Cottage industry: कुटीर उद्योगों से गांवों में बढ़ाएं आमदनी

Cottage Industry: कुटीर उद्योगों से बढ़ रही ग्रामीणों की आय

ग्रामीणों की आय (Income) बढ़ाने में कुटीर उद्योग (cottage industry) महत्वपूर्ण हैं। इस ब्लॉग में ऐसे ही कुछ विकल्पों के बारे में बात की गई है।

16 October 2020

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  • प्राचीन काल से ही कुटीर उद्योगों ने ग्रामीण विकास (Rural Development) में अहम भूमिका निभाई है। इन उद्योगों ने न सिर्फ़ गांवों, बल्कि समूचे देश की अर्थव्यवस्था (Indian Economy) को गति देने का काम किया है। इससे पहले कि हम इसके महत्व और योगदान पर चर्चा करें, आइए जानते हैं कि आख़िर ये कुटीर उद्योग (cottage industry) होते क्या हैं? 

     

    कुटीर उद्योग क्या है? (What is Cottage Industry)

     

    कुटीर उद्योग ऐसे उद्योगों को कहा जाता है जिसकी शुरुआत कम पूंजी में घर पर ही की जाती है। इसे अक्सर परिवार के सदस्य मिलकर चलाते हैं। मुख्यतः कारीगर व अलग-अलग कला (Art) के माहिर लोग कुटीर उद्योगों का हिस्सा बनते हैं। इसमें श्रम भी कम लगता है। साथ ही बड़ी संख्या में बेरोज़गार (Unemployed) व्यक्तियों को रोज़गार भी मिल जाता है। 

     

    यहां हमें राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की वो बात याद आ जाती है, जो उन्होंने लघु व कुटीर उद्योगों को ध्यान में रखकर कही थी। उन्होंने कहा था- 

    लघु व कुटीर उद्योगों के अभाव में ग्रामीण किसान मृत है, खेती-बाड़ी करके वह खुद को नहीं पाल सकता, उसे सहायक उद्योग चाहिए।

     

    गांधी जी की इस बात से आप यह ज़रूर समझ गए होंगे कि कुटीर उद्योग कितने महत्वपूर्ण हैं। तो चलिए, आगे बढ़ते हैं और ग्रामीण विकास में कुटीर उद्योगों की भूमिका को समझते हैं


    किसानों की अतिरिक्त आय का साधन हैं ये उद्योग

     

    कुटीर उद्योगों से किसानों (Farmer) को अतिरिक्त आय का एक साधन मिल जाता है। वे खेती के साथ-साथ किसी कुटीर उद्योग (cottage industry) का हिस्सा बनकर अतिरिक्त आय कमा सकते हैं। इससे उनकी आर्थिक स्थिति मज़बूत होती है और देश की अर्थव्यवस्था को भी बल मिलता है।

     

    इससे स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा मिलता है

     

    उदारीकरण (Liberalization) की नीति अपनाने के बाद से ही भारत ने विदेशों से उत्पादों का आयात (import) शुरू कर दिया। इसके चलते स्वदेशी उत्पादों का महत्व कम होने लगा। लेकिन कुटीर उद्योगों के ज़रिए स्वदेशी उत्पादों पर पुनः ज़ोर दिया जा सकता है और बेहतर नतीजे हासिल किए जा सकते हैं। 

     

    बेरोज़गारी पर लगाम लगती है

     

    इसमें कोई दो राय नहीं है कि कुटीर उद्योग रोज़गार प्रदान करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके माध्यम से बेरोज़गारी (Unemployement) दूर की जा सकती है। कोई भी सामान्य व्यक्ति कुटीर उद्योग के ज़रिए कम लागत में काम शुरू कर सकता है। 

       

    लोगों की कला उन्हें रोज़गार दिलाती है

     

    कला की दृष्टि से कुटीर उद्योग बेहद अहम हैं। आप जिस कार्य में अच्छे हैं, उसी को अपनी कमाई का ज़रिया बना सकते हैं। जैसे- नक्काशी, सिलाई-बुनाई, अचार-पापड़ तथा खिलौने आदि बनाने का काम।

     

    पलायन को रोकना आसान होता है

     

    गांवों में रोज़गार न होने के कारण हर वर्ष लाखों लोग नौकरी की तलाश में शहरों का रुख़ करते हैं। कुटीर उद्योगों के ज़रिए गांवों में स्वरोज़गार को बढ़ावा दिया जा सकता है और शहरों की ओर जाने वाली आबादी को पलायन (Migration) से रोका जा सकता है।

     

    महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित होती है

       

    महिला सशक्तिकरण (Women Empowerment) की दिशा में भी कुटीर उद्योग महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कुटीर उद्योगों के माध्यम से महिलाएं घर बैठे ही अच्छी कमाई कर सकतीं हैं। इससे उन्हें न सिर्फ़ रोज़गार प्राप्त होता है, बल्कि उनका आत्मविश्वास भी बढ़ता है। सबसे महत्वपूर्ण बात, पुरुषों पर उनकी निर्भरता कम होती है।

     

    लोग आत्मनिर्भर बनते हैं

     

    कुटीर उद्योगों के ज़रिए गांव और गांववासी आत्मनिर्भर बनते हैं। शहरों पर उनकी निर्भरता कम होती है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों को न सिर्फ़ आर्थिक मज़बूती मिलती है, बल्कि उनका समाजिक विकास भी संभव हो पाता है।

     

    कम पूंजी में भी अधिक लाभ मिलता है

     

    कुटीर उद्योग इसलिए भी प्रचलित हैं क्योंकि इन्हें शुरू करने के लिए अधिक पूंजी की आवश्यकता नहीं होती। मध्यम आय या फिर कम आय वाले लोग भी कुटीर उद्योगों से कमाई कर सकते हैं।

     

    कुटीर उद्योग से जुड़ी प्रमुख समस्याएं

     

    कच्चे माल की कमी 

     

    ग्रामीण क्षेत्र में कुटीर उद्योगों को सुचारू रूप से चलाने में कभी-कभी कुछ परेशानियां आतीं हैं। उनमें से एक कच्चे माल की कमी भी है। अक्सर गांववासियों (Villager) को उत्पाद बनाने के लिए कच्चा माल नहीं मिलता, जिसके कारण कुटीर उद्योग सफल नहीं हो पाते।

     

    पर्याप्त पूंजी न होना 

     

    कुटीर उद्योगों के संचालन के लिए पूंजी की आवश्यकता होती है। भले ही इसके लिए बहुत बड़ी पूंजी नहीं चाहिए, लेकिन कुछ लोगों के लिए थोड़ी-बहुत पूंजी लगाना भी मुश्किल भरा होता है। ऐसे में यदि उन्हें ऋण आदि की सुविधा मिल जाए, तो संभवतः वे कुटीर उद्योगों का हिस्सा बन सकते हैं। लेकिन यहां संस्थागत ऋण (institutional loan) की कमी एक बड़ी समस्या बन जाती है। अक्सर ऋण मिलने में आने वाली परेशानियों के चलते लोग इससे दूर ही रहते हैं।

     

    उत्पादों के लिए सही बाज़ार न मिलना

     

    अपने उत्पादों की बिक्री के लिए सही बाज़ार न मिल पाने की समस्या आम हो गई है। कुटीर उद्योग भी इससे अछूते नहीं हैं। अक्सर देखा गया है कि कुटीर उद्योगों से जुड़े लोगों को कम मुनाफ़े में अपना माल बेचना पड़ता है। इसलिए कुटीर उद्योगों में कमी भी आ रही है। 

     

    यहां यह जानना भी ज़रूरी है कि यदि कुटीर उद्योग इतने महत्वपूर्ण हैं, तो उनके पतन का कारण क्या है? आइए, ये जानने का प्रयास भी करते हैं।

     

    कुटीर उद्योग के पतन का कारण

     

    भारत (India) में कुटीर उद्योग के पतन का एक बड़ा कारण विदेशी उत्पादों पर हमारी निर्भरता है। आज हम हर छोटी और बड़ी चीज़ के लिए विदेशों पर निर्भर हो गए हैं। उदारीकरण (Liberalization) की नीति अपनाने के बाद से ही भारत ने विदेशों से आयात शुरू किया और यहीं से कुटीर उद्योगों के पतन की शुरुआत हुई। भले ही सरकारें समय-समय पर कुटीर उद्योगों की बेहतरी के लिए कदम उठाती नज़र आईं हैं, लेकिन उनकी स्थिति में कोई बड़े बदलाव देखने को नहीं मिले हैं। उनकी स्थिति तब बदलेगी जब हम आगे आएंगे। यदि हम विदेशों में बने उत्पादों की जगह Made In India उत्पादों की खरीद करेंगे, तो कुटीर उद्योगों की स्थिति मज़बूत होगी। 

     

    हम आशा करते हैं कि ग्रामीण विकास में कुटीर उद्योगों के महत्व पर लिखा हमारा यह ब्लॉग आपको पसंद आया होगा। यदि आप कुटीर उद्योग के बारे में और जानना चाहते हैं, तो आपको हमारा ब्लॉग कुटीर उद्योगों में महिलाओं की भागीदारी ज़रूर पढ़ना चाहिए। इससे आपको कुटीर उद्योगों में महिलाओं की भागीदारी को समझने में मदद मिलेगी। 

     

     

    ✍️

    लेखक- भावना चौहान



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