सकती है।

    यहाँ यह जिक्र कर दें कि अविश्वास प्रस्ताव की लिखित नोटिस पर जिला परिषद के निर्वाचित सदस्यों की कुल संख्या में कम से कम आधे सदस्यों का हस्ताक्षर होना चाहिए।

    प्रस्तावित प्रस्ताव की प्रति के साथ नोटिस पर हस्ताक्षर करने वाले सदस्यों में से किसी के द्वारा व्यक्तिगत रूप से उस जिलाधिकारी को दिया जाएगा। इसके बाद जिलाधिकारी उक्त प्रस्ताव पर विचार करने के लिए जिला परिषद की बैठक जिला परिषद के कार्यालय में अपने द्वारा निश्चित तिथि को बुलायेगा। जिला पंचायत के निर्वाचित सदस्यों को ऐसी बैठक के लिए कम से कम 15 दिनों की नोटिस देनी होती है। 

    जिला परिषद का बजट

    जिला परिषद को हर वर्ष जिले का वार्षिक बजट तैयार करना होता है। जिला परिषद इस बजट को वित्त समिति के परामर्श से तैयार करती है। इस तैयार बजट को पूर्व निर्धारित तिथि को जिला परिषद की बैठक में अध्यक्ष के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। प्रस्तावित बजट को जिला परिषद अगर चाहे तो संशोधन हेतु वापस भी कर सकती है। अगर बजट वापस नहीं होता तो जिला परिषद इसे पारित कर देती है। यदि बजट संशोधन हेतु लौटाया जाता है तो कार्य समिति नए सिरे से इस बजट को बनाएगी जिसे अध्यक्ष द्वारा पुन: बैठक में प्रस्तुत कर पारित करवाया जायेगा।

    जिला परिषद के अंतर्गत कार्य करने वाले अधिकारी

    मुख्य विकास अधिकारी

    जिला पूर्ति अधिकारी

    उप क्षेत्रीय विपणन अधिकारी

    जिला वन अधिकारी

    अधिशासी अभियन्ता- लोक निर्माण विभाग

    अधिशासी अभियन्ता- विद्युत विभाग

    सामान्य प्रबन्धक- जिला उद्योग केन्द्र

    जिला अर्थ एवं संख्यिकी अधिकारी

    जिला परिषद व पंचायत समिति के बीच संबंध

    जिला परिषद व पंचायत समिति के बीच उचित तालमेल व सामंजस्य के लिए 73वें संविधान संशोधन अधिनियम में विशेष प्रावधान किए गए है। जिसके अंतर्गत जिले में आने वाली समस्त क्षेत्र पंचायत के प्रमुख अपने जिले की जिला परिषद के भी सदस्य होते हैं। 

     

    योजनाओं व कार्यक्रमों के नियोजन हेतु भी तीनों स्तर की पंचायतों को आपसी सामंजस्य से कार्य करने के नियम बनाए गए है। इन नियमों के अनुसार पंचायत समिति ग्राम पंचायत की वार्षिक योजनाओं के आधार पर पंचायत समिति के लिए विकास योजनाएं बनाती है। इस तैयार योजना को पंचायत समिति जिला परिषद को भेजती है। इसी प्रकार जिला परिषद पंचायत समितियों की विकास योजनाओं के आधार पर अपने जिले के ग्रामीण इलाकों के लिए एक समग्र विकास योजना बनाती है।

     

    यहाँ यह भी जिक्र करना आवश्यक है कि जिला स्तर पर ग्रामीण क्षेत्रों की विकास योजना तभी सही तरीके से बन पाएंगी जब जिले की पंचायत समितियाँ सही समय पर योजनाएं बनाकर जिला परिषद को भेजें।

     

    संक्षेप में कहें तो ग्राम पंचायत के द्वारा लोगों के हाथों में सत्ता पहुँचती है। ऐसा माना जाता है कि स्थानीय समस्याओं और जरूरतों की सबसे अच्छी समझ जनता के पास होती है। अब हर समस्या के निबटारे के लिए प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री तो नहीं आ सकते। इसलिए अपनी स्थानीय समस्याओं को सुलझाने के लिए लोगों को कुछ शक्ति मिलनी चाहिए।



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